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मुस्लिम आरक्षण: राजनीति और सामाजिक न्याय में फंसा एक जरूरी सवाल

अमीक जामेई | Updated on: 7 June 2016, 0:00 IST
QUICK PILL
सामाजिक न्याय के पुरोधा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कहते थे की मुसलमानो को वोट बैंक नहीं वोट मैनेजर बनना चाहिए, लेकिन हालात बताते है यह वोट बैंक मैनेजर तो नहीं बना लेकिन कंडक्टर या प्यून ज़रूर बन चुका है. इसके नेताओं के हाथ में तीन करोड़ के उत्तर प्रदेश की विधानसभा के टिकट के अवसर हैं, ज़ुबान पर ताले और अपमान फ्री में है, साथ ही उसके उद्योग धंधे पर ताले भी पड़ चुके है. जब चारों तरफ आरक्षण का शोर है, जाट फिर से कमर कस रहे हैं तब मुसलमानों के आरक्षण के वाजिब सवाल पर भी एक चर्चा होनी चाहिए:

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के बड़े नेता शिवपाल यादव ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पिछले दिनों कहा था कि 18 फीसदी मुसलमानों को आरक्षण देने में कई 'तकनीकी' खामियां हैं. ऐसे बयान बड़े हिम्मत वाले होते हैं. शिवपाल यादव जैसे नेता कम हैं जो संविधान के दायरे में साफ बात आवाम को बता सकें.

सवाल यह उठता है कि यह सब जानने के बावजूद ऐसे वादे राजनैतिक दल क्‍यों करते हैं और लोग उनके धोखे में फंसते क्‍यों हैं? सवाल शिवपाल यादव जैसे लोगों से भी है कि जब उनकी पार्टी ये वादे करती है, उसी वक़्त वे अपनी पार्टी की मुखालिफत क्‍यों नहीं करते?

मुसलमानों में जात और उनके पिछड़ेपन को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाने की ज़रूरत है. भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान जबरदस्त तरीके से वर्ण-व्यवस्था में संलिप्त हैं. जाति व्यवस्था उनकी रगों में बसती है. यहां मुसलमानों में भी पंडित हैं, जुलाहे हैं, भंगी कहे जाने वाले दलित हैं, धोबी हैं, नाई हैं.

इस्लाम के आगमन पर उलेमाओं और सूफियों की तहरीक से इतना भर हुआ कि ये तबके मस्जिदों में तो एक साथ खड़े हो जाते हैं, लेकिन मस्जिद के बाहर इनके रंग और अदाएं कुछ और हैं. मतलब यह है कि मुसलमानों ने मस्जिद कबूल की, लेकिन अपने पीछे के मजहब से मिली वर्ण व्यवस्था को नहीं छोड़ा.

आर्थिक आधार पर रिज़र्वेशन ब्राह्मणवादी, संघी एजेंडा है जिसे अशराफ मुसलमानों ने भी अपना लिया है

इस लेखक को याद है कि जौनपुर के एक गांव में धोबी या अंसारी समाज उच्च वर्ग के मुसलमानों की चारपाई के पैताने बैठा करते थे और उच्च वर्ग की गाली में जुलहा-जुलहटी जैसे जुमले कानों में साफ पड़ते रहते थे. जैसे बहुसंख्यक वर्ग मे पिछड़ा और दलित का हाल है, वही हालात यहां अशराफ़ और अजलाफ़ के बीच है.

उलेमा आदि एक स्‍तर पर जातिवाद को तोड़ने की कोशिश करते तो दिखते हैं, लेकिन यह सब सिर्फ मस्जिदों तक ही मुमकिन हो सका है. मसलन मस्जिदें और उनके इमाम भी अलग-अलग हैं. वहां किसी मुसलमान को एक काग़ज़ के आधार पर बेदखल करने की ताकत है. याद करें कि पिछले दिनों बरेलवी सेक्‍ट के तौकीर रज़ा को कैसे इसी तरीके से इस्‍लाम से बेदखल कर दिया गया था.

उलेमाओं के प्रगतिशील तबके का असर कभी भी पूरे समाज में नहीं बन पाया- मसलन जातियों के बीच आपस में शादी-ब्याह रचाए जाएं, आदि. जब इतना भर नहीं हो सका, तो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर पिछड़े समाज को मौका देने के लिए कोई पहल होना तो बहुत दूर की बात है.

