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मुसहर यानी बंधुआ खेतिहर मजदूर

अतुल चौरसिया | Updated on: 4 November 2015, 13:15 IST
QUICK PILL
  • बिहार में संख्या के मामले में तीसरे नंबर की दलित जाति मुसहर आज भी कोई राजनैतिक हैसियत नहीं रखती है. अतीत में मुसहर जाति से कई बड़े नक्सली नेता पैदा हुए हैं. बूटन मुसहर का नाम सबसे प्रमुख है.
  • जितनी\r\nधीमी गति से मुसहरों में\r\nराजनीतिक जागरुकता आई उतना\r\nही धीमा उनका शैक्षिणिक-साममाजिक\r\nविकास भी रहा हैसमाज\r\nमें अंधविश्वासों का बोलबाला\r\nहैपटना\r\nसे सटे इलाके में बसी मुसहर\r\nटोली आज भी चूहा मारने और कच्चे\r\nघोंघे खाने में यकीन करती है.

मुसहर दो शब्दों के मेल से बना है. मूस यानी चूहा और हर यानी उसका शिकार करने वाला. मुसहर आदिम जनजाति है. आज भी दूर-दराज के इलाकों में बसी मुसहर टोलियों में चूहा मारने-खाने का रिवाज जिंदा है. ब्रिटिश काल में इस जाति को डिप्रेस्ड क्लास की श्रेणी में रखा गया था. 1871 में पहली जनगणना के बाद पहली बार इस जाति को अलग श्रेणि में डालकर जनजाति का दर्जा दिया गया.

इस जाति की मूल बसावट दक्षिण बिहार और झारखंड के इलाके में है. बिहार की दलित जातियों पर विस्तृत शोध के साथ 'स्वर्ग पर धावा' नाम की किताब लिख चुके बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन और शोध संस्थान के निदेशक श्रीकांतजी बताते हैं, 'यह समाज का भूमिहीन मजदूर वर्ग है. ऐसी जातियों का समाज में कोई खैरख्वाह नहीं होता क्योकि इनके पास संपत्ति के नाम कुछ नहीं होता. पहले ये खानाबदोशों की तरह रहते थे.'

आजाद भारत के इतिहास में मुसहर मूलत: दूसरी दलित जातियों के अंदर ही एक हिस्से के रूप में स्थान पाते रहे हैं. 2007 तक बिहार की समस्त चुनावी राजनीति छह मुख्य जातीय समूहों के सांचे में बंटी हुई थी, अगड़ी जातियां, यादव, ओबीसी, पासी, अन्य दलित जातियां और मुसलमान.

मुसहर अन्य दलित जातियों की दायरे में आते थे. इस श्रेणी में बिहार की कुल 23 जातियों को संवैधानिक मान्यता मिली हुई है. 2007 में नीतीश कुमार ने इसमें बड़ा परिवर्तन किया. ओबीसी को दो हिस्सों में बांटकर उन्होंने एक नई श्रेणी बनाई अति पिछड़ा वर्ग और अन्य दलित जातियों को दो हिस्से में बांट कर इसमें से नया जातीय समूह खड़ा किया महादलित. इसी महादलित समूह में मुसहर जाति को भी रखा गया है.

उत्तर प्रदेश में चमार या बिहार में पासी और पासवान की तुलना में मुसहर कभी भी एक संगठित जातिगत समूह नहीं रहा, न ही इसकी कोई बड़ी राजनैतिक हैसियत रही. इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि यह जाति संख्या में ज्यादा होते हुए भी कहीं एक स्थान पर बड़ी संख्या में नहीं पायी जाती है.

उत्तर प्रदेश में चमार या बिहार में पासी और पासवान की तुलना में मुसहर कभी भी एक संगठित जातिगत समूह नहीं रहा

बिहार और झारखंड के एक बड़े हिस्से में मुसहर फैले हुए हैं. वरिष्ठ पत्रकार सुकांत नागार्जुन के शब्दों में, 'इनकी आबादी बहुत बड़ी है लेकिन वे किसी एक स्थान पर सामूहिक रूप से नहीं रहते. अपने मूल स्वरूप में यह एक घुमंतू जनजाति है. जो अब धीरे-धीरे एक समाज के रूप में संगठित होकर बसने लगी है.'

