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मोदीजी! बनारस को सिर्फ आपका दौरा नहीं, कुछ और चाहिए

आवेश तिवारी | Updated on: 2 May 2016, 7:44 IST
QUICK PILL
  • नरेद्र मोदी वाराणसी के जनप्रतिनिधि हैं. यह ताव दो साल पहले तक हर बनारसी \r\nसीने पर चिपकाए घूमता था. आज दो साल बाद सब कुछ बदल गया है.
  • काशी को क्योटो बनाने जैसे दावों के बावजूद काशी मोदी की नहीं हो सकी है \r\nहांलाकि मोदी काशी के हैं, यह बात लगातार कही और सुनी जा रही है.

गंगा किनारे साइबेरियाई पक्षियों की चीख अब नहीं सुनाई देती, गर्मी आ गई है. अपनी नाव किनारे लगाते गौतम साहनी बताते हैं कि अब वो लौट गए हैं, वैसे भी बनारस में बसने कौन आता है, लोग आते हैं चले जाते हैं.

व्यस्ततम गौदौलिया चौराहे पर सुबह के 10 बजते बजते भीड़ का आलम यह हो जाता है मानो समूचा पूर्वांचल बनारस की सड़कों पर उतर आया हो. न सिर्फ आम आदमी हांफता हुआ दिखता है बल्कि सड़कें-गलियां भी हांफती हैं, वो सिस्टम भी हांफता है, जिसकी वजह से बनारसी तीन लोक से न्यारी काशी कहते हुए नहीं अघाते हैं.

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी इस शहर के जनप्रतिनिधि हैं. यह ताव दो साल पहले तक हर बनारसी सीने पर चिपकाए घूमता था. आज दो साल बाद स्थितियां भिन्न हैं.

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हालांकि इस दौरान मोदी निरंतर अपने निर्वाचन क्षेत्र की यात्रा करते रहे हैं. लेकिन अस्त-व्यस्त भीड़ से कराह रहे बनारस को राहत नहीं मिली है. लिहाजा आम लोगों में भी अब प्रधानमंत्री को लेकर एक मोहभंग की भावना देखने को मिल रही है.

हांफते भागते इस शहर की नब्ज को जब हम छूने की कोशिश करते हैं तो साफ़ नजर आता है कि तमाम तानों बानों और काशी को क्योटो बनाने जैसे दावों के बावजूद काशी मोदी की नहीं हो सकी है हालांकि मोदी काशी के हैं, यह बात लगातार कही और सुनी जा रही है.

काशी में कैसी मुस्कराहट


मान मंदिर घाट पर श्रद्धालुओं का इन्तजार कर रहे पराशर पांडे पिछले 20 सालों से एक ही जगह गद्दी लगाए हुए हैं. पीएम मोदी का नाम सुनकर मुस्कुराते हैं फिर बिना सवाल सुने कहते हैं, “कम समय मिला है उन्हें, और समय मिलता तो कुछ करके दिखाते.”

पढ़े लिखे लोग तो मोदी को वोट देंगे, लेकिन रोज कमाने खाने वाले अब मोदी जी के साथ नहीं जायेंगे

यह पत्रकार पूछता है विधानसभा चुनाव जल्द ही होने वाले हैं क्या लगता है मोदी जी की वजह से पूर्वांचल और बनारस में भाजपा को फायदा मिलेगा? अगले ही पल पांडेजी का जवाब मिलता है, “देखिये भाई साहब, पढ़े लिखे लोग तो मोदी जी को वोट देंगे, वो समय वाली बात समझ भी रहे हैं, लेकिन रोज कमाने खाने वाले अब मोदीजी के साथ नहीं जायेंगे”. क्यूं नहीं जायेंगे, पूछने पर वे कहते हैं, “एक बार बनारस घूम आइये, मुस्कुराना भूल जायेंगे"

गंदगी और जाम से थका हुआ शहर


जब हम पीएम मोदी से बनारस की नाराजगी की वजह ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं तो उसका जवाब हमें समूचे शहर में पसरे जाम और उससे जूझ रही जनता से मिलता है. दवा मंडी में काम कर रहे राजू बताते हैं समूचा बनारस एक पिंजरे जैसा हो गया है, जिसमे घुसने के बाद निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है.

पीएम मोदी जब बनारस से विजयी हुए तो इस बात की सभी को उम्मीद थी कि भीड़ से लड़ रहे शहर को कुछ आराम मिलेगा, कम से कम कुछेक सड़कों को चौड़ा करके, कुछेक नई सडकों का निर्माण करके शहर को जाम से मुक्ति दिलाने की कोशिश की जाएगी.

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बनारस के व्यस्ततम इलाकों में पार्किंग का इंतजाम करके भी स्थिति काफी हद तक बदली जा सकती थी, लेकिन वास्तविक जमीन पर कुछ नहीं हुआ. नृत्य शिक्षक प्रशस्ति कहती है कि मोदीजी के आने के बाद यहां का पर्यटन उद्योग भी प्रभावित हुआ है, लोग भीड़ और गंदगी की वजह से यहां आने से कतराते हैं.

सवाल नियत और संवेदनशीलता का


लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को वोट देने वाला बनारस का मतदाता अपनी मुश्किलों से निजात पाने के लिए अब राज्य सरकार का मुंह नहीं देखता. अपनी सीरत के हिसाब से बनारस शहर और बनारसियों को सारे जवाब पीएम से चाहिए. चाहे वो गंदगी का मसला हो, सड़कों का हों या फिर पानी का जो आजकल दुर्भाग्य से इन गंगा किनारे रहने वालों की किस्मत में भी पैबंद की तरह लग गया है.

कवि धीरेन्द्र उदास मन से कहते हैं कि पीएम मोदी बनारस शहर को लेकर संवेदनशील नहीं है

पेंटर और कवि धीरेन्द्र उदास मन से कहते हैं कि पीएम मोदी बनारस शहर को लेकर संवेदनशील नहीं है. उनके पीएम बनने के बाद जो भी योजनायें बनाई गई वो दीर्घकालीन योजनायें है. जबकि बनारस की जनता ने तो अन्य राजनैतिक दलों से थक हारकर मोदी को चुनाव जितवाया था. धीरेन्द्र कहते हैं यह शहर स्मार्ट सिटी और हाईटेक शहर हो इसे पहले जरुरी है बनारस, बनारस हो. इसके लिए नीयत होनी चाहिए.

बनारसियत को बदलने की कोशिशें


मोदी जी के राज में बनारस की बनारसियत को भी बदलने की कोशिश की जा रही है. घाटों के किनारे लगी रोशनियों को बिजली की बचत के नाम पर हटाकर उनकी जगह सफ़ेद रोशनी लगा दी गई. सुनते हैं कि घाटों को एक ही रंग में रंगने का नया फरमान आया है.

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शहर के मल्लाह इससे बेहद नाराज हैं. उनका कहना है कि गंगा की सफाई की जगह यह नए–नए तरीके आजमाने से अब पर्यटक शाम को घाट किनारे कम आते हैं.

दशाश्वमेघ घाट पर एक दुकान चलाने वाले राजेश कहते हैं कि मोदी के यहां से जीतने के बाद केवल एक चीज हुई है कि लोग घाट किनारे गंदगी करने से गुरेज करते हैं, घाट साफ़ भी हुए हैं. लेकिन गंगा जस की तस है, बनारस शहर वैसे ही गंदगी के ढेर पर बैठा है जैसे पहले बैठा था.

First published: 2 May 2016, 7:44 IST
 
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