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आप: स्वच्छ छवि हमारी पूंजी है, नरेंद्र मोदी इसे खराब करना चाहते हैं

आशुतोष | Updated on: 8 July 2016, 8:11 IST
QUICK PILL

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का एक प्रसिद्ध कथन है कि यदि दो अनुचित काम से बात न बने तो तीसरी बार कोशिश करो. नरेंद्र मोदी का भी यही विश्वास है कि यदि तीन अनुचित कामों से भी बात न बने तो चौथी बार प्रयास करो. पिछले दस दिन उनके इसी विश्वास के उदाहरण हैं. 

पहला, आप विधायक दिनेश मोहनिया को महिला के साथ छेड़खानी करने के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया. इसके बाद विधायक नरेश यादव पर कुरान के साथ बेअदबी मामले में पंजाब पुलिस द्वारा मनगढ़न्त आरोप पर मामला दर्ज किया गया. 

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04 जुलाई को कुछ घंटे के भीतर ही मोदी के दो दोषपूर्ण काम सामने आ गए. पहला, आप के कैबिनेट मंत्री कपिल मिश्रा से वाटर टैंक घोटाले मामले में पूछताछ की गई जबकि वही शिकायतकर्ता थे. और शाम को अरविन्द केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार को भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. 

राजेंद्र कुमार की कहानी

पिछले साल 15 दिसम्बर को मोदी सरकार की सीबीआई ने मुख्यमंत्री कार्यालय के पास अरविन्द केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर में छापा मारा था. आरोप लगाया था कि वे 2006 के भ्रष्‍टाचार के मामले में वह शामिल थे. उस दौरान शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं. शिकायत दिल्ली सरकार के ही एक अंसतुष्ट अधिकारी ने की थी जिसने मोदी सरकार को अरविन्द केजरीवाल को घेरने का मौका दिया था. 

सीबीआई को राजेंद्र कुमार के घर से साक्ष्य के तौर पर कुछ नहीं मिला, सिवाय शराब की कुछ बोतलों को छोड़कर. सीबीआई कोर्ट ने भी छापे के तौर-तरीकों से नाखुशी जाहिर की. दरअसल, 8 अप्रैल को ही कोर्ट ने मामले को दिल्ली हाईकोर्ट को सौंप दिया था कि वह मामले में सीबीआई के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला चलाए.

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दिल्ली हाईकोर्ट कई बार कानून की पालना न करने और ठोस सबूतों को पेश करने में विफल रहने पर सीबीआई की खिंचाई कर चुकी है. कोर्ट ने कहा है कि प्रमुख जांच एजेंसी होने के नाते सीबीआई से अपेक्षा की जाती है कि वह कानूनों का पालन करे. 

कोर्ट ने यह भी पाया है कि सीबीआई का आचरण  साफ तौर पर महत्वाकांक्षी संस्था की तरह का होता है. ज्यादा रहस्यपूर्ण तो यह है कि उल्टे लगभग एक माह में ही संबंधित हाईकोर्ट जज का ट्रासंफर कर दिया गया. और अब राजेंद्र कुमार को उप सचिव तरुण शर्मा के साथ गिरफ्तार किया गया. तरुण शर्मा उनके साथ ही काम कर रहे थे. हालांकि तरुण शर्मा का नाम एफआईआर में नहीं है. 

अनुत्तरित सवाल

जब राजेंद्र कुमार को कोर्ट में पेश किया गया तो सुनवाई के दौरान सीबीआई बचाव पक्ष के वकीलों के सवालों का जवाब नहीं दे सकी. सीबीआई उन्हें हिरासत में लिए जाने की क्यों मांग कर रही थी जबकि सभी अधिकारी जांच में जांच एजेंसी का सहयोग कर रहे हैं. और छापा मारने के छह माह बाद उनको गिरफ्तार करने की अचानक जरूरत क्यों महसूस होने लगी थी? 

वास्तव में, अदालत के शोर-शराबे के बीच वरिष्ठ वकीलों में से एक को यह कहते सुना गया कि सीबीआई अपने रानीतिक आकाओं से प्रेरित है और अपने राजनीतिक आकाओं की मंशा पर ही काम करती है. जब यह सब हो रहा था, मैं कोर्ट में मौजूद था. यह सुनकर सीबीआई के अफसरों का चेहरा लाल पड़ गया. 