अशराफ़ मुसलमानों के जो भी कल-कारखाने थे, उसमें यही पिछड़ा, दबा-कुचला समाज मजदूरी करता था. बर्तन बनाना, कपड़े सिलना, कपड़े धुलना, रुई धुनना, बाल बनाना, खेतों को जोतना, इत्‍यादि. यह कहा जा सकता है कि मुस्लिमों के उच्च वर्ग के अधीन रह कर उसका पिछड़ा तबका तालीम, समाज व राजनीति में पिछड़ता रहा और रजवाड़े, जमींदारी, निज़ाम सब के सब जस का तस टिके रहे.

आरक्षण कोई केक नहीं बल्कि उच्च वर्ग द्वारा दलित-आदिवासी-पिछड़े पर शोषण के पश्चात संविधान का दिया एक पश्चाताप है

जब मण्डल कमीशन जैसी समाजी इंसाफ की लड़ाई लड़ी गई, तो बहुसंख्यक उच्च वर्ग के कान खड़े हो गए. ठीक उसी की तर्ज पर मुस्लिम समाज का उच्च वर्ग भी कहने लगा कि यह मुसलमानों को जाति में बांटने की साजिश है और आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए. यह बात साफ़ कर दी जानी चाहिए कि आर्थिक आधार पर आरक्षण एक ब्राह्मणवादी व संघी एजेंडा है, जिसे अशराफ़ मुसलमानों ने भी अपना लिया है.

मण्डल के तहत ही 27 फीसदी के भीतर पिछड़ी-शोषित मुसलमान बिरादरियों को भी हिस्सा मिल रहा है. देश की 80 फीसदी आवाम को वीपी सिंह का आभारी होना चाहिए और इस साजिश को भी समझना चाहिए कि मण्डल देने की वजह से कैसे वीपी सरकार के परखच्चे उड़ा दिए गए थे.

बावजूद इसके, पिछड़ों को जो अधिकार मिलना था, वो मिला. संघ इसी अधिकार पर नज़र गड़ाए बैठा है, जबकि आज भी 50 फीसदी नौकरियां अनारक्षित हैं और उनमें से ज्यादातर पर ऊंची जातियों का कब्जा है.

मुसलमानों को धर्म या आर्थिक आधार पर आरक्षण देने या इसके वादे करने का खेल पुराना है और यही काम अब भारतीय जनता पार्टी कर रही है. राहत की बात इतनी है कि कि फिलहाल इस कवायद में उसे हरियाणा हाईकोर्ट ने जाट आरक्षण के संदर्भ में मात दे दी है.

रूलिंग पार्टी के नजदीक मुसलमानों का सामंती वर्ग और अशराफ़ असर रखता है

अगर हम याद करें तो पिछले यूपी विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री सलमान खुर्शीद के मुंह से मुसलमानों को 3.5 फीसदी आरक्षण देने का एलान किया गया था, लेकिन वह अदालत में टिक नहीं पाया था. बहुजन समाज पार्टी सहित समाजवादी पार्टी ने अपने-अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को 18 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था, जो काम 2016 तक नहीं हुआ है.

कारण यह है कि संविधान में आरक्षण देने की सीमा 50 फीसदी है, जिसमें अब कोई जगह नहीं बची है. अगर संविधान में संशोधन के लिए केंद्र की सरकार राज़ी हो जाए, तभी संशोधन हो सकता है.  यही करवाने के लिए चार साल तक माथापच्ची करने के बाद समाजवादी पार्टी अब तैयार हुई है. वह संविधान में आरक्षण की सीमा को बढ़ाने के लिए केंद्र के समक्ष एक प्रस्ताव रखना चाहती है ताकि संसद में इस पर मुहर लग सके.

आरक्षण और संविधान के जानकार समाजवादी पार्टी की इस समझ को बचकाना मानते है. अगर ऐसा हो भी जाए तो हर धर्म के उच्च वर्ग के लिए एक नई जंग शुरू हो जाएगी. यह मानना होगा कि आरक्षण कोई केक नहीं है, बल्कि उच्च वर्ग द्वारा दलित-आदिवासी-पिछड़े पर शोषण के पश्चात संविधान का दिया हुआ एक पश्चाताप है!

उच्च वर्ग में जन्म लेने वाले प्रगतिशील लोग कमज़ोर तबके की तकलीफों को समझ सकते हैं. आरक्षण पर बात करते हुए एक आलिम ने इस लेखक को एक दिलचस्प वाकया समझाया कि इस्लाम में बादशाहियत नहीं है, कोई 'हिज़ हायनेस' नहीं है. किसी मजलिस में मेहमान के आने पर खड़ा हो जाना- यह अदब में ही नहीं है.