संख्या के लिहाज से मुसहर जाति बिहार की 23 दलित जातियों में तीसरे स्थान पर है. इनसे ऊपर सिर्फ चमार और पासी हैं. बिहार में दलितों की कुल जनसंख्या में मुसहरों का प्रतिशत 13.4 फीसदी है. अगर कुल जनसंख्या के संदर्भ में देखें तो मुसहर करीब 2.5 से तीन प्रतिशत हैं.

बावजूद इसके आजादी के बाद से अब तक इस समूह का कोई संगठित राजनीतिक स्वरूप नहीं रहा, न ही इनका कोई एक सर्वमान्य नेता पैदा हुआ. छिटपुट रूप में कुछ लोग राजनीतिक क्षितिज पर थोड़ी देर के लिए जरूर चमके लेकिन समय की धूल ने सबको धूमिल कर दिया. 1952 की पहली लोकसभा में ही पहला और अकेला मुसहर सांसद कांग्रेस के टिकट पर बना था. उनका नाम था किराई मुसहर.

60-70 का दशक वह समय था जब मुसहर समाज की राजनीतिक चेतना करवट लेने लगी थी. उस दौर में इस जाति से कई बड़े नेता सामने आए. इनमें सबसे पहला नाम है भोला मांझी का. सीपीआी के नेता रहे भोला मांझी 1957 में जमुई विधानसभा सीट से विधानसभा सदस्य बने थे. इसके बाद 1971 में वे लोकसभा के सांसद भी बने. उनका अपनी जाति पर इतना असर था कि हाल तक मुसहरों का एक बड़ा हिस्सा वामपंथी पार्टियों का परंपरागत समर्थक बना रहा.

मुसहरों के एक और बड़े नेता 70-80 के दशक में हुए मिश्री सदा. 1972 में वे राज्य सरकार में मंत्री बने. इन इक्का-दुक्का नेताओं का क्रम आगे भी चलता रहा. जिन जीतन राम मांझी को लेकर आज बिहार की राजनीति उलझी हुई है वे पहली बार 1985 में बिहार सरकार में राज्यमंत्री बने थे.

मुसहरों की राजनीतिक सक्रियता सरकार विरोधी आंदोलनों में भी खूब रही. 1967 में नक्सल आंदोलन के उभार के समय कई बड़े मुसहर नेता उसका हिस्सा बने थे. बाद में एक-एक करके ज्यादातर को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया.

मुख्यधारा की राजनीति के साथ ही मुसहरों की राजनीतिक सक्रियता सरकार विरोधी आंदोलनों में भी खूब रही. 1967 में नक्सल आंदोलन के उभार के समय कई बड़े मुसहर नेता उसका हिस्सा बने थे. बाद में एक-एक करके ज्यादातर को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया. भोजपुर जिले के बड़े नक्सली नेता थे बूटन मुसहर. उन्हें 1971 में पुलिस ने मार गिराया. इसी तरह एक बड़े नेता बिरदा मांझी भी पुलिस के साथ हुए एनकाउंटर में मारे गए.

जितनी धीमी गति से मुसहरों में राजनीतिक जागरुकता आई उतना ही धीमा उनका शैक्षिणिक-साममाजिक विकास भी रहा. शायद दोनो चीजें एक दूसरे की पूरक होती है. समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी आदिकालीन परंपराओं और जड़ताओं से घिरा हुआ है.

समाज में अंधविश्वासों का बोलबाला है. चुड़ैल मारने की घटनाएं अतीत में होती रही हैं. पटना से सटे इलाके में बसी मुसहर टोली आज भी चूहा मारने और कच्चे घोंघे खाने में यकीन करती है.

मानव विकास के तमाम सूचकांक इस बात की ताकीद करते हैं कि यह जाति अभी भी बहुत पिछड़ी अवस्था में है. बिहार में विकास के तमाम दावों की परख इस जाति की मौजूद दशा के आधार पर की जा सकती है.

मानव विकास के तमाम सूचकांक इस बात की ताकीद करते हैं कि यह जाति अभी भी बहुत पिछड़ी अवस्था में है.

