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नामवर सिंह का जन्मदिन विवाद और हिन्दी की नामवर संस्कृति

संदीप सिंह | Updated on: 9 August 2016, 8:04 IST
(कैच न्यूज)

पिछले सप्ताह नामवर सिंह नब्बे वर्ष के हो गए. कई कारणों से उनका यह जन्मदिन महत्वपूर्ण और विवादित भी रहा. भारतीय संविधान की रचना में आंबेडकर के योगदान को मिथक मानने वाले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मौजूदा अध्यक्ष राम बहादुर राय ने केंद्र सरकार की तरफ से नामवर सिंह के जन्मदिन का उत्सव उत्साह से मनाया.

कार्यक्रम में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, संस्कृति मंत्री महेश शर्मा इत्यादि शामिल रहे. जैसा कि होना था, नामवर के इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर हिन्दी जगत में बहस का बाजार गर्म हो गया. उनके विरोधी और समर्थक दोनों मैदान में उतर चुके हैं और फिलवक्त वैचारिक नुक्ताचीनी जारी है.

बहसाबहसी के इस माहौल में कोई उन प्रश्नों को नहीं उठा रहा है जिनसे पूरा हिन्दी साहित्य ग्रस्त है. आज नामवर सिंह के ऊपर जो सवाल उठे हैं वह असल में हिन्दी साहित्य-समाज में फैली उस संस्कृति का हिस्सा हैं जिसे ‘नामवर संस्कृति’ कहा जा सकता है.

हिन्दी आलोचना के ‘शिखर-पुरुष’

नामवर सिंह हिन्दी साहित्य की उस पीढ़ी के आलोचक हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य आलोचना में मार्क्सवादी पद्धति को न सिर्फ स्थापित किया वरन लोकप्रिय बनाया. यह अलग बात है कि उनकी पद्धति पर सवाल उठते रहे. छायावाद, नयी कहानी और आधुनिक हिन्दी कविता पर उनकी कृतियां कालजयी मानी जाती हैं.

उनके प्रशंसकों को शिकायत रही है कि नामवर सिंह ने उतना नहीं लिखा जितना लिख सकते थे. फिर भी यह कहने में गुरेज नहीं है कि आज भी हिन्दी आलोचना काफी हद तक उनकी बौद्धिक और व्यक्तिगत छाया से मुक्त नहीं हुई है.

नामवर सिंह तो अपनी प्रतिभा और ज्ञान से वह सब दबा ले जाते हैं जो बाकी लोगों के सन्दर्भों में गंध मारने लगता है.

अलबत्ता कम लिखने की कसर उन्होंने भाषणों से पूरी की जिसके लिए वे विख्यात हैं. हिन्दी उपन्यास, आलोचना एवं अनेक साहित्यिक विषयों पर उनके वक्तव्य महत्वपूर्ण सूत्रों की तरफ इशारा करते हैं. जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में उनकी वाकपटुता के किस्से किंवदंतियों की तरह सुनाये जाते हैं.

मुख्तलिफ़ विचारधाराओं से लेकर विचारधारा-मुक्त श्रेणी तक, उनके पूर्व-छात्र इस बात पर सहमत हैं कि वे अप्रतिम अध्यापक हैं. इन गुणों के साथ निःसंदेह रूप से वे विभागीय राजनीति में भी पारंगत थे. देश भर के विश्वविद्यालयों में हिन्दी से जुड़ी रोजगार की जगहों में हुई नियुक्तियों में हाल-हाल तक उनके निर्णयात्मक हस्तक्षेपों से जुड़ी ढेरों अंतर्कथाएं हिन्दी विभागों में रोजी-रोटी तलाश रहे लोगों को बखूबी मालूम हैं.

जाहिर है इन प्रतिभाओं से लैस व्यक्ति एक ‘वृत्त’ का निर्माण करता है. कुछ लोग इस वृत्त का हिस्सा होते हैं, कुछ होना चाहते हैं और कुछ बाहर रह जाते हैं.

हिन्दी साहित्य-समाज की ‘रिडल’

यह कहना मुश्किल है कि ऐसा ‘वृत्त-निर्माण’ सिर्फ हिन्दी साहित्य की विशेषता है. ज्यादातर यह एक अखिल भारतीय विशेषता के रूप में हमारे सामने आती है. पर भाषा और साहित्य से जुड़े संस्थानों में यह अपने सर्वोच्च रूप में प्रकट होती है. हिन्दी साहित्य-समाज में बहुत गहरे तक जड़ जमा चुकी गुटबाजी, जातिवाद, संगठनवाद, परिवारवाद, मर्दवाद, सत्तावाद, इलाकावाद और सम्प्रदायवाद की कहानियां अब आमफहम हो चुकी हैं.

शायद इसकी जड़ें हिन्दी समाज के सांस्कृतिक इतिहास और इसकी सत्ता-संरचना में पैबस्त मूल्यों में मिलें. तात्कालिक कारण जो भी हो, हिन्दी का अदना सा शोधार्थी भी जानता है कि लेखक / कवि / आलोचक के रूप में स्थापित होने से लेकर ‘नौकरी पाने तक के कौन से नुस्खे’ हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा कारगर हैं. यह ऐसी सच्चाई है जिससे विद्वतजन मुंह नहीं मोड़ सकते. सवाल है कि इस ‘सच की निर्मिति’ में नामवर जैसे शिखर पुरुषों का क्या रोल रहा है.