वाकया यों था कि इस्लाम के पैग़ंबर जनाब ए रसूलल्लाह साहब एक मजलिस में थे. वहां हज़रत उमर और हज़रत अली भी मौजूद थे. बैठक शुरू हो गई. थोड़ी देर में हज़रत बिलाल उनके बीच तशरीफ लाए. बिलाल ग़ुलामों के समाज से ताल्लुक रखते थे जो उस जमाने में अछूत माने जाते थे.

जब वे अंदर आए तो उनके लिए जगह न होने के चलते हज़रत अली ने उन्‍हें अपनी जगह पेश की और खड़े हो गए. उन्‍होंने फ़रमाया कि बिलाल उनकी जगह पर बैठ जाएं. इसे देखकर हज़रत अली की तरफ जनाब ए रसूल्लाह साहब ने मुस्कराते हुए कहा, ''अली, हीरे की क़दर जौहरी ही जानता है.”

उस आलिम ने इस घटना के बहाने समझाया कि हज़रत बिलाल ग़ुलाम समाज से आए थे, फिर भी उन्हें समाज मे जगह दी गई. यही समाजी इंसाफ और आरक्षण है. मुसलमानों को- जिसमें 80 फीसदी पिछड़े पसमांदा लोगों की आबादी है- अगर संविधान के ज़रिये कुछ मिलता है तो उसके लिए हमें अड़चन न बनकर इस सच्चाई को पहले मानना चाहिए कि मुसलमानों में जात है और फिर हमें उनके अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए.

अफसोस कि सत्‍ताधारी पार्टी के नजदीक मुसलमानों का सामंती वर्ग और अशराफ़ असर रखता है. जो मुसलमान कोटे से विधानसभा या संसद में जाते हैं, वे या तो अपनी पार्टियों से डरते हैं या उन्हें आरक्षण की समझ नहीं है. आज भी राजनीतिक दलों के फैसलों में पिछड़े मुसलमानों की हैसियत सियासी कंडक्टर की तरह ही है, इसीलिए उन्हें इस बीच नए सिरे से अपने सियासी मुहसिनों यानी आदर्शों की तलाश करनी होगी.

देश में चार मुख्य राज्यों, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों को आरक्षण मिला है. उसका आधार सामाजिक- शैक्षणिक पिछड़ापन था. केरल मे वाम मोर्चा के मुख्यमंत्री सी. अच्युतानंदन ने 12 फीसदी का आरक्षण पिछड़े मुसलमानों को दिलवाया. इसी को आधार बनाकर तमिलनाडु में 3.5 फीसदी, आंध्र प्रदेश में 4 फीसदी और पश्चिम बंगाल की बुद्धदेब सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण सब-कोटा के ज़रिये लागू किया. यह व्यवस्था अदालतों में टिक पाई और आज तक कायम है.

इसका असर केरल के मुसलमानों की साक्षरता दर और वहां की तरक्की में मुसलमानों की हिस्‍सेदारी के रूप में देखा जा सकता है. अगर बिहार-उत्तर प्रदेश में मुसलमान आरक्षण चाहता है, तो उसे पहले ईमानदारी से जातिवाद के खात्मे पर सोचना होगा.

इसके साथ उपरोक्त राज्यों का अध्ययन कर किसी एक राज्य को मॉडल बनाया जाना होगा. अफसोस की बात है कि पिछड़ों की राजनीति के नाम पर उन्हीं के बीच एक क्रीमीलेयर तैयार हो गया है, जो खुद उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ है.

राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अवाम से खुलकर साफ तौर पर कह दें कि धर्म, जाति या आर्थिक आधार पर संविधान में कोई आरक्षण नहीं हो सकता. भाजपा को पाटीदार समाज से यह बात कहनी होगी, हरियाणा में जाट समाज को यह बात समझाई जानी होगी जिसने हिंसा के बल पर आरक्षण की बात मनवाई है और  उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को यह बात बतानी होगी.

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी अगर मुसलमानों को वाकई आरक्षण देना चाहती है, तो पिछड़े मुसलमानों के लिए केरल मॉडल के अनुसार सब-कोटा के ज़रिये वह ऐसा कर सकती है. इसके लिए इस पार्टी में शामिल उच्च वर्ग के मुसलमान नेताओं को हज़रत अली बनने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन सामाजिक न्याय के मामले में उच्च वर्ग मे जन्मे प्रगतिशील नेता पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तो उन्‍हें कम से कम बनना ही होगा!

First published: 7 June 2016, 0:00 IST
 
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