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Muharram 2020: जानिए हजरत इमाम हुसैन और इमाम हसन की कहानी, ये है इतिहास

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 August 2020, 17:59 IST

Muharram 2020: इस्लाम धर्म के पहरुआ पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे व उनकी पुत्री बीबी फातिमा के पुत्र इमाम हसन व हुसैन ने इंसानियत की रहनुमाई के लिए खुद की शहादत कर दी थी. जिनकी याद में गमजदा को पर्व मोहर्रम मनाया जाता है.

हसन हुसैन इस्लाम के असली वालिद थे. सो इंसानियत के रास्ते पर चलने के कारण खलिफा पद पर उनकी ही दावेदारी बनती थी. लेकिन सिरफ्रों ने इसका विरोध करते हुए उनसे बगावत करने का रास्ता चुना.वो इस गुमान में थे कि उनके पास लड़ाकों का भारी फौज है. फिर भी नेमत पर कायम रहते हुए भारी-भरकम फौज के साथ 71 की संख्या में समर्थकों के साथ हसन-हुसैन जंग लड़े और शहीद हो गए. जिसके बाद वहां की जनता मुखालफल में उतर गई और बगावत करते हुए उन्हें शिकस्त दी.


कहा जाता है कि कर्बला की जंग दो शहजादों के बीच की जंग नहीं थी. बल्कि ये इस्लाम की वो जंग थी. जिसमें एक तरफ हुसैन थे और दूसरी तरफ यजीद था. हुसैन चाहते थे, वो दीन ए इस्लाम चले, जो उनके नाना मुहम्मद साहब ने चलाया. लेकिन यजीद चाहते थे कि सबकुछ उनके ही मुताबिक हो.

इतिहासकारों के मुताबिक यजीद हुसैन से अपनी बात मनवाने के लिए संधि करना चाहता था कि वो इस्लाम, इस्लाम की बात न करें और जैसा वो कहे वैसा करें. लेकिन हुसैन ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हक बात करूंगा, कुरान की बात करूंगा. अल्लाह एक है और मुहम्मद साहब उसके पैगंबर हैं ये कहना नहीं छोडूंगा.

जिसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया था. उसने सभी को अपने सामने गुलाम बनाने के लिए यातनायें देनी शुरू कर दी. यजीद पुरे अरब पर अपना रुतबा चाहता था, लेकिन उसके तानाशाह के आगे हजरत मुहम्मद का वारिस इमाम हुसैन और उसके भाईयों ने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया.

इतिहास के मुताबिक यजीद की 80,000 की फौज के सामने हुसैन के 72 बहाहुरों ने जिस तरह जंग की, उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक दूसरे को देने लगे. लेकिन हुसैन कहां जंग जीतने आए थे, वो तो अपने आपको अल्लाह की राह में कुर्बान करने आए थे.

10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका.अंत में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे, एक एक यजीदी को लगा कि शायद यही एक मौका है कि जब हुसैन को मारा जाता है.फिर, उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया. लेकिन इमाम हुसैन मरकर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए.

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इमाम हसन की कहानी-
इमाम हसन हुसैन के भाई थे.शिया मुसलमानों में, हसन दूसरे इमाम के रूप में पूजनीय हैं. शिया मुसलमानों में, हसन दूसरे इमाम के रूप में पूजनीय हैं. हसन ने अपने पिता की मृत्यु के बाद खिलाफत का दावा किया, लेकिन पहली फितना को समाप्त करने के लिए उमैयद वंश के संस्थापक मुवियाह प्रथम के छह या सात महीने के बाद उसे छोड़ दिया गया.

अल-हसन को गरीबों के लिए दान करने, गरीबों और बंधुआ लोगों के लिए उनकी दया और उनके ज्ञान, सहिष्णुता और बहादुरी के लिए जाना जाता था. शेष जीवन के लिए, हसन मदीना में रहे, जब तक कि उनकी मौत 45 साल की उम्र में हो गई और उन्हें मदीना में जन्नत अल-बाकी कब्रिस्तान में दफनाया गया. कहा जाता है इमाम हसन की जहर से हत्या हुई थी. जिसका आरोप उनकी पत्नी जैदा बिंट अल-अश्अत पर लगाया जाता है.

Muharram 2020: इस वजह से मनाया जाता है मोहर्रम, जानिए कौन हैं इमाम हुसैन ?

First published: 24 August 2020, 17:59 IST
 
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