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हां! मेरा नाम खान है और मुझे अपनी देशभक्ति का सबूत देने की जरूरत नहीं है

पायल पुरी | Updated on: 26 November 2015, 9:53 IST

कल का दिन आमिर खान के लिए ठीक नहीं रहा. पिछले 15 साल आमिर के लिए शानदार रहे हैं. ब्लॉकबस्टर मूवीज और इंडस्ट्री में जबरदस्त सम्मान. बॉक्स ऑफिस पर सैंकड़ों करोड़ रुपये की कमाई. एक के बाद एक कई पुरस्कार और जबरदस्त असर वाला एक टीवी सीरीज. और फिर दो दिन पहले आमिर ने कुछ कहा, उसके बारे में उन्होंने शायद सोचा भी नहीं होगा. उन्होंने अपने देश के बारे में सवाल किया जिसने 'उन्हें बहुत कुछ दिया है.'

आमिर एकदम से निशाने पर आ गए. उन्हें देश की तारीफ के अलावा कुछ और सोचने की इजाजत नहीं. उन्हें गुस्सा या नाउम्मीद या निराश होने का अधिकार नहीं है. वह इस देश की खामियों के बारे में कुछ भी नहीं बोल सकते. चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक. आमिर अपने घर या बाहर मजाक नहीं कर सकते चाहे वह वास्तविक हो या बढ़ा चढ़ाकर बोला गया. वो ऐसा कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके नाम के आखिर में खान आता है.

सोमवार को राम नाथ गोयनका एक्सीलेंसी इन जर्नलिज्म अवार्ड के मौके पर आमिर ने जो कहा उसे आर या पार की तरह नहीं देखा जा सकता. लेकिन इसे लेकर हंगामा मच गया.

कुछ लोगों ने उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए तो कुछ ने उनकी खास हैसियत को लेकर सवाल पूछ डाले. कुछ के मुताबिक आमिर वे जो कहा वह बेहूदा हरकत थी. तो कुछ लोगों के मुताबिक  आमिर ने सोच समझकर यह बयान दिया है. कुछ लोगों के लिए यह मुस्लिम का मुद्दा था तो कुछ के लिए पाखंड.

इस पूरे विवाद में अगर कोई एक बात उभर कर सामने आई तो वो यह कि आमिर को बोलने की कीमत चुकानी पड़ी. आमिर बोले क्योंकि भारत में सहिष्णुता ऐसा मामला है जिसमें सबको अपनी हैसियत के मुताबिक बोलने का अधिकार है.

अगर आप विशेष हैं

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि यह नौटंकी करने की कि तुम असुरक्षित महसूस कर रहे हो? आलीशान घर, गार्ड्स, स्विस कार और शानदार बैंक बैलेंस रखने के बाद भी तुम असुरक्षित कैसे महसूस कर सकते हो? नारायण मूर्ति सबसे पहले इसका शिकार बने. असहिष्णुता को लेकर बयान देने के पहले वह करोड़ों के हीरो थे. मेक इन इंडिया जैसा जुमला सामने आने के पहले तक भारत की पहचान थे.

फिर उन्हें पता चला कि मामला केवल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने का नहीं है. ट्विटर पर गालियों की बाढ़ आ गई. उन्हें ऐसे बयान और टिप्पणियों का सामना करना पड़ा जिसमें देश से लेकर आईआईटी में होने तक को लेकर उनकी लानत मलानत की गई. इसके अलावा उनके योगदान पर भी गंभीर सवाल उठाए गए.

जो आमिर के साथ हुआ उससे एक बात साफ हो गई कि असुरक्षा जैसी भावना का असर उस तरीके से संपन्न तबके पर नहीं होता जिसका सामना आम आदमी को करना पड़ता है.

क्योंकि आप प्रभावशाली और मशहूर हैं

यह जरूरी नहीं कि हमेशा सही हो लेकिन ज्यादातर मामलों में देखा जा रहा है कि आप प्रभावशाली हैं, लोकप्रिय हैं तो आपको आसानी से निशाने पर लिया जा सकता है. मशहूर होने की अपनी दिक्कतें हैं और आपको बेहद आसानी से आपके अतीत का हवाला देकर गालियां दी जाती है. आमिर के सामने भी वही स्थिति पैदा हुई. उनके इंडस्ट्री के सहयोगी अनुपम खेर ने हमला बोलते हुए पुरानी खुन्नस निकालनी शुरू की. खेर ने सवाल दागा, 'आपको इस तरह की असुरक्षा का एहसास पहले क्यों नहीं हुआ?' उन्होंने आगे पूछा कि आखिर कैसे पिछले 7-8 महीनों में अतुल्य भारत असहिष्णु भारत कैसे हो गया? (अनुपम खेर से सवाल किया जा सकता है कि जिस विकास की वे तरफदारी कर रहे हैं वह पिछले 7-8 महीनों में गाय के इर्द गिर्द क्यों सिमट गया?)

