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मध्य प्रदेश 23 साल से शेर मांग रहा है, मंत्रीजी कह रहे हैं किसी ने मांगा ही नहीं

शैलेंद्र तिवारी | Updated on: 13 August 2016, 7:46 IST
(एजेंसी)

एशियाई शेरों (गिर के सिंह) को मध्य प्रदेश में लाने की प्रक्रिया पिछले 23 सालों से चल रही है. बावजूद इसके शेर अभी तक वहां नहीं आ सके हैं.

जबकि खुद केंद्र सरकार का वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इसकी नोडल एजेंसी है और मजे की बात यह है कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे कह रहे हैं कि उनसे किसी ने शेरों की मांग ही नहीं की.

जबकि अभी मई में ही प्रदेश सरकार ने रिमाइंडर भेजकर शेरों को जल्द देने का आग्रह मंत्रालय से किया था. दरअसल, पिछले दिनों संसद में जवाब देते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने कहा था कि मध्य प्रदेश ने हमसे कभी गिर के शेर मांगे ही नहीं हैं.

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जबकि महत्वपूर्ण बात यह है कि शेरों को मध्य प्रदेश भेजने की प्रक्रिया की शुरुआत करने वाला खुद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ही है.

उसने ही वर्ष 1993 से गिर के सिंह को दूसरा घर ढूंढ़ने की शुरुआत कर दी थी. पत्रिका के पास मौजूद दस्तावेज खुलासा करते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ही वह कड़ी हैं, जो एशियाई शेरों को गिर से मध्यप्रदेश के कूना अभ्यारण्य लाने की कोशिशों में जुटा हुआ था.

दस्तावेजों के मुताबिक, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वर्ष 1986 में गिर के सिंहों के जीवन और भविष्य पर रिसर्च शुरू की थी. इसका मकसद एशियाई शेरों के अस्तित्व को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए जरूरी उपाय थे.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एशियाई शेर पूरी दुनिया में सिर्फ गुजरात के गिर में ही पाए जाते हैं. ऐसे में इन्हें कोई दूसरा ठिकाना भी देने की वकालत यहीं से शुरू हुई.

ऐसे हुई शेरों के नए ठिकाने की शुरुआत

  • 1986- केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वर्ष 1986 में गिर के शेरों के जीवन और भविष्य पर शोध शुरू किया.
  • 1993- गिर के शेरों के लिए दूसरा घर ढूंढने पर सहमति बनी, राजस्थान और मध्यप्रदेश के तीन अभ्यारण्य चुने गए और आखिर में कूनो को तय पाया गया.
  • 1995- केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मध्य प्रदेश को सेंचुरी का नोटिफिकेशन जारी करने को कहा.
  • 1996- मप्र ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अपना प्रस्ताव भेजा.
  • 2000- केंद्र सरकार ने कूनो को शेरों के लिए नोटिफाई कर दिया.
  • 2004- केंद्र सरकार ने हाई पावर कमेटी बनाई, जिसे प्रोजेक्ट की मॉनिटिरिंग का जिम्मा दिया.
  • 2005- गिर के शेरों को कूनो में शिफ्ट करने की आखिरी तारीख थी, बावजूद इसके शेर अभी तक नहीं आ पाए हैं.

शेरों के लिए जांचा-परखा गया है कूनो

इस रिचर्स का प्रजेंटेशन सात साल बाद अक्टूबर 1993 में गुजरात के वड़ोदरा में हुआ, जहां पर इन शेरों के लिए नया घर तलाशने की बात हुई. उसके बाद विकल्प के तौर पर तीन नए ठिकाने सुझाए गए. जिनमें राजस्थान के दर्राह-जवाहरसागर और सीतामाता सेंचुरी थीं, जबकि मध्य प्रदेश से कूनो अभ्यारण्य को चुना गया.

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इसमें तय हुआ कि एक विशेषज्ञों की कमेटी इन तीनों जगहों का सर्दी, गर्मी और बरसात के मौसम में सर्वे करेगी, जानेगी कि क्या यह ठिकाने इन शेरों के लिए मुफीद हैं.

मशहूर वैज्ञानिक रवि चेलम, जूस्टस जोसवा, चिस्त्री ए विलियम और एजेटी जोन्हसिंग ने इन तीनों जगहों का सर्वे किया. अपनी सर्वे रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के कूनो अभ्यारण्य को सबसे मुफीद बताया गया और कहा गया कि यहां पर गिर के शेरों को दूसरे घर के तौर पर रखा जा सकता है. यहां उन्हें मौसम और दूसरी तरह की किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा.

एजेंसी तो बनाई, लेकिन शेर नहीं मिले

इस ड्राफ्ट के बाद काम और तेजी से आगे बढ़ा और 24 जुलाई 1996 को मध्य प्रदेश शासन के सचिव (वन) ने केंद्रीय वन मंत्रालय को पत्र लिखकर कूनो का एरिया एशियाई शेरों के लिए नोटिफाई करने की मंजूरी मांगी.

जिस पर साल 2000 में केंद्र सरकार ने मंजूरी भी दे दी. इसके साथ ही एशियाई शेरों के नए घर के लिए 20 साल की कार्ययोजना भी बना दी गई.

जिसके तहत 1995 से 2000 के बीच तक एरिया नोटिफिकेशन और दूसरी तकनीकी अड़चनों को दूर करना. 2000 से 2005 तक शेरों को कूनों में शिफ्ट करना और उनकी रिसर्च और मॉनिटिरिंग करना.

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इस काम को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए 10 मार्च 2004 में केंद्र सरकार ने एक हाई पावर कमेटी भी गठित कर दी, जिसे इस पूरे काम की मॉनिटिरिंग का जिम्मा सौंपा गया.

बावजूद इसके अभी तक काम अधूरा पड़ा हुआ है. शेर अब तक नहीं आ पाए हैं. इस मामले में सोशल एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि जो मंत्रालय खुद इस पूरे काम में नोडल की भूमिका निभा रहा है, वही अब कह रहा है कि शेर मांगे किसने हैं?

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यह बात बहुत ही हास्यास्पद है. जो शेर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय 2005 में मध्य प्रदेश के कूनो में शिफ्ट कर रहा था, उसे अभी तक शिफ्ट नहीं किया जा सका है.

अब तो शेर दे दो

मध्य प्रदेश के पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ रवि श्रीवास्तव ने 12 मई को वन विभाग के ज्वाइंट सेक्रेटरी (वाइल्ड लाइफ) को रिमाइंडर पत्र भेजा है. जिसमें कहा है कि गिर में जुलाई 2015 में आई बाढ़ से 10 एशियाई सिंहों की मौत हुई है.

इन शेरों के अस्तित्व को बचाने के लिए इसी तरह के खतरे की चेतावनी वैज्ञानिक दे चुके हैं. ऐसे में हमें तत्काल शेरों को मध्य प्रदेश भेजने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए.

First published: 13 August 2016, 7:46 IST
 
शैलेंद्र तिवारी @catchhindi

लेखक पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं.

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