2001 में मुसहरों की साक्षरता दर का आंकड़ा आंख खोलने के लिए पर्याप्त है. पुरुषों की साक्षरता दर 13.67 फीसदी थी जबकि महिलाओं की सात फीसदी. इसकी एक झलक हमें जीतनराम मांझी के गांव महकार में मिली. मुसहर टोली में 20-25 बच्चे हमें घेरकर खड़े हो गए. ज्यादातर नंगे थे. जब हमने उनसे पूछा कि स्कूल जाते हो तो सबने हाथ ऊपर कर दिया. स्कूल में सबका नॉमिनेशन हुआ है.

जब हमने उनसे क ख ग और ए बी सी डी सुनाने के लिए कहा तो सब चुप हो गए. एक भी बच्चा एल्फेबट नहीं सुना सका. उनमें छठवीं क्लास तक के बच्चे शामिल थे. गांव में महेंद्र मांझी नाम का एक टोला सेवक भी नियुक्त है जिसका काम गांव से बच्चों को स्कूल ले जाना और ले आना है. उसे पिछले छह महीने से वेतन नहीं मिला है.

आबादी के लिहाज से गया, रोहताश, अररिया, सीतामढ़ी मुसहरों की घनी आबादी वाले जिले हैं. इसके अलावा समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया के कुछ हिस्सों में मुसहर बहुत बड़ी संख्या में है. जिस मकसद से नीतीश कुमार ने महादलित और ईबीसी का नया हिस्सा तैयार किया था वह मांझी प्रकरण के चलते बिखर गया है.

सुकांत बताते हैं, 'मुसहरों में अलग जाति की और पहचान की राजनीति कभी इतनी मजबूत नहीं रही है जितनी इस बार देखने को मिल रही है. जीतनराम मांझी खुद कभी बड़े नेता नहीं रहे हैं. उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता भी कांग्रेस, आरजेडी से लेकर जदयू तक चक्कर लगाती रही है. मुख्यमंत्री बनने से पहले उनकी सारी राजनीति एक विधायक और एक सीट तक सीमित थी. लेकिन नीतीश-मांझी प्रकरण ने उन्हें ऐतिहासिक मौका दे दिया. आज वे भाजपा के साथ बीस सीटों का तालमेल कर पाने में सफल हुए हैं तो इसके पीछे नीतीश कुमार की राजनैतिक चूक की बड़ी भूमिका है.'

आज मांझी भाजपा के साथ बीस सीटों का तालमेल कर पाने में सफल हुए हैं तो इसके पीछे नीतीश कुमार की राजनैतिक चूक की बड़ी भूमिका है.

2010 के बिहार विधानसभा में कुल नौ मुसहर विधायक थे. तीन जदयू, पांच भाजपा और एक राजद से. लेकिन ऐतिहासिक अवसर जीतनरामम मांझी के हाथ लगा है. नौ महीने के काल में जीतनराम मांझी ने खुद को महादलितों के प्रतीक पुरुष के रूप में स्थापित करने का हरसंभव प्रयास भी किया. उन्होंने दलितों की एक और बड़ी जाति पासवान को महादलित में शामिल कर उन्हें संदेश देने की कोशिश की.

मांझी से पहले बिहार में दो दलित मुख्यमंत्री हुए भोला पासवान और राम सुंदर दास. लेकिन दोनों अपने सवर्ण नेतृत्व और सवर्ण प्रभुत्व वाले मंत्रिमंडल में काम करते रहे. जबकि मांझी ने नीतीश कुमार के इशारे पर चलने से साफ इनकार कर दिया.

मांझी के इस कदम से उनकी जाति के अंदर एक बड़ा संदेश गया है कि मुसहरों के नेता मांझी हैं और नीतीश कुमार ने उनके साथ अन्याय किया है. पटना, जहानाबाद, अरवल, गया की लगभग हर मुसहर बस्ती में इस बात पर एक राय है कि मांझी को वोट देना है. भाजपा मांझी पर लगाए गए दांव से खुश हो सकती है.

First published: 4 November 2015, 13:15 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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