उक्त कार्यक्रम में नामवर सिंह की भागीदारी को लेकर उठ रहे प्रश्नों पर हिन्दी साहित्य की इस सार्वभौमिक सच्चाई को ध्यान में रखते हुए ही विचार होना चाहिए. पर ऐसा नहीं हो रहा. नामवर विरोधियों ने जहां उनके पूर्ण-पतन की घोषणा कर दी तो नामवर समर्थक इसे ‘मानवीय भूलों’ और सत्ता के साथ साहित्यकार के रिश्ते के अमूर्त वैचारिक चिंतन में उलझा देना चाहते हैं.

हिन्दी की नामवर संस्कृति

उलझन तब होती है जब कोई बुद्धिजीवी नामवर सिंह जैसे किसी व्यक्तित्व को इन सबसे काटकर देखता है. तमाम गुणों के बावजूद एक व्यक्ति के बतौर नामवर सिंह उन सारे अंतर्विरोधों को समाहित किये हुए दिखते हैं जिनसे हिन्दी साहित्य-समाज का ‘मटेरियल’ निर्मित हुआ है.

अगर टटोलें तो देश के हर हिन्दी विभाग में छोटे-छोटे नामवर मिल जायेंगे. नामवर सिंह तो अपनी प्रतिभा और ज्ञान से वह सब दबा ले जाते हैं जो बाकी लोगों के सन्दर्भों में गंध मारने लगता है.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने (नामवरकाल में हिन्दी के छात्र) जेएनयू में अपने एडमिशन, निष्कासन और हिन्दी विभाग की सांस्कृतिक बनावट में नामवर सिंह की भूमिका के बारे में विस्तार से लिखा है.

नामवर सिंह को बचाना उतना जरूरी नहीं

साहित्य और राजनीति के चिंतनशील हलकों में सम्मानित प्रो. अपूर्वानंद नैतिक क्रोध के साथ नामवर के साथ खड़े दिखाई देते हैं. एक हफ्ते के भीतर नामवर सिंह पर दो लेख लिखकर ‘मानवीय छणों’ में हुई भूल पर जिरह करते हुए वे नामवर की ‘सार्वजनिक निगरानी’ की आलोचना करते हैं.

कला-केंद्र के कार्यक्रम में नामवर की भागीदारी के प्रश्न पर हुई बहस को नामवर के अकेले पड़ते जाने से जोड़ते हुए उन्हें इसमें कोई ख़ास आपत्ति नजर नहीं आती. वैचारिक रूप से गंभीर प्रश्न उठाते हुए वे पूछते हैं, “लेकिन कला केंद्र संघ की संस्था नहीं है.

भले ही आज के उसके अध्यक्ष संघ-परिवार के हों! तो क्या उनके वहां होने की वजह से कला केंद्र के कार्यक्रमों में शिरकत बंद कर देनी चाहिए, जो भारतीय करदाताओं के पैसे से चलता है? क्या विश्वविद्यालयों में संघ के या उसके करीबी कुलपतियों के होने की वजह से उनमें पढ़ना और पढ़ाना बंद कर देना चाहिए? इस तर्क के अनुसार क्या नामवरजी को केंद्र के आयोजन में जाने से सिर्फ इसलिए इनकार कर देना चाहिए कि उसके अध्यक्ष संघ-सदस्य हैं?”

जाहिर है, बिलकुल नहीं! राज्य की विभिन्न संस्थाओं में भागीदारी किसी भी मार्क्सवादी सिद्धांत की दृष्टि से अछूत प्रश्न नहीं है. प्रश्न वहां की जाने वाली कार्यवाही का है. विश्वविद्यालय का वीसी संघ का हो सकता है. इससे वीसी-विरोधियों को विश्वविद्यालय छोड़कर नहीं चले जाना चाहिए. वरन उस परिस्थिति में प्रतिरोध का नया मॉडल विकसित करना चाहिए. इस प्रश्न पर यही आम रुख है.

इसका एक खास रुख भी है जो ‘समय-सापेक्ष’ है. स्वयं अपूर्वानंदजी ने भी चिन्हित किया है कि आरएसएस/भाजपा के नेतृत्व वाली मौजूदा सत्ता-संरचना भारतीय समाज के ढांचें को ही छिन्न-भिन्न कर देना चाहती है. यानि भारतीय राजनीतिक इतिहास में यह एक खास परिस्थिति है.

गतवर्ष साहित्यकारों के आन्दोलनों पर नामवर सिंह की राय इसे और स्पष्ट कर देती है. ऐसी ख़ास परिस्थिति में सत्ता के साथ आलोचक के रिश्ते का प्रश्न बड़ी शिद्दत से उठता है. क्या नामवर सिंह को, कारण चाहे जो हो, इस प्रश्न-परीक्षा से मुक्त किया जा सकता है. खुद नामवर सिंह ने अपने सक्रिय दौर में क्या रुख अपनाया था?