आम आदमी पार्टी ने अपने पहले कार्यकाल में शीला दीक्षित के खिलाफ तीन रिपोर्ट दर्ज कराई थी

राजेंद्र कुमार के मामले के लावा 04 जुलाई की सुबह एक और घटना की गवाह हो गई. जल मंत्री कपिल मिश्रा को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा वाटर टैंक घोटाले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था. 

मैं अपने पाठकों को क्रमबद्ध रूप से यह बताना चाहूंगा कि कपिल मिश्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है. आरोप तत्कालीन मुख्य मंत्री शीला दीक्षित पर हैं. उन्हीं के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ था. 

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यह घोटाला अरविन्द केजरीवाल की सरकार के समय नहीं हुआ था. लेकिन एक भाजपा नेता ने दिल्ली विधान सभा में आरोप लगाया कि आप सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. 

और जब केजरीवाल सरकार ने यह मामला जांच के लिए आगे बढ़ा दिया तो जांच के सिलसिले में पहले व्यक्ति के रूप में जिस  व्यक्ति को बुलाया गया वह जल मंत्री ही थे जिन्होंने जांच को आगे बढ़ाया था. यह जल मंत्री ही थे जिन्होंने रिपोर्ट तैयार की थी और जांच के लिए फॉरवर्ड की थी.  

और वह व्यक्ति जो घोटाले के लिए कथित रूप से जिम्मेदार है, शीला दीक्षित को अभी तक नोटिस भी नहीं भी गया है. इससे मोदी सरकार के उद्देश्यों पर सवाल उठते हैं क्योंकि एसीबी सीधे गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है. 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में शीला दीक्षित के खिलाफ तीन रिपोर्ट लिखाई थी. दो साल से ज्यादा समय हो गया, उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की शुरुआत तक नहीं की गई. उनसे पूछताछ तक नहीं की गई. हिरासत में पूछताछ की बात तो भूल ही जाइए.

यदि कपिल मिश्रा से पूछताछ की जा सकती है तो फिर शीला दीक्षित पर कार्रवाई न करने के लिए एसीबी चीफ मुकेश मीणा पर भी मामला दर्ज करना चाहिए. 

इससे भी कई गंभार सवाल उठ खड़े हो रहे हैं कि शीला दीक्षित को क्यों बचाय़ा जा रहा है. इससे यही साबित होता है कि मोदी सरकार केजरीवाल सरकार के खिलाफ प्रतिशोध की भावना से काम कर रही है. 

और ज्यादा समस्याएं

लेकिन शीला दीक्षित का मामला ही अकेला मामला नहीं है. भाजपा विधायक ओपी शर्मा पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर एक राजनीतिक कार्यकर्ता को पीटते हुए कैमरे पर पकड़े गए थे. यह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने विधायक अलका लाम्बा के खिलाफ अपशब्द कहे थे. उन्होंने लाम्बा को खुलेआम धमकी दी थी. उनके आदमियों ने अलका पर पत्थर भी फेंके थे. 

लेकिन, दिल्ली पुलिस जो सीधे मोदी सरकार को रिपोर्ट करती है, उसने कोई कार्रवाई नहीं की. उन्हें प्रारम्भिक तौर पर गिरफ्तार भी नहीं किया गया. मीडिया ने इस मुद्दे पर जब अभियान चलाया तो औपचारिकता के तौर पर उनकी गिरफ्तारी की गई. उन्हें सिर्फ तकनीकि रूप से गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने उन्हें तुरन्त जमानत भी दे दी. 

केंद्र में भी नरेंद्र मोदी के कामकाज का तरीका गुजरात वाला ही है

ठीक इसी तरह का मामला कन्हैया प्रकरण भी है. दिल्ली पुलिस ने कन्हैया और पत्रकारों को कोर्ट परिसर में पीटने वाले बदमाश किस्म के वकीलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. घटना की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त वरिष्ठ वकीलों की एक समिति ने भी की थी. 

इसके विपरीत आप विधायकों को छोटे-छोटे मामलों पर ही गिरफ्तार कर लिया जाता है. विधायक महेन्द्र यादव को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया था जब वे तीन साल की बलात्कार पीड़िता बच्ची को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. 

