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मुफ़्ती मोहम्मद सईद: लंबी सियासी पारी की क्लीन फ़िनिशिंग

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 January 2016, 15:26 IST

जम्मू-कश्मीर के सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद का 79 वर्ष की आयु में गुरुवार को निधन हो गया. पिछले छह दशकों में उन्होंने भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य से अपनी राजनीतिक पारी शुरू करके देश के अब तक के एकमात्र मुस्लिम गृहमंत्री बनने तक का सफ़र तय किया.

उनका जन्म 12 जनवरी, 1936 को राज्य के अनंतनाग ज़िले में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई स्थानीय स्कूल-कॉलेज में हुई. बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की.

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1950 के दशक में ग़ुलाम मोहम्मद सादिक़ की डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रेंस से की थी. सादिक़ ने उन्हें अपनी पार्टी का जिला संयोजक नियुक्त किया था.

1962 में सईद पहली बार राज्य की बिजबेहरा सीट से जीत कर विधायक बने थे. 1967 के चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट से दोबारा जीत हासिल की और सादिक़ सरकार में उप-मुख्यमंत्री बने.

मुफ्ती मोहम्मद सईद दो बार राज्य सभा सांसद, दो बार लोक सभा सांसद, दो बार केंद्रीय मंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे

कुछ सालों के अंदर ही उनका सादिक़ से मतभेद हो गया. इसके बाद डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़कर वो इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुड़ गये. उन्होंने राज्य में कांग्रेस का आधार मजबूत करने में केंद्रीय भूमिका निभायी. कांग्रेस में उनके क़द तेज़ी से बढ़ा.

1972 में वो राज्य में कैबिनेट मंत्री बने और विधान परिषद में कांग्रेस के नेता चुने गये. कुछ सालों बाद उन्हें राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया.

1977 के विधान सभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने शेख अब्दुल्ला सरकार से समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिराने में उनकी अहम भूमिका मानी गयी.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सईद ने ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की मंशा से सरकार से समर्थन वापस लिया था. इस तरह राज्य में पहली बार राज्यपाल शासन लगा.

सईद को उम्मीद थी कि चुनाव होने पर कांग्रेस की सरकार बनेगी लेकिन राज्यपाल शासन में हुए चुनाव के नतीजों ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. अब्दुल्लाह की नेशनल कांफ्रेंस को चुनाव में भारी बहुमत मिला था.

1984 में राज्यपाल जगमोहन ने फारूक़ अब्दल्ला की सरकार को बर्खास्त कर दिया था. इसके पीछे भी सईद की प्रमुख भूमिका मानी गयी.

उसी साल सईद राज्य से केंद्र की राजनीति की तरफ़ बढे. राजीव गांधी 1984 में पहली बार प्रधानमंत्री बने. उन्होंने 1986 में सईद को केंद्रीय पर्यटन मंत्री बनाया. सईद 1986 से 1989 तक राज्य सभा सांसद रहे थे.

1986 में दूसरी बार राज्य में राज्यपाल शासन लगा. एक बार फिर इसके लिए सईद पर उंगलियां उठीं.

1987 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. वीपी सिंह ने जब जनमोर्चा बनाया तो सईद भी उनकी साथ थे. वीपी सिंह ने भी कुछ ही समय पहले बोर्फ़ोस घोटाले के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ दी थी.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद अब तक भारत के गृह मंत्री बनने वाले एकमात्र मुस्लिम हैं

 
1989 में सईद उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़नगर से जनता दल के टिकट पर सांसद और वीपी सिंह सरकार में गृह मंत्री बने.

इस तरह वो भारत के पहले मुस्लिम गृह मंत्री हुए. उनके गृह मंत्री काल के दौरान ही उनकी तीसरी बेटी रूबिया का उग्रवादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकएलएफ़) ने अपहरण कर लिया.

आंतकियों ने उनकी बेटी को रिहा करने के बदले पांच आतंकियों को जेल से रिहा करने की मांग की थी. सरकार ने आतंकियों की मांग मान ली थी.

उग्रवादियों के प्रति सरकार के झुक जाने को राजनीतिक जानकारों ने काफी आलोचना की. इसे सरकार के आतंकियों के सामने घुटने टेकने की तरह देखा गया. 1989-90 में ही घाटी में उग्रवाद की शुरुआत हुई. जो बाद के दशकों में बड़ी समस्या बना.

