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'आडवाणी जी, इस्तीफा बेमतलब होगा क्योंकि आपका पोसा बच्चा आपसे बलवान हो गया है'

आशुतोष | Updated on: 18 December 2016, 8:21 IST
QUICK PILL
  • आडवाणी के साथ असली समस्या यह है कि वह अपने पूर्व के इतिहास से ग्रस्त हैं. वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बोतल से जिन्न को निकाला है. 
  • जब गुजरात जल रहा था तब वाजपेयी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने का निश्चय कर लिया था, तब गृह मंत्री के रूप में आडवाणी ने ही मोदी को बचाया था.
  • आज वही मोदी उनसे बलवान हो गए हैं लेकिन आडवाणी को नाखुश नहीं होना चाहिए क्योंकि परवरिश तो उन्होंने ही की थी. 

एक शोकमग्न हीरो, जिसके उसके अपने ही आश्रितों ने नेपथ्य में धकेल दिया है. एक निराश योद्धा आंसू बहा रहा है, जिसको उन्होंने प्रशिक्षित किया, पल्लवित-पोषित किया, आगे बढ़ाया था, उसी ने उनकी तरफ से आंखें मूंद ली हैं.

मूल रूप से हिन्दू हृदय सम्राट, पहले रथ यात्री, वह व्यक्ति जिसने भारत में हिन्दुत्व की भावना प्रज्ज्वलित की, लालकृष्ण आडवाणी को आज पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जिनको उनका एहसानमंद होना चाहिए था, वे ही आज उनकी कोई परवाह करते नहीं दिखते.

बुधवार को संसद में हंगामे से दुखी होकर आडवाणी ने कहा कि सोचता हूं कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दूं. मोदी सरकार के नोटबंदी के कारण संसद में लगातार हंगामा होता रहा और शीतकालीन सत्र पूरी तरह से नोटबंदी की भेंट चढ़ गया. कोई भी काम नहीं हो सका.

अब आडवाणी मौसम के अनुसार बोलने वाले राजनेता हैं. वह स्पष्ट रूप से कुछ कहने के पहले अपने शब्दों को तौलते हैं. उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं जाना जाता जो बिना सोचे समझे अपनी टिप्पणी कर देते हैं. ऐसे में उनके शब्दों की गूंज उनके अंतःविचार होते हैं जिससे खलबली मच जाती है.

आग अभी धधक रही

एक वह समय था, जब आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी के बाद दूसरे अकेले कद्दावर नेता थे. उनके शब्द भाजपा में अंतिम शब्द माने जाते थे. आडवाणी जब चरम पर थे तो उस समय वाजपेयी भी उनकी अनदेखी नहीं कर सकते थे.  

सन साठ के दशक में दीन दयाल उपाध्याय के निधन के बाद से दोनों की यह जोड़ी (अपने अलग-अलग अवतारों में) लगातार 40 सालों तक पार्टी पर अपना प्रभुत्व बनाए रही. दोनों के निर्देशन में पार्टी चलती रही. यह तो 2009 के आम चुनावों के बाद आडवाणी का पार्टी में प्रभुत्व कम होने लगा. इसकी वजह यह रही कि इस चुनाव में आडवाणी को पीएम इन वेटिंग कहा गया था, पर यूपीए सरकार सत्ता में आ गई थी.  

हालांकि, 2013 की शुरुआत तक, भाजपा में वह प्रतिष्ठित हस्ती रहे और उनकी अनेदखी कभी नहीं की गई. लेकिन पार्टी में मोदी के उभार के बाद से आडवाणी को ग्रहण लग गया. वह अपनी ही मंडली में धीरे-धीरे भुलाए जाने लगे और उन्हीं के द्वारा जिनको उन्होंने भविष्य के नेतृत्व के लिए तैयार किया था.