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एक अन्य विधायक कमांडो सुरेन्द्र, जिन्होंने मुम्बई के 26/11 के हमले में आतंककारियों से लोहा लिया था, को भी गिरफ्तार किया गया. उनका कसूर केवल इतना था कि वे प्रधानमंत्री आवास के पास एक युवक को एमसीडी के भ्रष्ट अफसरों से बचाने की कोशिश कर रहे थे. 

दिल्ली पुलिस ने भाजपा विधायक महेश गिरी और एनडीएमसी के उपाध्यक्ष करन सिंह तंवर को एमएम खान की हत्या मामले में बुलाया तक नहीं. इन दोनों महान पुरुषों ने हत्य़ा के अभियुक्तों के पक्ष में पत्र भी लिखे थे. 

मैं अनुमान लगा सकता हूं कि यदि आप नेताओं ने ऐसे पत्र लिखे होते तो वे सलाखों के पीछे होते. लेकिन यहां तो कोई कार्रवाई तब भी नहीं हुई जब खान के परिवार वाले बार-बार न्याय की गुहार लगा रहे हैं. 

अब क्या?

मैं यह कहने की जरूरत नहीं समझता कि मोदी सरकार को रिपोर्ट करने वाली एजेंसियां जैसे दिल्ली पुलिस, एसीबी या सीबीआई आप नेताओं के साथ दुर्भावना पूर्ण तरीके से तरीके से व्यवहार करती है. यह ऊपर के राजनीतिक संरक्षण के बिना नहीं हो सकता. 

अगर आम आदमी पार्टी अपने नैतिक मूल्य खो देती है तो वह दूसरी पार्टियों से अलग नहीं रह जाएगी

मोदी के प्रतिशोधी होने की दो मूल वजहें हो सकती हैं. एक तो गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्हें कहीं भी चुनावी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा. 

दिल्ली में उनकी पहली चुनावी पराजय हुई जो काफी तकलीफदेह रही होगी. उनके नेतृत्व में राजधानी में ही भाजपा का एक बड़ा हिस्सा निकल गया. लगता नहीं कि वह इस पराजय को भूल पाएंगे और न ही अपने राजनीतिक विरोधियों को माफ कर सकेंगे. उनका काम करने का तरीका गुजरात वाला ही है जहां वह किस तरह अपने प्रतिद्वंदियों और विरोधियों से निपटते थे. 

दूसरा यह कि वह बहुत ही महत्वाकांक्षी इंसान और शॉर्प पॉलिटिशयन हैं. दिल्ली में जीत के बाद आप पंजाब और गोवा में बढ़ रही है. इन दोनों राज्यों में एनडीए सत्ता में है.  

क्या आम आदमी पार्टी पंजाब में अतिआत्मविश्वास का शिकार हो रही है?

ओपिनियन पोल की मानें तो आप को पंजाब और गोवा में अप्रत्याशित जीत मिलने जा रही है. इससे भाजपा का अपसेट होना स्वाभाविक ही है. आप गुजरात में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही है. 

यहां दिसम्बर 2017 में चुनाव होने हैं. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से भी उत्साहजनक खबरें हैं. यदि य़ही क्रम जारी रहा तो आप एक दिन देश में प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आएगी.

मोदी को मालूम है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का उनकी पार्टी से कोई मेल नहीं है. लेकिन अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप से उन्हें उनके मिशन 2019 के लिए गंभीर खतरा है. 2019 में वह 2014 की तरह सफलता की आशा कर रहे हैं. 

आप की यूएसपी उसकी स्वच्छ छवि है. यह साबित भी किया  सकता है. यदि आप अपना शील और नैतिक मूल्य खो देगी तो वह अन्य राजनीतिक दलों से अलग नहीं रह जाएगी. 

आप के नेताओं और अधिकारियों की भेदभाव पूर्ण गिरफ्तारी आप पर धब्बा लगाने का एक प्रयास है. क्या मोदी आप को बदनाम करने या उसकी यूसीपी से उसको वंचित करने की अपनी कोशिशों में सफल होंगे? 

इतिहास का छात्र होने के नाते मैं कह सकता हं कि मैक्यावेली-वादी निक्सन भी सभी कोशिशों के बावजूद अपने मिशन में विफल रहे थे. उन्हें इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा था. मैं आश्वस्त हूं कि राजनीति कोई गणित नहीं हैं. 

(आशुतोष आम आदमी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं. संस्थान की उनसे सहमति आवश्यक नहीं है.)

First published: 8 July 2016, 8:11 IST
 
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