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मोदी को आई भाजपा की याद, क्या यह पर्याप्त है?

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री को शायद समझ आ गया है कि दिल्ली के दुर्ग में सबकुछ तलवार की नोंक से नहीं चलता. ताकत और हनक के साथ लचक भी\r\n चाहिए. लेकिन इतने भर से पार्टी के अंदर पनपते असंतोष को शांत किया जा सकता\r\n है, यह अभी कहा नहीं जा सकता है.
  • अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाने के बाद मोदी इतने ताकतवर हो चुके\r\n थे कि उनके बारे में सवाल उठाना तो दूर, एक शब्द बोलने तक का साहस पार्टी \r\nमें किसी के पास नहीं था. सब मोदी की सत्ता और अमित शाह के नेतृत्व को \r\nनतमस्तक भाव से स्वीकार कर चुके थे.

सत्ता के गलियारों में चहलकदमी करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब अपनी पार्टी की सुध आई है. उन्हें पार्टी के कार्यकर्ता और पदाधिकारी याद आ रहे हैं. मोदी उनसे संवाद बना रहे हैं और उनके सुझाव ले रहे हैं. यह मोदी का नया अवतार है क्योंकि अहमदाबाद की तुलना में दिल्ली एक कठिन किला साबित हो रहा है.

इस दुर्ग में सबकुछ तलवार की नोंक से नहीं चलता. ताकत और हनक के साथ लचक भी चाहिए और यह पिछले डेढ़ साल में प्रधानमंत्री को शायद समझ आ गई है. हालांकि क्या इतने भर से पार्टी के अंदर पनपते असंतोष को शांत किया जा सकता है, यह अभी कहा नहीं जा सकता है.

वर्ष 2014 की गर्मियों में जब अबकी बार, मोदी सरकार के नारे के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और सत्ता की बागडोर संभाली, तब अपने सेनापति अमित शाह को उन्होंने संगठन की कमान सौंप दी. राजनाथ सिंह, जो कि पार्टी अध्यक्ष थे, को मोदी अपने साथ कैबिनेट में ले आए. अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने क्योंकि ऐसा करना मोदी के लिए ज़रूरी था. सत्ता के साथ-साथ पार्टी को साधना एक अहम काम था.

मोदी के लिए ज़रूरी था कि सत्ता के साथ-साथ पार्टी को भी साध लिया जाय

इसके बाद सरकार और पार्टी, दोनों ही मोदीमय हो गए. सरकार का केंद्र भी मोदी और पार्टी का केंद्र भी. लेकिन पार्टी का केंद्र होते हुए भी मोदी सरकार और प्रचार में ही लीन रहे. पार्टी की ओर देखने की सुध उन्हें कम ही रही. उनके एजेंडे में विदेश यात्राएं थीं, राज्यों में चुनाव प्रचार था और अपनी सरकार के मंत्रालयों का केंद्रीकृत नियंत्रण था.

पार्टी इस दौरान अमित शाह के हाथों में रही. अब भी है. उनकी फिर से ताजपोशी हो गई है. लेकिन अमित शाह को पार्टी का काम देते वक्त मोदी और अमित शाह इतने ताकतवर हो चुके थे कि उनके बारे में सवाल उठाना तो दूर, एक शब्द बोलने तक का साहस पार्टी में किसी के पास नहीं था. सब मोदी की सत्ता और अमित शाह के नेतृत्व को नतमस्तक भाव से स्वीकार कर चुके थे.

सरकार और पार्टी की स्थिति ऐसी है कि यश और अपयश के लिए वही नाम हैं. उन्हीं के सिर जीत का ताज, उन्हीं के सिर हार का ठीकरा. पार्टी जिन जिन राज्यों में मोदी लहर पर सवार होकर सत्ता में आई, उसका श्रेय मोदी और उनके सेनापति अमित शाह को मिला. अमित शाह में पार्टी में अपने विश्वसनीय लोगों को तरजीह दी. चुनावों से लेकर बाकी मोर्चों तक प्रबंधन अपने वफादारों को सौंपा.

इससे पार्टी और सरकार में इतना वर्चस्व तो बढ़ा लेकिन समुद्र जैसी विशाल पार्टी और विचारधारा के अन्य अनुशांगिक संगठनों के बीच इतनी केंद्रीकृत व्यवस्था को लेकर क्षोभ भी अंदर-अंदर पैदा होने लगा. कुछ वरिष्ठ नेताओं के हिसाब से इतना केंद्रीकरण न तो पार्टी की विचारधारा से मेल खाता है और न ही पार्टी के लिए एक स्वास्थ्यप्रद है. लेकिन गले में घंटी बांधने का साहस किसी के पास नहीं रहा. कुछेक मामले ऐसे हैं जहां पार्टी के मार्गदर्शक कुछ कुछ कहते जताते नज़र आए लेकिन उनके विचारों को न तो पार्टी में समर्थन मिला और न कार्यकर्ताओं के बीच.