इस ताबूत में अंतिम कील तब साबित हुई जब भाजपा के नवगठित मार्गदर्शक मंडल में वाजपेयी और प्रमुख नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ उन्हें भी शामिल किया गया. आडवाणी से जुड़े लोग यह स्वीकार करते हैं कि वे इससे संतुष्ट नहीं थे. अति महत्वपूर्ण संसदीय बोर्ड की जगह उन्हें नवगठित मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया था. इन लोगों का यह भी कहना है कि वह अभी भी पार्टी और सरकार में केन्द्रीय भूमिका निभाना चाहते हैं. अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद, आडवाणी मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय हैं. उनका मस्तिष्क भी तेज है.

मोदी क्यों उन्हें वृद्धाश्रम में भेजना चाहते हैं

मोदी आज भाजपा में एक ऐसे वरिष्ठ नेता के रूप में स्थापित हैं जिन्हें कोई चुनौती नहीं है. वह लम्बे-चौड़े विचार-विमर्श में विश्वास नहीं करते. वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें 'प्योर पावर' पॉलिटिशियन कहा जाता है. उनके हाथ में सत्ता है. वह न तो नैतिक हैं और न अनैतिक बल्कि नीति और नैतिकता निरपेक्ष हैं.

व्यवस्था भी ऐसी है जो उनकी महत्वाकाक्षाओं का समर्थन करती है, उन्हें प्रोत्साहित करती है और पूरी पार्टी भी उन्हीं से बंधी हुई है. कोई व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि वह उनकी बराबरी का है. उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी भी, तकनीकि रूप से तो उनके समकक्ष हैं, पर वे भी मोदी के अधीनस्थ हैं और मोदी उनके बॉस हैं.

जैसे ही मोदी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने यह महसूस कर लिया कि आडवाणी के कद, पार्टी के लिए किए गए उनके योगदान और आरएसएस की वजह से वह हमेशा उनके लिए कांटा बने रहेंगे. इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे आडवाणी को पार्टी की मुख्यधारा से बाहर करने के लिए योजना बनाई और एक 'शांत और संयमशील पुत्र' की तरह मोदी ने उन्हें भाजपा के 'ओल्ड पीपुल होम' में भेज दिया.

विपरीत स्वभाव

आडवाणी के खाते में भाजपा के आधुनिकीकरण का श्रेय जाता है. वर्ष अस्सी और नब्बे के दशक में बहुत ही प्रतिकूल राजनीतिक माहौल में उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ खिंची चली आती थी. वह ऐसा समय था जब हिन्दुत्व राष्ट्र के बौद्धिक वर्ग में हिलोरे मार रहा था.

लेकिन उन्होंने खुद को पुराने तौर-तरीके वाले राजनीतिक नेता के रूप में ही रखा, जो उस नेहरू युग में आगे बढ़े थे जब संसद को लोकतंत्र का मंदिर समझा जाता था और आने वाले लोगों के लिए उनका घर पवित्र और पावन था.

ऐसे में वह बहुत ही व्यथित हो गए जब उन्होंने देखा कि संसद नहीं चल रही है और सत्र दर सत्र संसद में कोई विधाई कार्य नहीं हो पा रहा है.

दूसरी ओर, मोदी में इस तरह का कोई पछतावा या व्याकुलता नहीं थी. गुजरात में भी, जब वह मुख्यमंत्री थे, विधानसभा के प्रति उन्हें नाम मात्र का सम्मान था. विधानसभा के सत्र सिर्फ औपचारिकता लिए होते थे. वह जनता से सीधा सम्पर्क करने में खुद को सहज महसूस करते हैं, ऐसे में आडवाणी के आंसू मोदी के साथ जमीं बर्फ को नहीं पिघला सकेंगे.

समस्या की जड़

तो ऐसे में हिन्दुत्व के ये दोनों आइकन एक ही पेज पर क्यों नहीं आ सके?

वर्ष 2004 के आम चुनावों में भाजपा की पराजय के बाद 'काफी देर से' आडवाणी ने महसूस किया कि पार्टी को हिन्दुत्व के आदर्शवाद से निकालने की जरूरत है ताकि वह पूरे भारत में अपनी स्वीकार्यता बना सके.

