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BRICS: कुछ सवाल के जवाब पीएम मोदी को देेने चाहिए

विवेक काटजू | Updated on: 21 October 2016, 8:08 IST
QUICK PILL
  • मोदी सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाक को अलग-थलग करने का राग अलापना बंद करना होगा. सार्क सम्मेलन के सफल बहिष्कार के अलावा इससे क्या हासिल हुआ? 
  • इसके बजाय भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह मांगे करनी चाहिए कि वह पाक पर आतंकवाद खत्म करने का दबाव डाले. 

हाल ही में संपन्न ब्रिक्स और बिम्सटैक सम्मेलन से कुछ सवाल खड़े हुए हैं, जिनके जवाब दिए जाने जरूरी हैं. सवाल ये कि क्या मोदी आतंक और पाकिस्तान की बात पर कुछ ज्यादा ही बोल गए? क्या मोदी की पाकिस्तान को चारों ओर से घेरने की कूटनीति सफल साबित हुई? क्या इससे यह साबित हुआ कि भारत जैसा ताकतवर देश अपने से कहीं कमतर पड़ोसी के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्ती बरत रहा है?

इन सवालों का ईमानदार जवाब मिलना जरूरी हैं. वो इसलिए क्योंकि आजकल मोदी जो कुछ भी करते या नीति बनाते हैं, उसे किसी न किसी तरह की बंटवारे की राजनीति में बदलते देखा गया है. विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर जनता से संवाद के समय कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी सतर्कता का ध्यान नहीं रखा गया. 

पाकिस्तान का नाम लिए बगैर मोदी ने उस पर दो बार वार किया. ब्रिक्स सम्मेलन के शुरूआत में एक क्लोज़ सेशन में नेताओं के बीच मोदी ने पाकिस्तान को आतंकवाद की जननी कहा. उन्होंने कहा दुनियाभर में फैले आतंकी अपनी जननी से जुड़े हैं. पाकिस्तान आतंकवाद को खाद-पानी दे रहा है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक स्तर पर कर रहा है. चूंकि क्लोज़ सेशन में बहस ऑफ द रिकॉर्ड होती है और सेशन में की गई बहस और दलीलों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है. लेकिन अगर कोई देश अपने नेता के किसी बयान को सार्वजनिक करता है तो उस पर कोई पाबंदी नहीं है.

सम्मेलन में मोदी ने कहा, 'पाकिस्तान ने शर्मिंदगी की हद तक आतंकवाद फैलाया है. आतंक पाकिस्तान की सबसे चहेती संतान बन चुका है और अब यह अपने जनक का मूल चरित्र और स्वभाव उजागर कर रहा है'.

सुधर जाएं या अलग हो जाएं

इसके अलावा भी मोदी ने कई मौक़ों पर पाकिस्तान को आड़े हाथ लिया. इससे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पाक पर कड़े शब्दों की इतनी बौछार नहीं की जितनी मोदी ने गोवा में 16 अक्टूबर को एक दिन में कर दी. मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर उस पर निशाना साधते हुए कहा ‘जो देश आतंक को खाद-पानी देते हैं और मानवता के खिलाफ काम करते हैं, हमें उन्हें साफ तौर पर संदेश देना होगा कि वे या तो सुधर जाएं या सभ्य समाज से अलग हो जाएं.’

बहरहाल, गोवा घोषणा पत्र में आतंकवाद पर पांच पैराग्राफ लिखे गए. इसमें उच्च सिद्धान्तों की बात दोहराई गई और संगठनों को निशाना बनाया गया लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिया गया. 

गोवा घोषणा पत्र में भारत के लिए राहत की बात यह है कि वह पाक को सबक सिखा सकता है; क्योंकि इसमें कहा गया है कि आतंकी ठिकानों का खत्मा किया जाना चाहिए और हर देश को अपनी जमीन से हो रही आतंकी कार्रवाई को रोकने की जिम्मेदारी उठानी होगी. इससे हो सकता है कि मोदी की कोशिशों को संतोषजनक मुकाम मिल जाए.