पार्टी जिन जिन राज्यों में मोदी लहर पर सवार होकर सत्ता में आई, उसका श्रेय मोदी और उनके सेनापति अमित शाह को मिला

अब परिस्थितियां बदल रही हैं. दिल्ली और बिहार के चुनावों में भाजपा की करारी हार ने प्रधानमंत्री और उनके सेनापति को सोचने पर मजबूर किया है कि जब बाहर स्थिति कमज़ोर होने लगे तो दुर्ग में सबकुछ व्यवस्थित होना बहुत ज़रूरी है. मोदी के लिए इस वक्त यह बहुत ज़रूरी है कि उनके कठिन समय में पार्टी और कार्यकर्ता उनके साथ खड़े हों और उनका बचाव कर सकें.

साथ ही यह भी आवश्यक है कि संगठन के कार्यकर्ता और पदाधिकारी वैसी ही भाषा बोलें जो कि मोदी के लिए सहज और सकारात्मक होगी, न कि अपने चिर-विपक्ष वाले तेवर से सत्ता और नेतृत्व को बेचैन रखें. कीर्ति आज़ाद के प्रकरण के बाद से पार्टी में अंतरकलह और विद्रोह के लिए जो गुंजाइश बन गई है, उसे रोकना और संभालना बहुत ज़रूरी है.

मोदी सरकार के संकट और भी हैं. कुछ राज्यों में भाजपा की सरकारें अब उतनी लोकप्रिय नहीं रह गई हैं, जितनी कि चुनाव से पहले उनसे अपेक्षा की गई थी. यही स्थिति कमोबेश केंद्र सरकार की है. पाकिस्तान से लेकर आर्थिक नीतियों के मोर्चे तक सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर नाममात्र ही कहने-बताने के लिए है. सरकार में आने के लिए जो वादे किए गए थे, उनमें से भी अधिकतर जुमले साबित हुए हैं.

ऐसे में मोदी और अमित शाह को अगर कुछ संबल मिलना है तो वो पार्टी के भीतर से ही मिल सकता है. और इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टी में संवाद बढ़े. लोगों को लगे कि सत्ता में बैठे लोग उनके विचारों को महत्व देते हैं और उनको विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं. साथ ही यही लोग मोदी के लिए कठिन समय में विपक्ष के बढ़ते हमलों से निपटने वाली ढाल का काम भी करेंगे.

मोदी इसीलिए अब अपनी रणनीति बदल रहे हैं. अभी तक उनके संवाद में मंत्री थे, भाजपा के सांसद थे, संघ के पदाधिकारी थे, नौकरशाह और बाकी लोग थे. अब मोदी इनके साथ साथ पार्टी को भी विश्वास में लेना चाहते हैं.

पाकिस्तान से लेकर आर्थिक नीतियों के मोर्चे तक सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर नाममात्र ही कहने-बताने के लिए है

अमित शाह की ताजपोशी के दौरान नरेंद्र मोदी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ भोजन किया. उनके निवास पर रात्रिभोज का आयोजन किया गया. पार्टी के सात मोर्चे हैं. इनमें महिला मोर्चा, युवा मोर्चा और पिछड़ा वर्ग मोर्चा जैसे फ्रंट शामिल हैं. प्रधानमंत्री ने अमित शाह की ताजपोशी के बाद इन मोर्चों की क्रमवार बैठकें की हैं. साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी मंत्रणा की है.

राजनाथ सिंह से प्रधानमंत्री की हाल ही में एक घंटे लंबी बैठक हुई है जिसमें बताया जा रहा है कि संगठन और उत्तर प्रदेश के लिए रणनीति जैसे मसलों पर भी विचार किया गया है.

मोदी को पिछड़ा वर्ग मोर्चे की ओर से सुझाव दिया गया है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए. पदाधिकारियों और मोर्चों के साथ संवाद करते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर आक्रामक तेवरों के बजाय संयमित भाषा का इस्तेमाल करते हुए अपना पक्ष रखने की ज़रूरत है.

प्रधानमंत्री ऐसा सबकुछ तब कर रहे हैं जब उनके दरवाज़े पर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव दस्तक दे रहे हैं. कश्मीर में सत्ता में बैठी पार्टी राजनीतिक संकट से गुज़र रही है. पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं जो कि 2019 के लिहाज से निर्णायक होंगे. ऐसी परिस्थिति में अपने कुनबे को संभालना एक ज़रूरत भी है और समझदारी भी.

मोदी को पिछड़ा वर्ग मोर्चे ने सुझाव दिया गया है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सरकार सार्वजनिक करे

हालांकि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि केवल संवाद से अंतरकलह की स्थितियों को बहुत समय तक टाला नहीं जा सकेगा. पार्टी और सरकार को बेहतर और मज़बूत ढंग से खड़े होने के लिए मोदी को अपनी बाहें और खोलनी पड़ेगी और सत्ता से लेकर निर्णय करने तक के क्रम में लोगों की भागीदारी बढ़ानी होगी.

मोदी ने शुरुआत तो की है. देखना होगा कि यह शुरुआत क्या वाकई पार्टी और सरकार के कामकाज को और लोकतांत्रिक और भागीदारी वाला बना पाती है या नहीं.

First published: 3 February 2016, 8:01 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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