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राजस्थान पत्रिका के सरकारी विज्ञापनों पर रोक का मुद्दा लोकसभा में उठा

पत्रिका ब्यूरो | Updated on: 3 August 2016, 23:29 IST
(पत्रिका)

केंद्र और राजस्थान सरकार की ओर से राजस्थान पत्रिका को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर अघोषित रोक का मामला मंगलवार को लोकसभा में उठा. सांसद कांतिलाल भूरिया ने शून्यकाल में यह मामला सदन के सामने उठाया.

उन्होंने तीन बार सदन में खड़े होकर इस मामले उठाने की कोशिश की. इसके बाद भी जब आसन की अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने संबंधित कागजात सदन के पटल पर रख दिए. पटल पर रखे अपने वक्तव्य में भूरिया ने कहा कि इस तरह से मीडिया के विज्ञापनों पर रोक लगाना लोकतंत्र विरोधी है. ऐसी कार्यवाही से सरकार की छवि पर निश्चित रूप से प्रश्नचिह्न लगता है.

सदन की कार्यवाही के बाद भूरिया ने पत्रिका को बताया कि उन्होंने मामले को टेबल कर दिया. अब सरकार को जवाब देना चाहिए.

भूरिया ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपने तरीके से उपयोग करने की कोशिश की जा रही है. पक्ष में रहे तो उचित, नहीं तो नाराजगी झेलो. यह कैसा न्याय है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित 8 राज्यों से 'पत्रिका' अखबार का प्रकाशित होता है. उसके विरुद्ध सरकार ऐसे आश्चर्यजनक फैसले ले रही है जो विस्मयकारी हैं.

किसी केंद्र सरकार ने पहली बार राजस्थान पत्रिका के सरकारी विज्ञापनों पर इस तरह की रोक लगाई है. यह एकतरफा निर्णय है जो गैरकानूनी भी प्रतीत होता है. केंद्र सरकार ने 23 जून 2016 से 'पत्रिका' को डीएवीपी से मिलने वाले विज्ञापनों में भारी कटौती कर दी है. इसका कोई कारण भी नहीं बताया गया है. यह प्रक्रिया लोकतंत्र विरोधी है.

'निष्पक्ष-निर्भीक पत्रकारिता के लिए 'पत्रिका' का नाम'

भूरिया ने कहा कि राजस्थान पत्रिका समूह 1956 में अपनी स्थापना के समय से ही निष्पक्ष, निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जाना जाता है. उसके आज देश में 8 राज्यों से 37 संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं जिसकी पाठक संख्या लगभग सवा करोड़ है.

राजस्थान पत्रिका की पत्रकारिता सदैव तथ्यपरक रही है, इसी कारण जो भी राजनीतिक दल सत्ता में रहता है, उसे यह प्रतीत होता है कि राजस्थान पत्रिका उनके विरुद्ध है. पत्रिका में प्रकाशित समाचारों से कोई भी सरकार, राजनेता और राजनीतिक दल कितना भी नाराज हो जाए लेकिन कोई उन्हें गलत सिद्ध नहीं कर पाया.

राजस्थान सरकार भी दिसंबर 2015-16 से राजस्थान पत्रिका को विज्ञापन नहीं दे रही है, इससे प्रतीत होता है कि एक विशेष समाचार पत्र की स्वतंत्रता पर आघात किया जा रहा है. इससे पहले भी छत्तीसगढ़ में सरकार एवं विधानसभा ने भी ऐसे ही लोकतंत्र विरोधी कदम उठाए लेकिन दोनों ही मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों से समाचार पत्र को राहत मिली. सदन के बाहर भूरिया ने पत्रिका से कहा कि वे मीडिया पर अंकुश लगाने की खिलाफत करते रहेंगे.

First published: 3 August 2016, 23:29 IST
 
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