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पांच मामले जो पीएम मोदी की कथनी और करनी की पोल खोलते हैं

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएएस अफ़सरों की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि नीति पर राजनीति को हावी नहीं होने दें. 
  • मगर उनकी अपनी पार्टी और नेताओं के पांच ऐसे कारनामे हैं जो बताते हैं कि पीएम मोदी का बयान ज़बरदस्त विरोधाभासी है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक ऐसा मंत्र याद दिलाया है कि अगर उनपर अमल कर लिया जाए तो चमत्कार हो सकता है.

हाल ही में आईएएस अधिकारियों की एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पद का इस्तेमाल करते हुए अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि नीति पर कहीं राजनीति हावी न हो जाए. नीति निर्धारण की प्रक्रिया में कमज़ोर में भी सबसे कमज़ोर के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री के शब्दों में सच्चाई है. राजनेता हमेशा ही नौकरशाही का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते आए हैं. कई बार तो ये राष्ट्रीय हितों से भी जुड़े होते हैं. 

वहीं अधिकारी भी राजनेताओं के डर और लालच के नाते उनकी बात मानते हैं. कई बार अधिकारी ऐसा तरीका भी बताते हैं, जिसमें राजनीतिक एजेंडा भी साथ-साथ आगे ले जाया जा सके.

इस स्थिति में प्रधानमंत्री के बयान को हाथोंहाथ लिया जाना चाहिए. इससे युवा अधिकारि प्रोत्साहित होते हैं कि वे संविधान के प्रति ज़िम्मेदार हैं न कि राजनीतिक एजेंडा के लिए.

मगर इस मौके पर प्रधानमंत्री से एक सवाल पूछना लाज़मी है कि क्या राजनीति को नीति पर हावी न होने देने का यह सिद्धांत उनके मंत्रियों पर भी लागू होता है? मोदी सरकार के कई मंत्री बीजेपी की विचारधारा के मुताबिक तो बात करते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वे संविधान सम्मत हों, क्योंकि वे बंटे हुए हैं. 

दरअसल सिर्फ़ मंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री ख़ुद भी कई बार ऐसा कर चुके हैं. 5 ऐसे मामले यहां पेश हैं जब मोदी और उनके मंत्रियों ने राष्ट्र हित के ऊपर पार्टी राजनीति को हावी होने दिया.

सर्जिकल स्ट्राइक

सेना की कार्रवाई  सर्जिकल स्ट्राइक का इस्तेमाल राजनीति के लिए नहीं किया जाना चाहिएथा लेकिन भाजपा ने यह किया. उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और बीजेपी का गुणगान करते हुए चुनावी पोस्टर सड़कों पर हर जगह लगे दिख जाएंगे.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का पार्टी के अतिउत्साहित कार्यकर्ताओं ने बेहद गर्मजोशी से हर जगह स्वागत किया. उसके बाद तो वे जैसे रुके ही नहीं और हर मौके पर सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में ही बोलते नजर आए. वे सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय खुद को, प्रधानमंत्री को और यहां तक कि आरएसएस को भी देने से नहीं चूके. 

प्रधानमंत्री ने भी अपने एक भाषण में कहा कि हमारी सेनाएं अब सर्जिकल स्ट्राइक के संदर्भ में इजराइली सेना के बराबर हो गई हैं. क्या सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानबाज़ी और ख़ासकर प्रधानमंत्री की तरफ़ से, युवा अधिकारियों को दिए गए ज्ञान का विरोधाभास नहीं है? 

राम लला

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने हाल ही में अयोध्या में राम लला का जाप किया और ऐलान किया कि राम मंदिर बनाया जाएगा. क्या उन्होंने नीति का ख्याल रखा? मोदी ने ख़ुद राजनीतिक लाभ के लिए राम नाम का सहारा लिया.

उन्होंने विजयदशमी के मौक़े पर लखनऊ में भाषण के अंत में 'जय श्री राम' का उद्घोष किया. परम्परागत तौर पर रामलीला का जो कार्यक्रम दिल्ली में होता है, वह लखनऊ में किया गया. इसी से पार्टी के राजनीतिक फायदे का मक़सद साफ़ झलक रहा है. प्रधानमंत्री के जाप ने इस पर मुहर लगा दी. क्या यह प्रधानमत्री और बाक़ी मंत्रियों द्वारा सरकारी मंच से पार्टी के राजनीतिक हित साधने की कोशिश नहीं है?

गौरक्षा

प्रधानमंत्री ने कभी भी इस बात पर साफ तौर पर अफसोस ज़ाहिर नहीं किया कि दादरी में मुहम्मद अखलाक को केवल इस शक में मार दिया गया कि उन्होंने कथिततौर पर बीफ का सेवन किया था. क्या यह राष्ट्र हित में जरूरी नहीं था कि अखलाक की हत्या की एक सुर में निंदा की जाती?

पुलिस को सख़्त हिदायत दी जाती कि दोषियों को सज़ा मिलनी ही चाहिए. मगर मोदी ने इसके उलट अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों तक को छूट दे दी कि वे इन कथित हत्यारों का सार्वजनिकतौर पर बचाव करें.

जब इन अभियुक्तों में से एक रवि की पुलिस हिरासत में बीमारी के चलते मौत हो गई तो यही केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा उसे श्रद्धांजलि देने उनके गांव जा पहुंचे, जहां उसका शव राष्ट्रीय झंडे में लपेटा गया था! क्या यह राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री के महत्वपूर्ण सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है?

कश्मीर

कुछ दिन में लगेगा कि कश्मीर में उठा-पटक की बात चार महीने पुरानी हो गई है लेकिन घाटी में अब भी शांति बहाल नहीं हुई है. इन हालात पर कश्मीरी लोगों में गुस्सा है लेकिन प्रधानमंत्री एक बार भी हालात का जायजा लेने कश्मीर नहीं गए जबकि इस दौरान वे कई बार उत्तर प्रदेश और गुजरात हो आए. 

वे पिछले चार महीने में तीन बार गुजरात हो आए, सिर्फ इसलिए कि वहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं औ पार्टी को वहां अपने चेहरे के रूप में मोदी की जरूरत है. क्या यह एक राज्य को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व देना और दूसरे को नज़रंदाज करने की नीति बहुत साफ़तौर पर राजनीति के नीति पर हावी होने की मिसाल नहीं है?

सिनेमा बनाम राष्ट्रवाद

जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने राज ठाकरे की मनसे और फिल्मकार करण जौहर के बीच विवाद का निपटारा किया था. तब उन्होंने ऐसा ज़ाहिर किया जैसे कि सरकार के पास इतना भी दमखम नहीं है कि वह मनसे को उसकी हैसियत बता दे और जौहर का समर्थन कर अभिव्यक्ति क स्वतंत्रता का बचाव करे. 

फड़नवीस मनसे को पीछे हटने को भी कह सकते थे और फिल्म बनाने के जौहर के अधिकार के पक्ष में आ सकते थे कि वे कुछ भी फिल्म बनाएं और उसमें काम करने के लिए किसी भी कलाकार को लें. क्या यह भी साफ तौर पर राजनीति के संवैधानिक सिद्धान्त पर हावी होने का मामला नहीं है?

First published: 30 October 2016, 9:18 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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