इसकी वजह यह थी कि उन्होंने पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में बयान दिया था जिसके कारण उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

हालांकि, मूल रूप से, हिन्दुत्व विचाराधारा का योद्धा होने के बावजूद उन्होंने भारत की विविधता को समझा है, उसे मान्यता दी है. वह चाहते थे कि भाजपा धर्म निरपेक्ष छवि बनाए, इस राष्ट्र की वास्तविक परम्पराओं की उदारवादी दिशा में बढ़े, कट्टरवादी हिन्दुत्व से 'मॉडरेट' हिन्दुत्व की तरफ बढ़े.

दूसरी ओर, गुजरात दंगों के बाद, मोदी का उभार एक हार्डकोर हिन्दुत्व के आइकन के रूप में हुआ. उन्होंने राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के विकास को एक रंग में रंगा और उसे आडवाणी से ज्यादा ताकतवर ब्रांड के रूप में आकार दिया.

यह विचारधारा का अंतर था जिसके कारण आडवाणी प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का विरोध करने के लिए आगे आए. आडवाणी ने गोवा सम्मेलन में शिरकत नहीं की थी जब मोदी को अभियान कमेटी का नेता बनाया गया था. भाजपा के संसदीय बोर्ड द्वारा जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तब उन्होंने पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक संस्था को एक कड़ा पत्र भी लिखा था. उन्होंने दिल्ली में 13 सितम्बर 2013 की बोर्ड मीटिंग का भी बहिष्कार किया था.

उन्होंने पत्र में लिखा था कि पार्टी, जिसकी पहचान सामूहिक नेतृत्व वाली संस्था के रूप में होती है, वह व्यक्तिपरक होती जा रही है. उन्होंने लिखा था कि एक व्यक्ति के हितों को बढ़ावा देने के लिए पार्टी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धान्तों से हट रही है. अपने ब्लॉग में उन्होंने मोदी में तानाशाही प्रवृत्तियों का संकेत किया था. यहां तक कि उन्होंने हिटलर और मुसोलिनी का भी हवाला दिया था.

इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में भी उनके शब्दों की कठोरता कम नहीं हुई थी. उन्होंने कहा था कि देश के लोकतांत्रिक मूल्य खतरे में हैं. इस बयान से एक बार फिर मोदी की गवर्नेन्स स्टाइल पर रोशनी पड़ती है.

बिगड़ैल बच्चे के पिता

आडवाणी के साथ असली समस्या यह है कि वह अपने पूर्व के इतिहास से ग्रस्त हैं. वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बोतल से जिन्न को निकाला है. उनकी रथयात्रा और अभियान के दौरान उनके कटु भाषणों ने लोगों के दिमाग में जहर भर दिया और देश की उदारवादी आस्थाओं को स्थाई रूप से क्षति पहुंची और समाज धार्मिक आधार पर बंट गया जिसका अंतिम परिणाम 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस से हुआ.

आडवाणी देश के धर्मनिरपेक्ष वातावारण के विध्वंस के लिए जिम्मेदार हैं. इतिहास उन्हें माफ नहीं कर सकता, यह बात वह भी जानते हैं.

वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने मोदी को उनकी राजनीतिक मौत होने से बचाया था. जब गुजरात जल रहा था तब वाजपेयी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने का निश्चय कर लिया था, तब गृह मंत्री के रूप में आडवाणी ने ही मोदी को बचाया था.

मोदी उनकी क्रिएशन हैं न कि एक्सटेंशन. उन्होंने प्रतिगामी विचाराधारा को अगले स्तर पर ले जाने का रुख अपनाया है, जहां संसदीय लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं होता, कैबिनेट सिस्टम लुप्तप्राय है और कानून का शासन केवल एक व्यक्ति के लिए है. बहस और विचार-विमर्श का कोई मायने नहीं रखते और राष्ट्रवाद ताकतवर लोगों के लिए है.

आज, अगर आडवाणी को इसी सिक्के पर रखा जाए तो उन्हें नाखुश नहीं होना चाहिए. यह वही हैं जिन्होंने इस बच्चे की परवरिश की है जो ज्यादा बलवान हो गया है और अब उनके खुद के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है.

इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है आडवाणी जी.

First published: 18 December 2016, 8:21 IST
 
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