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जेटलीजी, सामाजिक क्षेत्र में रहेगी बजट वृद्धि की दरकार

श्रिया मोहन | Updated on: 27 February 2016, 8:18 IST
QUICK PILL
  • एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान में पिछले साल के बजट आवंटन में 48% की कटौती \r\nकी थी. सरकार इस मामले में कहा था कि हमें नए आईआईटी खोलने के लिए फंड की आवश्यकता है
  • वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूर्व में वादा किया था कि एक-एक हजार करोड़ रुपए से पांच नई आईआईटी खोली जाएंगी और आईआईएम भी खोले जाएंगे. लेकिन अभी तक इस मामले में कुछ भी नहीं हुआ है

केंद्र सरकार जब विश्वविद्यालयों के प्रबंधन को लेकर चौतरफा आलोचना झेल रही है, ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा शिक्षा के लिए आवंटित बजट पर सबकी नजर रहेगी.

क्या सरकार विविधतापूर्ण शैक्षिक परिवेश के निर्माण के लिए बजट आवंटित करेगी ? या, जैसा कि बहुत से विद्वान पहले से ही लिख रहे हैं, उच्च शिक्षण संस्थान और यूनिवर्सिटी पैसे के लिए तरसेंगी ?

पिछले वर्ष, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने शिक्षा के कुल सरकारी बजट में 16% की कमी कर दी थी, और इसे 82,771 करोड़ रुपए से घटाकर 69,074 करोड़ कर दिया था.

भारत में अब भी साक्षरता दर 74% है. लेकिन यह तो सिर्फ चेहरा है. बहुत-सी स्टडी, जैसे की प्रथम का एएसईआर के सर्वे में पाया गया कि देश के पांचवीं कक्षा के आधे से अधिक छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तकें भी नहीं पढ़ पाते.

इंजीनियरिंग से स्नातक कर 75% और सामान्य स्नातकों में से 85% छात्र रोजगार पाने के योग्य ही नहीं हैं. हम अपने युवाओं को क्या शिक्षा दे रहे हैं और इसे सुधारने के लिए क्या करने की आवश्यकता है ?

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने शिक्षा की इस दयनीय दशा को आने वाले समय में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताया था. उन्होंने कहा था कि एक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए कम पढ़े-लिखे, बेरोजगार और रोजगार के अयोग्य युवाओं की फौज से ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं हो सकता. इनका हमारे समाज में कोई विशेष योगदान भी नहीं होता है.

कैच ने शिक्षा के उन पांच महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर नजर डाली जिन्हें इस बजट में फंड की आवश्यकता है-

1.सर्व शिक्षा अभियान

देशभर में स्कूलों की स्थापना के लिए धन देने वाली योजना सर्व शिक्षा अभियान के बजट में 22.14% कटौती की जा चुकी है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जहां इसके लिए वित्त वर्ष 2015-16 हेतु 50,000 करोड़ की मांग की थी, इसे पिछले बजट में मात्र 22,000 करोड़ रुपए ही दिए गए.

इसका असर यह है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षकों के 6 लाख पद खाली हैं. सिर्फ 63% सरकारी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात शिक्षा के अधिकार कानून में तय किए गए मानकों के अनुरूप है.

प्राइमरी के लिए यह अनुपात 30:1 और अपर-प्राइमरी के लिए 35:1 है. आरटीई एक्ट के तहत अनुपात का यह लक्ष्य मार्च 2015 तक हासिल किया जाना था, लेकिन यह तब ही नहीं, 2016 तक भी पूरा नहीं हो पाया है.

चिंता का दूसरा विषय है कि प्राथमिक स्तर पर कुल नामांकन अनुपात बहुत अधिक 101 प्रतिशत है, लेकिन स्कूल छोड़ने की दर भी इतनी ही है.

आठवीं कक्षा तक इनमें से एक तिहाई बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. इन्हें स्कूल में बनाए रखने के लिए हमें बेहतर प्रशिक्षित शिक्षकों और पढ़ाई के बेहतर स्तर की जरूरत है.

2.मिड-डे मील योजना को सहारा दें

पिछले वित्त वर्ष में मिड-डे मील योजना के लिए आवंटित बजट में भी 16.41% की कटौती कर दी गई थी. मिड-डे मिल योजना के तहत गत वर्ष स्वीकृत किचन-कम-स्टोर्स में से मात्र 69% का ही निर्माण हो पाया है. इस कारण मिड-डे मिल में कम गुणवत्ता वाला खाना परोसा जा रहा है.

बिहार में जहरीले मिड-डे मील की घटना ने इसकी बदतर दशा की चेतावनी दी थी. इस योजना के तहत बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य देना बहुत जरूरी है ताकि वे बेहतर तरीके से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रत कर सके.

3.माध्यमिक शिक्षा में सुधार करें

माध्यमिक शिक्षा के लिए बनाए गए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान का आवंटन पिछले बजट में 28.7% कम कर दिया गया.

इसने उच्च विद्यालयों के संचालन में अड़चन पैदा की और आठवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ने वालों की दर बढ़ा दी. इस चलन को तत्काल बदलने की जरूरत है.

4. सिर्फ आईआईटी खोलने की बजाय स्टेट कॉलेजों को सहारा दें

स्टेट कॉलेजों को सहारा देने के लिए बनाए गए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के आवंटन में पिछले बजट में 48% की कटौती की गई थी. सरकार ने इसके पीछे नए आईआईटी खोलने का तर्क दिया था. इसने देशभर में स्टेट कॉलेजों तक छात्रों की पहुंच बढ़ाने की योजनाओं को तगड़ा झटका दिया है.

जेटली ने वादा किया था कि एक-एक हजार करोड़ रुपए से पांच नई आईआईटी खोली जाएंगी और आईआईएम भी खोले जाएंगे. सरकार के खुद के अनुमानों में माना गया है कि यह बजट बेहद कम है क्योंकि नई आईआईटी को सात साल तक हर वर्ष 310 करोड़ की जरूरत होती है.

आलोचक मानते हैं कि जेटली को सिर्फ नई आईआईटी (घटिया गुणवत्ता वाली) खोलने पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि पहले से स्थापित संस्थानों में बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने पर भी ध्यान देना चाहिए.

उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की गैर-हाजिरी तो और भी बड़ी समस्या है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम जैसे संस्थान शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं.

5.सुविधाहीन वर्गों के लिए बजट दें

यह देखने में आया है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और सुविधाहीन वर्ग कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (ऐसे आवासीय स्कूल जहां 75 प्रतिशत सीटें एससी/एसटी/ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं) जैसी योजनाओं का लाभ नहीं उठा रहे.

पिछले वर्ष शिक्षा के बजट में कटौती का नतीजा यह है कि केंद्र सरकार ने शैक्षणिक रूप से पिछड़े जिलों में 6000 मॉडल स्कूल स्थापित करने में राज्यों की सहायता करने से इनकार कर दिया है.

साथ ही, शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में 3453 गर्ल्स हॉस्टल बनाने को मंजूरी दी गई थी, जिनमें से सिर्फ 536 ही शुरू हो पाए हैं. समाज के सबसे निचले पायदान से शिक्षा में व्यापक बदलाव की शुरुआत करके ही सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है.

First published: 27 February 2016, 8:18 IST
 
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