राजेन्द्र सिंह: मोदीजी ने हमारी नदियों का पानी कंपनियों को देने का मन बना लिया है

शिरीष खरे | Updated on: 23 June 2016, 7:26 IST
(अभिनव/विकीपीडिया)
QUICK PILL
मैग्सेसे और स्कॉटहोम वाटर जैसे पुरस्कारों से नवाजे गए जल पुरुष राजेन्द्र सिंह का कहना है कि केंद्र की मोदी सरकार जनता के पानी को कंपनियों को देने की तैयारी कर चुकी है. इसके लिए 15 दिन पहले कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है. सात विदेशी कंपनियों ने पानी के व्यवसाय का खाका खींच लिया है. यहां तक कि तालाब, कुंए, बावड़ियों का पानी भी सुरक्षित नहीं. पेश है पानी के निजीकरण, सूखे के कारण और नदियों के पुनर्जीवन पर उनसे हुई बातचीत:

जल संकट और पानी के निजीकरण के बीच मौजूदा केंद्र सरकार की जल नीति को कैसे देखते हैं?

अभी तक पानी सबका था, लेकिन 15 दिन पहले मोदी सरकार देशभर के पानी को केंद्र के अधीन करके निजी कंपनियों के हाथों में सौपने का प्रस्ताव बना चुकी है. नदियों को सूखा बताकर यह पूरी साजिश रची गई है. इस कार्यवाही में पानी का पहले सरकारीकरण और फिर उसकी आड़ में निजीकरण कराया जाएगा.

सात बड़ी विदेशी कंपनियां देश के 80 प्रतिशत पानी पर कब्जा करना चाहती है. बीते साल पानी व्यापार क्षेत्र में 58 हजार करोड़ का व्यापार हुआ. यह जानकर हैरत होगी कि एक सरकारी आदेश में कहा जा चुका है कि स्थानीय निकाय यदि जल संरचनाओं का रखरखाव नहीं कर पा रही हैं तो इन्हें निजी हाथों को सौंप दिया जाए.

छत्तीसगढ़ में महानदी जैसी नदियों पर ऊर्जा संयंत्र परियोजनाओं के लिए बड़े-बड़े बांध बनाने से क्या राज्य का जल-प्रबंधन प्रभावित होगा?

बिल्कुल, इससे पानी का गलत इस्तेमाल भी बढ़ेगा. बड़े बांधों से नदियों का प्रवाह प्रभावित होता है और यह डूब और विस्थापन जैसी समस्याओं के अलावा कई दूसरी आफतों को जन्म देता है. जैसे छत्तीसगढ़ सहित 13 राज्यों में जो सूखा आया है वह नदियों के पानी के साथ छेड़छाड़ का नतीजा भी है. 

महाराष्ट्र जैसा राज्य जहां सबसे ज्यादा बांध बनाए गए हैं, आज सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में है. दरअसल, सरकार ने नदियों का प्रवाह खत्म कर दिया है. इसलिए सरकार को भी इस दुष्काल से सबक लेते हुए नदी के जीवन के अधिकार के बारे में सोचना चाहिए.

छत्तीसगढ़ की नदियों को प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए किस चीज की सबसे अधिक जरूरत है?

हर राज्य की सरकार के मन में पानी के बदले पैसा कमाने का रोग लग गया है. इसलिए लोगों के पानी को प्रदूषित करना, उन्हें बीमार करना उद्योगों का काम हो गया है. इसके चलते भी पानी का संकट पैदा हुआ है. 

इसे रोकने के लिए हर नदी और गंदे नाले दोनों के प्रवाहों को अलग-अलग करना जरूरी है. राजधानी रायपुर में बहने वाली खारुन नदी तक का यही हाल है, जबकि खारुन जैसी नदियों को बचाना इसलिए बहुत आसान है.

बीते दिनों अरपा सहित कई नदियों पर कब्जे के प्रकरण भी सामने आए. इन पर लगाम कैसे लगाई जा सकती है?

यहां जितनी भी जल-संरचनाएं हैं, उनकी भूमि का चिन्हांकन और सीमांकन करना होगा. राज्य सरकार सरकारी अध्यादेश जारी कर कलक्टर को तीन महीने के भीतर इस काम को पूरा करने का निर्देश दे. दूसरा, जल योजनाओं का सारा काम ठेकेदारों को दे दिया गया है. 

उनके इंजीनियर कंपनियों को अधिकतम फायदा पहुंचाने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बना रहे हैं, जबकि ऐसे कामों को सामुदायिक विकेन्द्रीकरण के मॉडल पर पूरा किया जाना चाहिए.

सूखे को ध्यान में रखते हुए यदि छत्तीसगढ़ की कृषि-नीति बनाने की सोचे तो इसमें किन बातों का ध्यान रखेंगे?

छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों की कृषि नीति यदि इस इलाके के फसल चक्र के हिसाब से नहीं बनी तो कितने भी बांध बना लो, फसल बचाना मुश्किल है. छत्तीसगढ़ को फसल और मानसून चक्र के बीच संबंधों को स्थापित करने वाली कृषि नीति चाहिए.

सरकार यहां के कृषि विश्वविद्यालय को इस बात के लिए पाबंद करें कि वे पारिस्थितिकी जलवायु और विविधता का सम्मान करते हुए बताएं कि किस क्षेत्र में कौन सी फसल उगाएं या किस क्षेत्र में कौन सी फसल न उगाएं. यह काम कृषि विभाग मौसम विभाग और अनुभवी किसानों के साथ बैठकर तय कर सकता है.

15 साल पहले आप छत्तीसगढ़ आए थे. तब से अब तक यह आदिवासी बहुल राज्य कितना पानीदार बचा है?

बीते 15 वर्षों में यहां की कई नदियां सूख गईं. यह ऐसा कालचक्र है जिसमें राज्य चलाने वालों की आंखों का पानी सूख गया है और नेता ठेकेदारों को आगे करके मुनाफा कमाने में लग गए हैं. बिलासपुर शहर के पास अरपा नदी से खेतों में रेत उड़कर आने लगी है. वहां से नया रेगिस्तान शुरू हो रहा है.

प्रदेश में जल, जंगल और जमीन का क्षेत्र घट रहा है और यहां का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो गया है. ऐसी परिस्थिति में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को चाहिए कि वे नदियों के अधिकार ठेकेदारों की बजाय लोगों के हाथों में सौंपें.

राज्य सरकारों को आप अपना पानी बचाने के क्या उपाय सुझाएंगे?

सबसे पहले तो भूजल भंडारण, प्रदूषण, हरियाली, मिट्टी के कटाव, नदी में गाद जमाव और जल प्रवाह जैसी बातों से जुड़ी जानकारियों के लिए 'जल साक्षरता केंद्र' बनाए जाएं. नदियों के अलावा तालाबों पर �

First published: 23 June 2016, 7:26 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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