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नागपुर के किसानों के लिए 7/12 Kiosk का कमाल, ज़्यादा गांवों के लिए क्यों ज़रूरी?

अश्विन अघोर | Updated on: 23 May 2017, 17:33 IST
DIO नागपुर

प्रशासनिक बाधाओं के चलते यह विरले ही होता है कि किसानों को '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' समय पर मिल जाए. पर अब स्थितियां बदलेंगी, यह तय है. महाराष्ट्र के नागपुर में जिला प्रशासन देश में पहला '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' कीऑस्क (Kiosk) खोलने वाला जिला बन गया है. यह कीऑस्क (Kiosk) एक एटीएम जैसी मशीन है, जिससे किसानों को 'एक्स्ट्रैक्ट' जारी होते हैं. 

अब किसान अपने '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' की कॉपी कुछ ही मिनटों में हासिल कर सकते हैं और वह भी प्रति कॉपी 20 रुपये जितनी कम कीमत पर. और नागपुर से 20 किलोमीटर दूर फेटरी गांव देश का पहला गांव बन गया है, जहां कीऑस्क (Kiosk) स्थापित किया गया है. स्थापित होते ही यह कीऑस्क (Kiosk) क्षेत्र के किसानों के बीच भारी लोकप्रिय हो गया है. फेटरी गांव को प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने गोद लिया है.

क्या है '7/12 एक्स्ट्रैक्ट'?

'7/12 एक्स्ट्रैक्ट' किसानों के बीच सबसे लोकप्रिय दस्तावेज है. यह लगभग हर काम के लिए जरूरी होता है. साथ ही कटु सत्य यह भी है कि प्रत्येक किसान को इसे हासिल करने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है. चूंकि इसे हासिल करने के लिए किसानों को एक जटिल प्रक्रिया से गुजरना होता है, जिसमें एक आवेदन के साथ लेखाकार यानी तलाथी के कार्यालय पर अंतहीन इंतजार करना शामिल है. यह सारी प्रक्रिया बहुत सारा समय खाती है. कोई इस सारी प्रक्रिया को कर भी ले, तो भी इसके प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता कि उसे ये दस्तावेज समय पर मिल ही जाएंगे.

इन मौकों पर '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' की किसानों को ज़रूरत पड़ती है:

फसल लोन के लिए आवेदन करते समय.

सरकारी खरीद केंद्र पर अपनी उपज बेचने के लिए जाते समय.

विभिन्न कृषि गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता के लिए आवेदन करते समय.   

और अगर यह समय पर जारी नहीं होता है, तो किसान की सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है. नागपुर के जिला सूचना अधिकारी अनिल गडेकर के अनुसार इस पहल से किसानों को बहुत सहायता मिल रही है, जो कि अन्यथा दस्तावेज के लिए तलाथी कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर थे. अब '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' निकालना एटीएम से पैसा निकालने की तरह आसान हो गया है. चूंकि यह कंप्यूटर से जारी हुआ डिजिटल हस्ताक्षर युक्त दस्तावेज होता है, इसलिए इसके उपयोग से पूर्व इसे सत्यापित कराने की जरूरत भी नहीं होती है.                             

DIO नागपुर

यह सब कैसे हुआ?

'7/12 एक्स्ट्रैक्ट' हासिल करने में किसानों की मुश्किलों को देखते हुए नागपुर के जिला कलेक्टर सचिन कुर्वे ने ऐसी संभावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया था, जिसको विकसित करने से किसान की मशक्कत का अंत हो जाए.

काफी विचार-विमर्श के बाद पिछले साल एक एटीएम जैसी मशीन तैयार करने के विचार पर सहमति बनी थी. ऐसी मशीन तैयार किए जा सकने की संभावनाओं से उत्साहित होकर जिला प्रशासन ने दो निजी कंपनियों को इस काम की जिम्मेदारी दी.

गडेकर ने बताया कि एटीएम मशीन की तरह '7/12 कीऑस्क (Kiosk)' भी जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय के केंद्रीय लैंड-रिकॉर्ड डाटाबेस से इंटरनेट के माध्यम से जुड़ा होता है. किसान को इस मशीन में अपनी जमीन का ब्योरा जैसे सर्वेक्षण क्रमांक तथा जमीन का समूह नंबर डालना होता है. ये सारा विवरण समुचित रूप से भर देने के बाद किसान को '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' का प्रिंट निकालने के लिए मशीन में 20 रुपया डालने को कहा जाता है. यह एक 20 का नोट अथवा दो 10 के नोट या सिक्के हो सकते हैं. यह सुविधा फेटरी गांव के साथ आस-पास के गांवों में भी लोकप्रिय हो गई है. 

नागपुर से एक किसान वैभव गोहात्रे ने बताया, "ये संभवत: सरकार द्वारा की गई अब तक की सबसे बेहतर पहल है. इसके पहले हमें '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' हासिल करने के लिए या तो तहसील कार्यालय जाना होता था या फिर जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय. इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं थी कि ये दस्तावेज समय पर जारी हो जाएंगे. कई बार ये दस्तावेज हासिल करने के लिए हमें इन कार्यालयों के कई चक्कर लगाने होते थे और अब यह दस्तावेज हासिल करना कुछ मिनटों का खेल हो गया है और वह भी बिना किसी सरकारी अधिकारी की कृपा के."

नागपुर जिले में सोनेगांव लोधी गांव के एक किसान अजय ठाकुर ने तालाब बनाने के लिए सरकार से अार्थिक सहायता के लिए आवेदन किया था. उसके लिए उसे अपनी जमीन का '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' चाहिए था. ठाकुर ने बताया कि उसने ये दस्तावेज हासिल करने के लिए तहसील के कई चक्कर लगाए पर हर बार खाली हाथ लौटना पड़ा. फेटरी गांव का ये कीऑस्क (Kiosk) हमारे लिए वरदान की तरह आया, जब मुझे सिर्फ 20 रुपये में मिनटों में '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' मिल गया. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यह तालाब के लिए आर्थिक सहायता में आवेदन करने का अंतिम दिन था.

चूंकि ऐसे में हजारों किसान '7/12 एक्स्ट्रैक्ट' हासिल करने के लिए तहसील और कलेक्टर कार्यालय पर जमा होते हैं, इसलिए यह बहुत मुश्किल था संबंधित अधिकारी के लिए कि वह सभी किसानों की मांग पूरी कर पाए.

गडेकर ने बताया कि ऐसे में जिला कार्यालय पर भारी अव्यवस्था और धक्का-मुक्की भी हो जाती है और कभी-कभी किसानों तथा अधिकारियों के बीच तीखी नोक-झोंक भी देखने को मिलती है. काम ज्यादा होने के कारण किसानों को घंटों इंतजार करना होता है. पर इस कीऑस्क (Kiosk) से इन सारी समस्याओं का समाधान हो गया है. फिलहाल यह कीऑस्क (Kiosk) फेटरी गांव में प्रायोगिक आधार पर चलाया जा रहा है. जल्दी ही ये पूरे राज्य में स्थापित किए जाएंगे.

First published: 23 May 2017, 17:33 IST
 
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