ब्रिक्स सममेलन से निकले नतीजों पर बोलते हुए मोदी ने कहा, ‘हम यह भी मानते हैं कि जो देश आतंकवाद को पनाह देते हैं या उसे खाद-पानी मुहैया करवाते हैं, वे भी हमारे लिए उतने ही खतरनाक हैं, जितने कि आतंकी. सम्मेलन में किसी और देश के नेता ने शायद ही पाकिस्तान के खिलाफ कुछ कहा हो लेकिन अध्यक्ष होने के नाते मोदी को ऐसा बोलने का अधिकार है. हालांकि ऐसे वक्तव्य औपचारिक घोषणाओं का हिस्सा नहीं बनते, यही बड़ी बात है.

तो क्या पाक को अलग-थलग करने के मोदी के सारे प्रयास विफल साबित हुए और क्या कूटनीतिज्ञ गोवा घोषणा पत्र पर बात करने में विफल रहे?

दुनिया की बड़ी ताकतें समझ चुकी हैं कि उरी हमले के बाद भारत ने पाक को साफ बता दिया है कि वह पाक की ओर से और अधिक आतंक बर्दाश्त नहीं करेगा. 1990 के बाद से भारतीय सेना ने कभी पाक अधिकृत क्षेत्र में जाकर कार्यवाही नहीं की थी. बस, कुछ छिटपुट ही कार्यवाहियों को अंजाम दिया था.

भारत का रुख़

ब्रिक्स सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग भी शामिल हुए थे और यह सही मौका था जब मोदी ने पाकिस्तान के प्रति भारत की बदली हुई नीति का संकेत दिया. हालांकि मोदी यह भी जानते हैं कि ब्रिक्स नेता भारत की इस नई नीति का समर्थन नहीं करेंगे लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इस बारे में बात करना जरूरी था ताकि चीन और रूस जैसे पाकिस्तान के मित्र राष्ट्रों को बताया जा सके कि अगर पाक उसके खिलाफ आतंकी कार्रवाई करेगा तो भारत कड़ा जवाब देगा.

जो देश आतंकवाद को राजनीतिक समस्या समझाते हैं, उन पर महाश्क्तियों का दबाव रहता है कि वे इसका प्रतिकार करें लेकिन अक्सर हिंसक कार्यवाहियों को बढ़ावा देने वाले देशों पर यह दबाव नहीं रहता. जनता के सामने सारी बातें नही आतीं, कूटनीति पर्दे के पीछे से की जाती है.

इसीलिए, चीनी राष्ट्रपति ने मामले के राजनीतिक हल का आह्वान किया और बाद में चीनी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान की तारीफें की, यह विरोधाभास समझ से परे है. मोदी की ब्रिक्स कूटनीति पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; वे अपनी बात इस मंच पर रख चुके हैं और चीन व दूसरी महाशक्तियों को इस बारे में सावधानीपूर्वक विचार करना होगा.

मोदी सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाक को अलग-थलग करने का राग अलापना बंद करना होगा. सार्क सम्मेलन के सफल बहिष्कार के अलावा इससे क्या हासिल हुआ? इसके बजाय भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह मांगे करनी चाहिए कि वह पाक पर आतंकवाद खत्म करने का दबाव डाले. साथ ही यह तथ्य भी खुलकर सबके सामने लाए कि पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई में क्या बलिदान कर रहा है. दूसरा, वह अपने ही देश के आतंकी गुटों के खिलाफ कार्यवाही कर रहा है, जो उसने पाले और आज पाक सरकार के ही खिलाफ खड़े हैं. तब जाकर कहीं माना जाएगा कि पाक कोई बलिदान कर रहा है.

First published: 21 October 2016, 8:08 IST
 
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