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मार्कण्डेय काटजू: मोहनिया की गिरफ्तारी गैरजरूरी और केंद्र के दुराग्रह का नतीजा

मार्कण्डेय काटजू | Updated on: 26 June 2016, 18:42 IST

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विधायक दिनेश मोहनिया को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन पर आरोप है कि उन्होंने कुछ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया, जब वे अपने क्षेत्र में पानी संकट से उन्हें अवगत कराने गईं थीं. मैं इस सवाल पर नहीं जा रहा हूं कि आरोप सच हैं अथवा गलत. इसका फैसला तो साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट करेगा. मेरे पास इसका कोई सबूत भी नहीं है, इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं करूंगा.

हालांकि मैं भी मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों की थोड़ी बहुत जानकारी रखता हूं. मोहनिया को गिरफ्तार करने की क्या जरूरत थी? मेरे विचार से पुलिस को जांच करनी चाहिए थी और मोहनिया को गिरफ्तार किए बिना उनसे पूछताछ करनी चाहिए थी. मैं बताता हूं इस मामले में कानूनी पहलू क्या कहते हैं?

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यहां यह उल्लेखनीय है कि हर उस मामले में गिरफ्तारी जरूरी नहीं है जहां पुलिस संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करती हो. सीआरपीसी की धारा- 157 (1) में इसके दिशा निर्देश तय हैं.

157 जांच की प्रक्रिया के बारे में है-

(1) यदि किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी को किसी जानकारी के मिलने पर या किसी और वजह से ऐसे अपराध के होने का संदेह हो जिसकी जांच करने का उसे धारा 156 के तहत अधिकार है तो वह किसी सक्षम मजिस्ट्रेट को इसकी रिपोर्ट भेजेगा और या तो खुद वहां जाएगा या अपने मातहत किसी ऐसे अधिकारी को वहां तथ्यों और परिस्थितियों की जांच के लिए भेजेगा, और यदि जरूरी हो तो आरोपित को ढूंढऩे और गिरफ्तार करने का आदेश भी ऐसे अधिकारी को देगा जो राज्य सरकार द्वारा तय की गई रैंक से नीचे का न हो.

इस प्रावधान में मौजूद शब्द- 'यदि जरूरी हो' से स्पष्ट है कि पुलिस के सामने हर मामले में गिरफ्तार कर लेने जैसी कोई बाध्यता नहीं है बल्कि ऐसा करना उसके विवेक पर छोड़ दिया गया है.

हां, यदि मामला हत्या, डकैती, बलात्कार या अन्य किसी ऐसे अन्य गंभीर किस्म का है तब उसकी गिरफ्तारी न्यायोचित ठहराई जा सकती है. पर मोहनिया का यह मामला किसी ऐसी प्रकृति का नहीं है.

जोगिंदर कुमार बनाम यूपी राज्य (ए आई आर 1994 एससी 1349) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है- किसी को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस अधिकारी कानूनन ऐसा कर सकते हैं. किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार होना एक बात है और ऐसा करने को जायज ठहराना बिल्कुल अलग बात. गिरफ्तारी को उचित ठहराना किसी पुलिस अधिकारी के लिए बेहद जरूरी है. किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आत्मविश्वास को गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत से अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है.

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सामान्य तरीके से केवल लगाए गए आरोप के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. किसी पुलिस अधिकारी को एक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों और खुद के हितों की रक्षा के लिए भी, तब तक गिरफ्तार नहीं करना चाहिए जब तक कि जांच के बाद वह एक हद तक शिकायत की सत्यता और इस विश्वास पर न पहुंचा हो कि कि आरोपित ने अपराध किया है और उसे गिरफ्तार करने की आवश्यकता है. किसी व्यक्ति से उसकी आजादी छीनना एक गंभीर मामला है.

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि हर मामले में गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है. अपने इसी निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की तीसरी रिपोर्ट का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि भारत में 60 फीसदी गिरफ्तारियां अनावश्यक और अनुचित होती हैं. और यही गिरफ्तारियां पुलिस में भ्रष्टाचार की बड़ी वजह है.

दुर्भाग्य से हमारे देश में एफआईआर दर्ज होने के साथ ही पुलिस किसी को भी गिरफ्तार करने निकल पड़ती है. यह अवैध प्रक्रिया है जिसका वर्णन ऊपर किया गया है.

मेरे विचार से मोहनिया की इस मामले में गिरफ्तारी अनावश्यक थी. यदि पुलिस इस मामले में मोहनिया से पूछताछ और जांच की इच्छा रखती तो वह उन्हें बिना गिरफ्तार किए ही ऐसा कर सकती थी. वह कहीं भागे तो जा नहीं रहे थे. अब समय आ गया है कि सभी पुलिस कर्मियों को अपनी सही कानूनी स्थिति की जानकारी हो.

आप नेताओं ने आरोप लगाया है कि मोहनिया की गिरफ्तारी केन्द्र सरकार के गलत कामकाज का एक उदाहरण है. मुझे यह नहीं मालुम कि मोहनिया पर लगाए गए आरोप सही हैं या गलत, पर यदि यह सच हैं तो संबंधित पुलिस अधिकारी, जिन्होंने अपने राजनीतिक आकाओं से यह अवैध आदेश लिया है, इस गड़बड़ी की जवाबदेही से मुंह नहीं मोड़ सकते.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद न्यूरमबर्ग ट्रायल में नाजी वार क्रिमिनल्स ने भी यही ऑर्डर्स ऑफ ऑर्डर्स की दलील दी थी. और वे केवल अपने राजनीतिक आका हिटलर के आदेशों का पालन कर रहे थे. हालांकि उनकी यह अपील खारिज कर दी गई और उनमें से कई आरोपियों को फांसी दे दी गई थी.

तो हमारे पुलिस अधिकारियों को इस संकेत पर ध्यान देना चाहिए: वे राजनीतिक आकाओं या अपने वरिष्ठों का कोई अवैध आदेश नहीं मानेंगे चाहे वह लिखित में हो या मौखिक. अन्यथा उन्हें भी कड़ा दंड दिया जा सकता है.

(यह लेख मूल रूप से जस्टिस काटजू के ब्लॉग सत्यम ब्रुयात पर अंग्रेजी भाषा में छपा है)

First published: 26 June 2016, 18:42 IST
 
मार्कण्डेय काटजू @mkatju

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश.

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