आप और हम अपने कमरों में बैठकर प्रदूषण, अपराध, भ्रष्टाचार या फिर असहिष्णुता के चलते भारत छोड़ने की बात कर सकते हैं. लेकिन जरूरी नहीं कि हम उस पर अमल करें. आमिर खान ने भी वही किया. उनकी गलती ये है कि उन्होंने अपने लिविंग रूम की बात सार्वजनिक करने का साहस कर लिया.

और जैसा कि अंजलि मोदी ने कहा प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घूमकर विदेश में रह रहे भारतीय लोगों और उनकी उपलब्धियों की सराहना करते हैं. यह वह लोग हैं जिन्होंने किसी समय भारत से बाहर निकलना इसलिए मुनासिब समझा क्योंकि उन्हें यहां से बेहतर विकल्प विदेशों में मिल रहे थे.

अगर आप प्रभावशाली, मशहूर और माइनॉरिटी हैं

तो चुप्पी आपके लिए सबसे अच्छा विकल्प है. इसमें सबसे कम खतरा है.

आमिर के साथ यह सब इसलिए हुआ क्योंकि वह एक मुस्लिम हैं?

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वे एक संपन्न, प्रभावशाली, लोकप्रिय मुसलमान हैं. फिर आपकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की.

क्योंकि जब आप अमीर, मशहूर और मुसलमान होते हैं तो आप सिर्फ अपने लिए नहीं बोल सकते. मानो आप एक साधारण भारतीय आमिर खान होने का अधिकार ही खो बैठते हैं. यही अल्पसंख्यकों के प्रति हमारे विमर्श का चरित्र है.

रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह में विमर्श का एक मुद्दा यह भी था कि एक देश के रूप में आज हम कहां खड़े हैं. अनंत गोयनका ने आमिर से पूछा कि क्या वह मॉडरेट मुस्लिम आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. आमिर ने कहा, 'जब आप मुझे मॉडरेट मुस्लिम कहते हैं तब मैं सहज नहीं हो पाता. पहली बात कि मुझे किसी एक धर्म का प्रतिनिधि क्यों बनना चाहिए. और अगर ऐसा है तो सिर्फ मुसलमान ही क्यों, मैं सारे भारतीयों का प्रतिनिधि क्यों नहीं हो सकता. अगर मैं एक व्यक्ति होने के नाते अपने समाज और देश का प्रतिनधित्व कर रहा हूं तो मैं सभी का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं. मैं सब के साथ खड़ा रहूंगा. मेरा जन्म एक मुस्लिम परिवार में भले ही हुआ है लेकिन मैं सब के लिए बोलूंगा.'

अवार्ड फंक्शन की रात आमिर ने सही बोला या गलत, उन्होंने बस एक पति, एक पिता और एक भारतीय होने के नाते बोला. लेकिन भारत ने जो आवाज सुनी वह एक मुसलिम की थी. यही हो रहा है. अनुपम खेर ने आमिर से ट्विटर पर पूछा, 'क्या आपने किरण को बताया कि इस देश ने आपको आमिर खान बनाया है?'मैं भी वास्तव में आमिर की आलोचक हूं लेकिन उसके दूसरे कारण हैं. एक नागरिक होने के नाते अगर मैं कुछ कहती हूं तो न उसका कुछ असर होगा और न ही उससे किसी को फर्क पड़ेगा.

एक सामान्य आदमी होने के नाते मेरी आपसे उम्मीद होगी कि आपने जिस जायज चिंता की तरफ इशारा किया है उसे आपको आगे बढ़ाना चाहिए ताकि इस देश को बेहतर जगह बनाया जा सके.

चूंकि आपका नाम खान है इसलिए अपने आपको अपनी भारतीयता साबित करने के लिए किसी का मोहताज होने की जरूरत नहीं. आपको यह बात स्पष्ट करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं कि आप किसके लिए बोल रहे हैं. ट्विटर ट्रॉल्स और टेलीविजन न तो आपको अधिकार दे सकते हैं और नहीं आपका अधिकार छीन सकते हैं. इसकी हिफाजत संविधान करेगा.

First published: 26 November 2015, 9:53 IST
 
पायल पुरी @payalpuri

In a 19-year career Payal has been, among other things, editor of Cosmopolitan India, executive editor of a travel and design magazine, and worked briefly in lifestyle TV. Prior to joining Catch as Editor-at-Large, she was executive director of THiNK, a cutting-edge ideas event in Goa. She has a borderline manic enthusiasm for red wine, all things digital, Goa and chewing her nails, in no particular order. At Catch she oversees all things fun, features and lifestyle, including the site's internal Slack channels, which she runs like a personal fiefdom.

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