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98,000 करोड़ का महंगा शौक: बुलेट ट्रेन समझदारी नहीं है

जावेद उस्मानी | Updated on: 15 December 2015, 16:48 IST
QUICK PILL
\'\'भारतीय रेल को पहले अपनी लंबित परियोजनाएं पूरी करनी चाहिए. मुंबई-अहमदाबाद के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना फिलहाल उचित नहीं है. जापान द्वारा चाहे कर्ज जितनी भी आसान शर्त पर दी जाय, अंत में इसे लौटाना ही होगा.\'\'
(यह लेख उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था. हम उसे जस का तस हिंदी में प्रकाशित कर रहे है)

भारत और जापान ने मुंबई-अहमदाबाद के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना के एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिया है. जापान में बुलेट ट्रेन सिनकान्शिन के नाम से पहले से ही चल रही है. प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 98000 करोड़ रुपये है और इसका अधिकांश हिस्सा जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के जरिए कम ब्याज वाले लोन से आएगा.

बुलेट ट्रेन समझौते को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और बेहद जरूरी योजना के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है.हालांकि सच्चाई इसके एकदम उलट है. मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन एक महंगा सौदा है. एक ऐसा महंगा शौक जिसमें पैसे की बर्बादी होगी. कह सकते हैं कि यह योजना अपने सीमित संसाधनों का दुरुपयोग है. और मौजूदा समय की प्राथमिकताओं से पूरी तरह भटकाव की स्थिति है. 

भारतीय रेल को पहले अपनी लंबित परियोजनाएं पूरी करनी चाहिए. बुलेट ट्रेन फिलहाल उचित नहीं है

जापान लंबे समय से मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की पैरवी करता रहा है क्योंकि इससे उन्हें अपनी बेहद महंगी टेक्नोलॉजी को बेचने के साथ ही हाई स्पीड ट्रेन निर्माण की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा. जापानियों ने अप्रैल 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुनिशीरो कोइजुमी की भारत यात्रा से पहले भी बुलेट ट्रेन तकनीक हमें बेचने की जबर्दस्त बेताबी दिखाई थी. उनके इस प्रस्ताव पर रेलवे बोर्ड और विदेश मंत्रालय के भीतर आश्चर्यजनक रूप से बड़ा समर्थन भी मिला था.

तत्कालीन रेलवे बोर्ड के चेयरमैन आरके सिंह और विदेश मंत्रालय के सचिव राजीव सीकरी इस योजना के प्रबल सममर्थकों में शामिल थे. हालांकि इस मसले को प्रधानमंत्रियों के बीच होने वाल बातचीत के एजेंडे में शामिल करने से पहले पीएमओ की मंजूरी लेना आवश्यक था.उस वक्त मैं पीएमओ में ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर तैनात था और आर्थिक मामलों को देखा करता था.

दोनों देशों के बीच प्रस्तावित मुद्‌दों को तय करने के लिए पीएमओ में हुई बैठकों का भी मैं हिस्सा था. आरके सिंह और सिकरी ने पुरजोर शब्दों में बुलेट ट्रेन की पैरवी की. उनका तर्क था कि बुलेट ट्रेन तकनीक के ट्रांसफर से भारत को बहुत फायदा होगा. मैंने यह कह कर इसका विरोध किया कि देश में और भी तमाम महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाएं लटकी हुई हैं ऐसे में 50,000 करोड़ (उस समय अनुमानित लागत) की बुलेट ट्रेन परियोजना की शुरुआत अपने सीमित संसाधनों को गलत दिशा में लगाने जैसा होगा.

भारत बुलेट ट्रेन के लिए बड़े कर्ज पर बेहद महंगी टेक्नोलॉजी खरीद रहा है. पहले रेल लाइनों के विस्तार की जरूरत है

उस वक्त स्थिति तनावपूर्ण हो गई जब मैंने आरके सिंह से पूछा कि अगर इस योजना का पैसा जेआईसीए से लोन के रूप में मिलने की बजाय रेल बजट से मुहैया कराना होता तब भी वे इसकी पैरवी करते. उनका जवाब चौंकाने वाला था. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में वह इस प्रोजेक्ट पर आगे नहीं बढ़ते.

यह बात उसी समय साबित हो गई कि बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की पैरवी रेलवे के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए नहीं की जा रही थी बल्कि इसके पीछे जापान द्वारा आसानी से उपलब्ध करवाया जा रहा लोन था. उस समय तत्कालीन विदेश सचिव राकेश मोहन ने मेरा साथ देते हुए कहा कि अगर जापान कर्ज की बजाय अनुदान के रूप में यह पैसा देता तब भी वे इस प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाते.

अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन अपनी परिचालन लागत निकाल पाने की हालत में भी नहीं होगा और फिर हमेशा के लिए इसे सब्सिडी देकर चलाना होगा.जापान की तरफ से बुलेट ट्रेन को आगे बढ़ाने की कोशिश 2005 में कामयाब नहीं हो पाई. पीएमओ ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी.

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन अपनी परिचालन लागत निकाल पाने की हालत में भी नहीं होगा

रेलवे ने तब दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा के बीच डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट (डीएफसीपी) को प्राथमिक एजेंडे के तौर पर जापानी प्रधानमंत्री के सामने रखा. विदेश मंत्रालय ने भी इस पर काम किया और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री कोइजूमी ने 2005 में यह घोषणा की कि उनकी सरकार डीएफसीपी को जापान के ओडीए लोन से फंडिंग किए जाने के विकल्प पर विचार कर रही है.

जापान के सहयोग से यह प्रोजेक्ट साकार हुआ और जब तत्काली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अक्टूबर 2008 में भारत की यात्रा की तब जापान के प्रधानमंत्री तारो आसो ने वेस्टर्न कॉरिडोर ऑफ द डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट को ओडीए लोन देने का वादा किया.

डीएफसीपी के वेस्टर्न कॉरिडोर को दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में तब्दील किया गया ताकि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती दी जा सके. योजना के मुताबिक इसे दिल्ली और मुंबई के बीच के छह राज्यों इंडस्ट्रियल पार्कों से जोड़ा जाना है ताकि विदेशी एक्सपोर्ट और सीधे निवेश को बढ़ावा दिया जा सके.

डीएमआईसी की पहल के तहत वेस्टर्न कॉरिडोर के दोनों तरफ 150 किलोमीटर के दायरे में इंडस्ट्रियल पार्क और लॉजिस्टिक बेस बनाने की तैयारी की जा रही है. ईस्टर्न कॉरिडोर को बाद में विश्व बैंक के फंड की मदद से आगे बढ़ाया गया.

2013 में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से भेजे गए प्रस्ताव को मनमोहन सिंह सरकार ने मंजूरी दी जिसमें डीएमआईसी की तर्ज पर ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को बनाए जाने की मंजूरी मांगी गई थीं. डीएफसीसी का ईस्टर्न और वेस्टर्न कॉरिडोर दोनों ही पूरा होने के कगार पर है. डीएमआईसी पर काम चल रहा है वहीं ईस्टर्न इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की प्लानिंग और डिजाइनिंग का काम चल रहा है.

जापान द्वारा चाहे कर्ज जितनी भी आसान शर्त पर दी जाय, अंत में इसे लौटाना ही होगा

इस तरह पीएमओ द्वारा 2005 में लिए गए एक फैसले की वजह से भारत एक बेहद महंगी टेक्नोलॉजी की खरीदारी से बच गया. वहीं जापान ने भारत की जरूरतों और प्राथमिकताओं के आधार पर रेलवे और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में मदद देने का फैसला किया.

दुर्भाग्यवश इस बार हम विकास कार्यों के नाम पर दी जाने वाली मदद की चाल में फंस गए. जेआईसीए का कर्ज चाहे जितनी आसान शर्त पर दी जाय, अंत में इसे लौटाना ही होगा. हम एक बड़े कर्ज पर बेहद महंगी टेक्नोलॉजी खरीद रहे हैं. एक ऐसे प्रोजेक्ट के लिए जो सिर्फ दो शहरों के बीच महज 500 किलोमीटर की दूरी तय करेगी जबकि भारत में रेलवे का कुल नेटवर्क 63000 किलोमीटर से अधिक है.

भारतीय रेलवे की ऐसी कई परियोजनाएं लंबित हैं जो आधारभूत ढांचे के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.98,000 करोड़ रुपए का खर्च मुंबई से अहमदाबाद के बीच प्लेन से यात्रा करने वाले कुछ यात्रियों को बुलेट ट्रेन में यात्रा कराने के लिए नहीं करना चाहिए. यह उचित नहीं है.

First published: 15 December 2015, 16:48 IST
 
जावेद उस्मानी

The writer is a career civil servant, currently serving as the Chief Information Commissioner of Uttar Pradesh.

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