उखाड़ने-पछाड़ने की नामवरी विरासत

इन प्रश्नों पर उनके रुख को समझने के लिए रामविलास शर्मा के प्रति नामवर सिंह की आलोचना को देखना चाहिए. अपने रचना-कर्म के आखिरी दशक में रामविलास शर्मा ज्यादातर संस्कृति और इतिहास के प्रश्नों से जूझते रहे. उस दौर में उनकी कई अकादमिक स्थापनाएं विवादास्पद मानी गयीं.

इस पर कटाक्ष करते हुए नामवर सिंह ने लिखा, 'उनकी ज्यादातर पुस्तकें ऋग्वेद से शुरू होती हैं' जो 'संघ-परिवार' के फासिस्ट इरादों को एक हथियार प्रदान कर रही हैं.'

रामविलास शर्मा की मृत्यु के पश्चात नामवरजी के सम्पादन में निकलने वाली आलोचना, 2001 के ‘रामविलास अंक’ में ‘कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से रामविलास शर्मा के उद्देश्य को ही संदिग्ध बताया गया. कहीं सीधे-सीधे ही उन्हें वर्णव्यवस्था का पोषक, प्रछन्न हिन्दुत्ववादी, अंधराष्ट्रवादी प्राच्यवाद का प्रचारक अथवा फंडामेंटलिस्ट कहा गया है.’ (पेज 130, प्रणय कृष्ण, शती स्मरण)

जबकि यह स्थापित बात है कि रामविलास शर्मा के चिंतन में चाहे जितने अन्तर्विरोध या अतिरेक रहे हों, उन्होंने ताउम्र नस्लीय श्रेष्ठता और रक्त-शुद्धता के उस विचार को ध्वस्त किया था जिस पर कोई भी फासिस्ट शिराजा खड़ा होता है.

साम्राज्यवाद, सामंतवाद और फासीवाद विरोध की धुरी पर खड़ा रामविलास शर्मा का चिंतन एक ऐसे ठेठ देशज मार्क्सवादी का चिंतन है जिसके कई पूर्वाग्रह है पर वह फंडामेंटलिज्म, अंधराष्ट्रवाद, प्राच्यवाद, हिंदुत्व, वर्णव्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में आजीवन मुब्तिला रहा. ऐसे व्यक्ति पर निशाना साधकर, सधवाकर, जाहिर है नामवर सिंह हिन्दी साहित्य का एजेंडा नहीं पूरा कर रहे थे.

नामवर संस्कृति से लड़ने की जरूरत

आज जरूरत नामवर सिंह पर फतवेबाजी की नहीं है और न ही गैरजरूरी तरीके से उनका बचाव करने की है. कृशकाय हो चले किन्तु कभी ‘महाबली’ रहे इस बुजुर्ग नामवर आलोचक की रामविलास शर्मा पर टिप्पणियां भी याद की जानी चाहिए.

सत्ता के हाथों 'संरक्षित' हो संस्कृति के 'बूढ़े बैल' का तमगा पा चुके नामवर के बहाने, सत्ता जहां मार्क्सवाद को अप्रासंगिक करार देती है वहीं बाकियों को नदी के दो पाटों के 'बीच ही चलने' का अनुमोदननुमा निर्देश भी दे देती है. विलक्षण भाषण-प्रतिभा के लिए विख्यात आलोचक यहां ‘शायद शिष्टाचार’ के चलते किसी भी बात का जवाब देने की जरूरत नहीं समझता.

नामवर सिंह के प्रशंसकों को शिकायत रही है कि नामवर सिंह ने उतना नहीं लिखा जितना लिख सकते थे.

उक्त कार्यक्रम में नामवर सिंह की भागीदारी पर नहीं मुझे उनके समर्थकों पर हैरत होती है. नामवर सिंह के आजकल के करीबी कई बुद्धिजीवी वर्तमान सरकार के खिलाफ ‘मोर्चे’ की रणनीति बनाने में लगे हुए हैं और नामवर सिंह फासीवादी सत्ता के कर-कमलों से सुशोभित हो रहे हैं.

उनके इस विचलन को 'गलत होने का ख़तरा उठाकर भी नएपन के प्रति स्वीकार्यता का अदम्य भाव’ कहकर क्या नजरअंदाज किया जा सकता है? हिन्दी समाज में अतिप्रतिष्ठित नामवर सिंह के इस कदम की आलोचना करना क्या उनके प्रति ‘अमानवीय’ हो जाना है? दरअसल, सत्ता और साहित्य दोनों को साधने की इस नामवरी विरासत की आलोचना विकसित करना ही भविष्य के साहित्य का कार्यभार है.

First published: 9 August 2016, 8:04 IST
 
संदीप सिंह @catchhindi

लेखक जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं. छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं. पढाई-लिखाई राजनीती विज्ञान, हिन्दी और दर्शनशास्त्र में हुई है. आजकल कलम की मजदूरी करते हैं. 

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