Home » इंडिया » Catch Hindi: narendra modi government is planning to create 1.5 lakh new bpo jobs in small cities
 

बीपीओ के भरोसे बेरोजगारों से निपटने की ताक में मोदी सरकार

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के छोटे शहरों में बीपीओ सेक्टर में डेढ़ लाख नई नौकरियों देने के लिए नई योजना शुरू की है. पीएम बनने के बाद मोदी ने हर साल 20 लाख नई नौकरियां देने का वादा किया था.
  • राजनीतिक जानकारों के अनुसार इन योजना का उपयोग राजनीतिक संदेश देने में कर सकती है. बीजेपी छोटे शहरों में संदेश देना चाहती है कि सरकार नई नौकरियों के सृजन को लेकर गंभीर है.

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने हर साल 20 लाख नौकरियां देने का वादा किया था. यानी उनके पांच साल के शासन में कुल एक करोड़ नौकरियां तैयार होंगी.

मई में नरेंद्र मोदी सरकार अपने दो साल पूरी कर लेगी. सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अपने वादे के अनुरूप नई नौकरियां नहीं तैयार कर पाने के लिए हो रही है.

अब सागर में एक बूंद की तरह सरकार बीपीओ प्रमोशन स्कीम लेकर आई है. हो सकता है कि आपके बैंक डिपॉजिट, बीमा या अन्य चीजों से जुड़ा कोई फोन आए तो वो दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद या मुंबई से नहीं बल्कि वाराणसी, इलाहाबाद, पटना या गया से हो सकती है.

पढेंः सरकार की चुनौती है राजनीतिक स्पीडब्रेकरों से पार पाना

केंद्र सरकार ने बीपीओ सेक्टर को देश के सेंकेड और थर्ड टीयर शहरों तक ले जाने का फैसला किया है. सरकार ने इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं.

बीजेपी सरकार ने छोटे शहरों को बीपीओ हब बनाने के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं

संचार एवं सूचना प्रोद्यौगिकी तकनीकी मंत्रालय ने 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ये योजना लागू करने का फैसला किया है.

द सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (एसटीपीआई) को इस योजना को लागू करने वाली नोडल एजेंसी बनाया गया है.

एसटीपीआई के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर ओमकार राय ने कैच को बताया, "इस योजना से करीब डेढ़ लाख नई नौकरियां तैयार होंगी. ये योजना तीन चरणों में लागू होगी. पूर्वोत्तर के राज्यों में इसका परीक्षण शुरू हो चुका है. अब इसे दूसरे शहरों में ले जाने का सही समय आ गया है."

पढ़ेंः पेंशन फंड पर मुनाफे के लिए कितना जोखिम सही है?

राय कहते हैं, "इसके तहत उन शहरों को केंद्र में रखा जाएगा जो अभी बीपीओ केंद्र नहीं हैं. यानी इससे देश के छोटे शहरों के लोगों को फायदा होगा."

फिलहाल, देश के 10 शहरों को बीपीओ हब के रूप में जाना जाता है. ये शहर हैं, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, पुणे और दिल्ली-एनसीआर. इनके अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बीपीओ योजना का प्रसार हुआ है. इसीलिए सरकार ने इस योजना से इन शहरों और पूर्वोत्तर को बाहर रखने का निर्णय लिया है.

नौकरी की राजनीति


बीपीओ योजना अभी लागू नहीं हुई है. लागू होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने जितनी नौकरियां देने का वादा किया था उनका बहुत छोड़ा हिस्सा ही इससे पूरा हो सकेगा.

लेकिन सरकार इसका उपयोग राजनीतिक बयानबाजियों में कर सकती है.

बीजेपी के एक नेता कहते हैं, "छोटे शहरों में इस तरह की बीपीओ हब खुलन से लोगों को इस बात पर यकीन होगा कि प्रधानमंत्री लोगों को रोजगार देने के बारे में गंभीर हैं. लोगों को जब अपने शहर में रोजगार मिलना शुरू होगा तो उनका शहरों में पलायन रुकेगा."

बीजेपी को उम्मीद है कि बीपीओ योजना का असल 2018 तक दिखने लगेगा

इस योजना के लिए आवंटित फंड काफी कम है. ऐसे में सरकार 'न्यूनतम निवेश अधिकतम लोकप्रियता' के हिसाब से काम करेगी.

बीजेपी नेता इससे असहमति जताते हैं. वो कहते हैं, "ये केवल एक योजना है, जिससे डेढ़ लाख से अधिक नौकरियां मिलेंगी. लेकिन ये एक ही योजना नहीं है. हमने जनता से नौकरी देने का जो वादा किया है उसे निभाएंगे."

पढ़ेंः 2016 में चीन से तेज रहेगी भारत की आर्थिक विकास दर

भारतीय बीपीओ सेक्टर इस समय मंदी से जूझ रहा है. इसका असर रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ रहा है. गुरुग्राम (गुड़गांव) जैसे शहरों में इस मंदी का असल साफ देखा जा सकता है.

फिर भी सरकार को उम्मीद है कि छोटे शहरों में इस योजना को लागू करने का असर साल 2018 तक दिखने लगेगा. जिससे सरकार की सकारात्मक छवि बनेगी.

हालांकि ये सवाल बना रहेगा कि इस बूंद से क्या समुद्र की प्यास बूझेगी?

First published: 4 May 2016, 11:11 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी