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सतत टकराव: क्यों अक्सर सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने आ जाते हैं?

सौरव दत्ता | Updated on: 13 July 2016, 8:05 IST
(कैच)

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति‍ के लिए बने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक करार देते हुए इसे न्यायाधीशों की नियुक्तियों में नियंत्रण का प्रयास बताया था और इसे खारिज कर दिया था.

यदि इस कानून को स्वीकार कर लिया जाता तो राजनीतिक सत्ता को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में काफी अधिकार मिल जाते. आयोग को खारिज कर देने के फैसले से शीर्षस्थ न्यायालय को कई वर्गों के विरोध का सामना करना पड़ा था. 

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संविधान पीठ का मानना था कि इससे तो जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश पैदा हो जाएगी. अब सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम (कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और शीर्षस्थ कोर्ट के चार अन्य वरिष्ठतम जज होते हैं) को लेकर नए टकराव की आशंका उत्पन्न हो गई है. 

खबरों के अनुसार चार हाईकोर्ट जजों की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति को रोक दिया गया है. अब यह पता लगाना असम्भव सा है कि ये चार जज कौन हैं और इन्हें सुप्रीम कोर्ट में जाने से क्यों रोका गया?

टकराव की मूल वजह

टकराव की मूल वजहों में एक है, न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रीय हित के नाम पर सरकार को वीटो पावर देने और जजों के चयन में एटार्नी जनरल की सहमति की जरूरत. 

इसी संदर्भ में सबसे ज्यादा ध्यान देने योग्य बात यह है कि एटार्नी जनरल सरकार का वरिष्ठतम न्यायिक अधिकारी होता है और उसकी नियुक्ति हमेशा ही राजनीतिक आधार पर होती है. अब ऐसे में कौन पारिभाषित और निश्चित करेगा कि राष्ट्रीय हित क्या है? 

विशेषकर जब वर्तमान सरकार और उसकी राजनीति के खिलाफ राय रखने वाले के लिए 'एंटी नेशनल' शब्द प्रचलित या लोकप्रिय हो गया है.

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कॉलेजियम और उसका स्याह कोना

कॉलेजियम प्रणाली 1993 से चली आ रही है. इस व्यवस्था को संसद द्वारा निर्धारित नहीं किया गया है. इसे खुद सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने निर्धारित किया था कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की राय के अनुरूप ही की जा सकती है अन्यथा नहीं. 

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इस निर्णय के बाद जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका लगभग समाप्त सी हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने कभी इस फैसले के पीछे के अच्छे या बुरे कारणों के बारे में कुछ नहीं बताया. यदि कोई भी भारतीय न्यायपालिका के उतार-चढ़ाव वाले इतिहास पर नजर डालेगा तो उसे संयोगवश भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण मिल सकते हैं. पर किसी भी आरोप या अभियोग को आज की तारीख तक साबित नहीं किया जा सका है.

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हालांकि जार्ज एच गडवोइस ( अमरीका के केंचुकी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर जिन्होंने 1950 से लेकर 1989 तक भारत के सुप्रीम कोर्ट में जज रहे 93 न्यायाधीशों की पृष्ठभूमि और जीवन के बारे में लिखा है) की लिखी किताब और अभिनव चंद्रचूड़ की 'दि इन्फॉर्मल कांस्टीट्यूशन: अनरिटेन क्राइटेरिया इन सलेक्टिंग जजेज फॉर दि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया' से उन अंदरूनी कारणों के बारे में पता चल सकता है कि कॉलेजियम सिस्टम क्यों विवादों के दलदल में धंसा है.

एक लैटिन कहावत है, 'पहरेदारों की पहरेदारी कौन करेगा?' यह कहावत अक्सर दिलचस्प और उत्तेजक माहौल में कही जाती है विशेषकर जब संविधान के प्रहरी होने के संदर्भ में चर्चा चल रही होती है.

न्यायपालिका की चालबाजियां तो कमरे में मौजूद उस हाथी की तरह है जिसे हर कोई नजरअंदाज करता है. यहां तक कि प्रख्यात न्यायविद् भी इस तरह की चालबाजियों का जिक्र करने को उत्सुक नहीं रहते क्योंकि उन पर आपराधिक अदालती अवमानना की तलवार हमेशा लटकती रहती है.

असली विडम्बना

न्यायपालिका और सरकार के बीच जो टकराव है, उससे इंदिरा गांधी और अदालतों के बीच की रस्साकशी की याद आ जाती है. श्रीमती गांधी और उनके सलाहकार चाहते थे कि जज उनके विचारों के आधार पर काम करें. न्यायिक उद्देश्य उनके लिए जरूरी नहीं हैं.

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इंदिरा गांधी एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहती थीं. वह चाहती थीं कि न्यायाधीश रोजमर्रा की सरकारी नीतियों से जुड़े रहें. और उनका कोर्ट पैकिंग का यह प्रयोग अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट से प्रेरित था जिन्होंने अपनी नई नीतियों (द्वितीय विश्वयुद्ध के बदले माहौल में) को अमल में लाने को कहा था. भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का यह सबसे काला प्रकरण है.

यही विडम्बना यहां भी है. नरेन्द्र मोदी के भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद जून 2014 में उनकी सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने वाली फाइल को कॉलेजियम को लौटा दिया था और इस पर पुनर्विचार का आग्रह किया था. 

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुवाई वाले कॉलेजियम ने पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के नाम को मंजूरी प्रदान की थी और उसे हरी झंडी के लिए सरकार के पास भेजा था. सुब्रमण्यम की प्रारम्भिक गलती यही थी कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त फ्रेंड ऑफ दि कोर्ट के रूप में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच की थी और तत्कालीन नरेन्द्र मोदी सरकार को घेरे में लिया था. 

बतौर एमाइकस क्यूरी (न्याय मित्र) सुब्रमण्यम गुजरात सरकार के प्रति अदालत में काफी आक्रामक रहे थे. उनके द्वारा नए तथ्यों को सामने लाने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. ये मामला नरेंद्र मोदी के गले की फांस बन गया था.

ऐसे में इस बात के बहुत कम आसार हैं कि न्यायपालिका और सरकार के बीच गतिरोध जल्द सुलझने वाला है.

First published: 13 July 2016, 8:05 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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