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डूबते ‘सिंह’ को मिला 'मुलायम' तिनके का सहारा पुर्नजीवन दे सकेगा?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के मुखिया अजीत सिंह की डूबती हुई नाव को तिनके का सहारा मिल गया है. प्रदेश की राजनीतिक हलचल को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जनता दल (युनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा नकारे जाने के बाद जाट नेता को प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के रूप में एक समर्थक मिल गया है.

सिंह ने नई दिल्ली में 29 मई को दो अलग-अलग बैठकों में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल यादव से मुलाकात की. मुलाकातों के इस दौर के चलते उत्तर प्रदेश आधारित दोनों राजनीतिक दलों के बीच किसी गुप्त समझौते की अटकलें तेज हो गई हैं. विशेषकर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले के इन बदलते हुए राजनीतिक समीकरणों ने अटकलों को और अधिक हवा दी है.

चर्चा तो यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बहुल क्षेत्रों में आरएलडी के समर्थन के बदले सपा ने सिंह को अपने कोटे से राज्यसभा की सीट देने की पेशकश की है. जाट पारंपरिक रूप से आरएलडी का वोट बैंक माने जाते हैं. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने खुलकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया.

आरएलडी के समर्थन के बदले सपा ने अजित सिंह को अपने कोटे से राज्यसभा की सीट देने की पेशकश की है

सपा ने यह सोचकर आरएलडी का समर्थन करने का फैसला किया है कि शायद उनके पीछे चलने वाला यह समुदाय आगामी विधानसभा चुनावों में उन्हें अधिक नहीं तो, कुछ सीटों पर जीत दिलवा सकता हैं.

अब अजित सिंह को लेकर मुलायम परिवार में मतभेद

हालांकि अभी यह समझौता अनिश्चितता के फेर में फंसा हुआ है और दोनों ही दलों की तरफ से इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. असल में इस अनिश्चितता का एक बहुत बड़ा कारण अजीत सिंह का अस्थिर राजनीतिक अतीत है. उनकी निष्ठा मौके-बैमौके बदलती रही है. इसी वजह से सपा सहित अधिकतर पार्टियां उनसे दूरी बनाए रखना पसंद करती हैं.

सपा में फूट

मुलायम सिंह के भाई और सपा के राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने खुलकर आरएलडी पर हमला बोला है और उन्होंने कहा है कि पार्टी अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है और कोई भी ऐसी पार्टी के साथ हाथ मिलाना नहीं चाहेगा.

हालांकि खबर है कि मुलायम के बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी अजीत सिंह के साथ किसी भी तरह के तालमेल का विरोध किया है. रिश्ते तोड़ने की घोषणा होनी भी अभी बाकी है.

ऐसा लगता है कि पार्टी के मुखिया ने तमाम विरोध को दरकिनार करते हुए अपने फैसले पर कायम रहने की सोच ली है जैसा कि उन्होंने राज्य सभा के लिये अमर सिंह का नामांकन करके किया. गौरतलब है कि राम गोपाल यादव और सपा के बड़े चेहरे आजम खां ने भी अमर सिंह की पार्टी में वापसी और राज्यसभा के लिये उनके नामांकन का विरोध किया था.

दम तोड़ती विरासत को बचाने का प्रयास

जेडी(यू) से लेकर बीजेपी से लेकर सपा तक अजित सिंह का अपने लिये बेहतर ग्राहक तलाशना कोई नई बात नहीं है. वे तमाम राजनीतिक विरोधियों के साथ रहने के लिये खासे मशहूर हैं. सपा के साथ वे पहले भी 2003 में गठबंधन कर चुके हैं और वह भी तब जब उसके एक वर्ष पहले 2002 में मायावती की बहुजन समाज पार्टी की राज्य सरकार में शामिल थे.

लोकसभा में आरएलडी की कोई सीट नहीं है और यूपी विधानसभा में उसके पास सिर्फ 8 सीट हैं

केंद्र में भी आरएलडी का 2011 तक बीजेपी के साथ पुराना रिश्ता रहा और उसके बाद उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया था. सिंह एनडीए और यूपीए दोनों ही सरकारों में मंत्री भी रह चुके हैं.

दूसरे दलों के साथ गठबंधन करने के उनके निरंतर प्रयास अपनी पार्टी की दम तोड़ती हुई विरासत को बचाने का प्रयास है. लोकसभा में आरएलडी की कोई सीट नहीं है और यूपी विधानसभा में उसके पास सिर्फ 8 सीट हैं जिनके बूते वह राज्य विधान परिषद में एक भी सदस्य नामित नहीं कर सकती है.

यह उनकी राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी विडंबना ही कही जा सकती है कि आज उन्हें अपने पिता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विरासत को बचाए रखने के लिये उनके उसी शिष्य मुलायम सिंह यादव की शरण में जाना पड़ रहा है जिसके खिलाफ उन्होंने किसी दौर में युद्ध का बिगुल बजाया था.

First published: 1 June 2016, 7:33 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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