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यमुना डूब क्षेत्र को फिर से संवारने में 100 करोड़ रुपये होंगे खर्चः सीआर बाबू

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
श्री श्री रवि शंकर के आर्ट ऑफ लिविंग के महायोजन पर हुए भारी विवाद के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इसे अनुमति दे दी है. पांच करोड़ के हर्जाने के बाद एनजीटी ने यह आदेश दिया. अब शुक्रवार से इस आयोजन की शुरुआत होगी.इस आयोजन से यमुना के डूब क्षेत्र में होने वाले संभावित नुकसान का आकलन करने के लिए गठित समिति में शामिल दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर सीआर बाबू कहते हैं कि कोई भी कदम उठाने के लिए अब काफी देर हो चुकी है.डूब क्षेत्र में अबतक हो चुके नुकसान की भरपाई करने में कम से कम 100-120 करोड़ रुपये और तीन साल का वक्त लगेगा. श्री श्री के इस आयोजन से होने वाले कुछ प्रभाव अब यहां पर दिखने शुरू भी हो चुके हैं. इस डूब क्षेत्र की पारिस्थिकी के अंग यानी पेड़ों पर रहने वाले तमाम पक्षी यहां से जा चुके हैं.कैच से बातचीत में इस स्थल का विस्तृत सर्वेक्षण करने वाले प्रो. बाबू यमुना नदी को हुए नुकसान के बारे में चर्चा करते हैं. वो कहते हैं कि जिस नदी के पुनर्उद्धार के लिए केंद्र सरकार हजारों करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है उसे और नुकसान पहुंचाया जा रहा है.

क्या आप यमुना डूब क्षेत्र को हुए नुकसान की कुछ जानकारी साझा करेंगे, जिसकी रिपोर्ट आपने एनजीटी को सौंपी थी?

मैंने वहां देखा कि डूब क्षेत्र को पूरी तरह समतल कर दिया गया था. इसका भूजल स्तर को बढ़ाने पर काफी उलट प्रभाव पड़ेगा. इसके परिणामस्वरूप बाढ़ के पानी के प्रवाह में कमी भी हो जाएगी.

इससे यहां की प्राकृतिक स्थिति भी काफी बदल गई है जो क्षेत्र की पारिस्थिकी का भी गंभीर नुकसान का कारण बनेगी.

दूसरा, लोगों ने यहां के कुछ वेटलैंड्स को भी ढक दिया है. इनमें से कुछ वेटलैंड्स का इस्तेमाल बारापुला सीवेज के शोधन में किया जाता था. यह पारिस्थिकी प्रक्रिया अब खत्म हो गई है. उन्होंने कुछ अन्य वेटलैंड्स को भी बेकार कर दिया है.

तीसरा, उन्होंने वहां सड़कें भी बना दी हैं जिससे वहां की वनस्पतियां तबाह हो गईं. जिन स्थानों पर उन्होंने रास्ते बनाए हैं वो काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे. इन स्थानों पर पक्षियों और स्थानीय जीवों का निवास स्थान था, जो अब खत्म हो गया है.

इस क्षेत्र को फिर से सही करने में पैसों और वक्त के हिसाब से मरम्मत में कितना खर्च आएगा?

इस क्षेत्र में हुई पूरी तबाही को ठीक करने में काफी वक्त लगेगा. रिपोर्ट में हमने सुझाव दिया है कि इसकी मरम्मत में लगने वाले धन का भुगतान आयोजकों द्वारा किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हीं ने इसे तबाह और प्रदूषित किया है.

मेरा अनुमान है कि इस नुकसान की भरपाई में कम से कम 100-120 करोड़ रुपये लगेंगे. जबकि वक्त के लिहाज से इस क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में दो से तीन वर्षों का वक्त लगेगा. जिसके बाद प्रकृति स्वयं अपना काम कर इसे सही करेगी. 

अपने साक्षात्कारों में श्री श्री रवि शंकर ने दावा किया था कि इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए क्षेत्र को कोई भी नुकसान नहीं पहुंचाया गया. क्या वो सही थे या नहीं?

उन्होंने उस डूब क्षेत्र को समतल करवा दिया जहां तमाम जलीय पौधे थे. वो शायद सोच रहे होंगे कि उन्होंने डूब क्षेत्र में कोई भी दृश्य या भौतिक नुकसान नहीं पहुंचाया, लेकिन उन्होंने वहां की प्राकृतिक स्थिति और वहां के प्रक्रियाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. जिसके बारे में उन्हें शायद कोई जानकारी नहीं है.

कुछ लोग बहस कर रहे हैं कि जिसका ऑर्ट ऑफ लिविंग द्वारा दावा भी किया जा रहा है कि अस्थायी निर्माण के लिए किसी भी विभाग से किसी औपचारिक अनुमति की जरूरत नहीं होती, क्या यह सही है? इसके अलावा संस्था के लोग दावा भी कर रहे हैं कि उनके पास सभी जरूरी अनुमति हैं.

यमुना नदी के डूब क्षेत्र में किसी भी प्रकार की गतिविधि के लिए एनजीटी के सख्त आदेश है कि इससे पहले उनकी अनुमति बहुत जरूरी है. अगर एनजीटी या इसकी प्रारंभिक समिति ने इसकी अनुमति नहीं देती तो यमुना के किनारे कोई भी आयोजन नहीं हो सकता.

दूसरी बात कि अगर उनके पास कुछ जगहों से अनुमति थी भी तो भी उन्होंने निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया. उदाहरण के लिए आप नदी के 100 मीटर किनारे तक कोई भी गतिविधि नहीं कर सकते लेकिन उन्होंने नदी से जुड़ती हुए सड़कें तक बना दीं.

और अगर इन अनुमतियों और औपचारिकताओं को दरकिनार भी कर दिया जाए तो भी हकीकत यह है कि डूब क्षेत्र पहले से ही काफी तनाव में थे. अगर यहां कोई ऐसा आयोजन होता है जिसमें 35 हजार से ज्यादा लोग शामिल होते हैं, तो यह डूब क्षेत्र पर काफी नुकसान और बोझ डाल देगा.

अब जब एनजीटी ने अपना आदेश साफ कर दिया है, तो क्या आपको लगता है कि ऊपरी अदालत में जाने से मदद मिलेगी?

अब बहुत देर हो चुकी है. 95 फीसदी काम हो चुका है और इसे रोकने से मामले का हल नहीं निकलेगा. यह बहुत पहले होना चाहिए था.

First published: 10 March 2016, 4:40 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

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