उनके गृह मंत्री रहते हुए जगमोहन को दोबारा राज्य का राज्यपाल बनाया गया. विरोध में फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस तरह राज्य में तीसरी बार राज्यपाल शासन लगा. इस तरह एक बार फिर उनपर राज्य में राज्यपाल शासन से सूत्रधार होने के आरोप लगे.

पीवी नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री काल में उन्होंने फिर कांग्रेस में वापसी की. इस बार उनके साथ उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती भी कांग्रेस से जुड़ीं.

सईद 1992 से 1996 तक दोबारा राज्य सभा सांसद रहे. वहीं महबूबा पहली बार 1996 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनीं. 1998 के लोक सभा चुनाव में उन्होंने कश्मीर की अनंतनाग से जीत हासिल की.

कांग्रेस के साथ उनका रिश्ता ज्यादा दिन तक नहीं टिका और 1999 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के रूप में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने अपनी बेटी महबूबा मुफ़्ती को अपना स्वाभाविक उत्तराधिकारी बताया था

साल 2002 के विधान सभा चुनाव में पीडीपी को 16 सीटें मिलीं.  पीडीपी के चुनाव चिह्न के लिए हरे झंडे और कलम-दवात के चुनाव को सईद का राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना गया था. ये चुनाव चिह्न जमात-ए-इस्लामी के समर्थन वाली यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट के 1987 के चुनाव में प्रयोग किये गये चुनाव चिह्न से प्रेरित था, जिसका घाटी में काफ़ी असर था.

87 सीटों वाली विधान सभा में बहुमत से बहुत दूर होने के बावजूद कांग्रेस के समर्थन से वो पहली बार तीन साल (2002-2005) के लिए राज्य के मुख्यमंत्री बने. उन्होंने कांग्रेस के साथ रोटेशन के आधार पर मुख्यमंत्री बनने का समझौता किया था.

रोटेशन समझौते के अनुसार सईद के बाद 2005 में कांग्रेस के ग़ुलाम नबी आज़ाद राज्य के मुख्यमंत्री बने. हालांकि साल 2008 में अमरनाथ श्राइन बोर्ड भूमि विवाद के बाद उन्होंने कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस ले लिया था.

2008 के विधान सभा चुनाव में पीडीपी को 21 सीटों पर जीत मिली लेकिन सईद ने कांग्रेस से गठबंधन करने की जगह विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया. राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ़्रेंस की गठबंधन सरकार बनी. शेख अब्दुल्लाह के पोते और फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के बेटे उमर अब्दुल्लाह राज्य के मुख्यमंत्री बने.

जम्मू-कश्मीर में पहली बार बीजेपी, पीडीपी से गठबंधन करके सत्ता में आयी

राज्य में साल 2002 और 2014 में भी राज्यपाल शासन लगा था. राजनीतिक जानकारों के अनुसार दोनों इसकी वजह बना सईद द्वारा कांग्रेस और भाजपा के बीच गठबंधन के लिए लिया गया लंबा वक़्त.

विश्लेषकों का जो भी मानना हो ज़मीनी स्तर पर सईद की रणनीति कारगर साबित हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कश्मीर की तीनों सीटें जीतीं लीं.

अगले ही साल हुए विधान सभा चुनाव में पीडीपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी. राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाते हुए सईद ने बीजेपी के साथ राज्य में गठबंधन सरकार बनायी. इस तरह बीजेपी सईद से हाथ मिलाकर पहली बार जम्मू-कश्मीर में सत्ता में आयी.

सईद ने मार्च, 2015 में बीजेपी-पीडीपी गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया. इस तरह वो दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने.

पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत नासाज थी. जिससे राज्य में उनके उत्तराधिकारी के बहस को हवा मिली. जिसके बाद सईद ने ख़ुद साल नवंबर में ये कहा दिया कि उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती उनकी स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं.

सईद ने कहा कि महबूबा अगली मुख्यमंत्री हो सकती हैं क्योंकि वो जनता से ज़्यादा जुड़ी हुई हैं. इसलिए वो मुख्यमंत्री बनने की हक़दार हैं.

इस तरह सईद ने उम्दा खिलाड़ी की अपनी राजनीतिक पारी की क्लीन फ़िनिशिंग की. उन्होंने राज्य का मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी आखिरी सांसें लीं लेकिन उससे पहले ही अपनी गद्दी का वारिस भी तय कर गये.

First published: 7 January 2016, 15:26 IST
 
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