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दबे पांव भारत में घुस रहा है मंकी फीवर

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • डेंगू और इबोला से ज्यादा खतरनाक वायरस पश्चिमी घाट में तेजी से फैल रहा है. मंकी फीवर का असर अब कर्नाटक से बाहर के इलाकों में तेजी से फैल रहा है.
  • मंकी फीवर के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका टीका काफी पुराना हो चुका है और यह एक निश्चित उम्र के लोगों पर ही असर करता है.

जीका वायरस से फिलहाल पूरी दुनिया परेशान है. परेशानी की सबसे बड़ी वजह दुनिया के अन्य देशों में इसके फैलने की संभावना है. इस बीच डेंगू और इबोला से ज्यादा खतरनाक वायरस पश्चिमी घाट में तेजी से फैल रहा है. मंकी फीवर कभी कर्नाटक तक ही सिमटा हुआ था लेकिन अब यह तेजी से फैल रहा है. 

मंकी फीवर को आधिकारिक तौर पर केफडी के नाम से जाना जाता है. हालांकि अब गोवा और तमिलनाडु में मंकी फीवर के मामले सामने आए हैं. पिछले साल यह वायरस केरल में दिखा था और इस साल इसकी धमक महाराष्ट्र में देखने को मिली है.

डेंगू और इबोला से ज्यादा खतरनाक वायरस मंकी फीवर तेजी से पश्चिमी घाट में तेजी से फैल रहा है

हर साल मंकी फीवर से 10-15 लोगों की जान जाती है. सिरदर्द, खुजली, शरीर में दर्द और तेज बुखार इसके लक्षण हैं. इसका टीका 1960 में खोजा गया था जो अब पूरी तरह से बेकार हो चुका है. 

केएफडी पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले टिक से फैलता है. इसे पहली बार कर्नाटक के सिमोगा जिले के कसानूर जंगल के एक बीमार बंदर में 1957 में देखा गया था. यह वायरस कई जानवरों को संक्रमित करता है लेकिन केवल बंदर के भीतर ही इससे लड़ने की क्षमता होती है. इंसान भी टिक के संपर्क में आकर इससे संक्रमित हो सकते हैं. बंदर के कंकाल से भी इस बीमार के फैलने की आशंका रहती है.

इस साल उत्तरी गोवा के एक तालुका में ही इस वायरस से सात लोगों की मौत हो गई. गोवा के स्वास्थ्य विभाग पर इसके टीकाकरण के मामले में लापरवाही बरतने का आरोप लग रहा है. केरला के वायनाड जिले में भी 2013 से इस वायरस के मामले सामने आए हैं और पिछले साल तीन लोगों की मौत भी हो गई.

इस साल पहली बार यह वायरस महाराष्ट्र में भी दिखा. इससे एक लोग की मौत हो चुकी है और सिंधुदुर्ग जिले में करीब 20 लोगों के संक्रमित होने की खबर है. सिंधुदुर्ग गोवा बॉर्डर से लगा हुआ जिला है. मराठी दैनिक लोकसत्ता ने इस बारे में खबर दी है. बंदरों के मरने की वजह से यहां के लोगों के संक्रमित होने का खतरा बढ़ गया है. कर्नाटक के विशेषज्ञ फिलहाल इस इलाके में पहुंच चुके हैं ताकि इस बीमारी को रोकने के उपाय किए जा सके.

भारी पड़ सकती है चूक

मंकी फीवर को हल्के में नहीं लिया जा सकता. यह सच है कि इससे संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या बेहद कम है लेकिन संक्रमित हो जाने के बाद डेंगू के मरीजों के मुकाबले इसके मरीज के मरने की संभावना ज्यादा होती है. मंकी फीवर की वजह से होने वाला मृत्यु दर 3-5 फीसदी है जबकि डेंगू से संक्रमित मरीजों के मरने की संभावना 0.2-0.5 फीसदी होती है.

मंकी फीवर संक्रमण से फैलता है लेकिन यह इंसानों के बीच नहीं फैलता. फिलहाल इसे बायोसेफ्टी लेवल 4 में रखा गया है जो पैथोजेंस के लिए सबसे खतरनाक श्रेणी है. इबोला वायरस भी इसी श्रेणी में रखा गया है.

सावधानी ही बचाव

मंकी फीवर के टीके की खोज 1960 में ही कर ली गई थी लेकिन कर्नाटक के भीतर ही इसका प्रसार बेहद खराब रहा है. जबकि कर्नाटक में यह बीमारी 50 साल पहले ही खोज ली गई थी. 2006-11 के बीच किए गए दो शोध के मुताबिक देश में इसके टीके की भारी कमी है.

हालांकि यही समस्या नहीं है. टीके को 1960 के बाद से अभी तक सुधारा नहीं गया है. यह केवल 7-65 साल की उम्र के लोगों के बीच ही काम करता है और फिलहाल अधिकांश मरीज इसके दायरे से बाहर हैं.

गोवा के स्वास्थ्य मंत्री फ्रांसिस डिसूजा ने जनवरी में विधानसभा में बताया कि लोग इस वायरस के टीके को लेकर उत्साहित नहीं है. कैच ने मणिपाल सेंटर फॉर वायरस रिसर्च के हेड जी अरुण कुमार ने बताया, 'जो भी लोग इस वायरस से संक्रमित हो रहे हैं वह जंगल के पास रहने वाले लोग हैं और गरीब हैं. टीकाकरण से बांह में दर्द होता है और इस वजह से लोग टीका लेने से कतराते हैं.' अरुण कुमार बताते हैं कि हमें और बेहतर टीका बनाने की जरूरत है. 

पिछले दशक में किए गए शोध में यह बात सामने आई कि पहले के मुकाबले अब इस टीके का असर भी कम हो चुका है. ऐसा लगता है कि अभी तक इस दिशा में कोई सुधार नहीं किया गया है जबकि इस तरह के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 

First published: 6 February 2016, 12:14 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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