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आदर्श ग्राम योजना: मोदी को आईना दिखा रहे उन्हीं के मंत्री और सांसद

समीर चौगांवकर | Updated on: 20 January 2016, 12:04 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी योजना \"आदर्श ग्राम\" सांसदों की उपेक्षा से अधर में लटकती दिखाई दे रही है. आदर्श ग्राम योजना के तहत सांसदों को एक महीने के अंदर अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक गांव को गोद लेना था.
  • आदर्श ग्राम योजना पर लोकसभा के 50 सांसदों और राज्यसभा के 57 सांसदों ने कोई भी दिलचस्पी नहीं दिखाई है. योजना को नजरअंदाज करने वाले सबसे ज्यादा सांसद पश्चिम बंगाल से हैं.

11 अक्टूबर, 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने जोरशोर से आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की थी तब गांवों के कायाकल्प की उम्मीद की गई थी. प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों, सांसदों और विधायकों से एक-एक गांव गोद लेने और उसे आदर्श बनाने की भावुक अपील की थी.

ज्यादातर लोगों की उस वक्त यही राय थी कि यह योजना वास्तव में गांवों का चेहरा बदल सकती है. लेकिन डेढ़ साल बीतते-बीतते गांवों की किस्मत जस की तस होती दिख रही है. नरेंद्र मोदी के मंत्री और भाजपा के सांसद भी अब आदर्श गांवों से दूरी बनाने लगे है.

आदर्श ग्राम योजना के तहत सांसदों को एक महीने के अंदर अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक गांव को गोद लेना था. उस गांव को प्राथमिकता में रखते हुए तमाम मूलभूत सुविधाओं से जोड़ना था. योजना दो चरणों में पूरी होनी थी. हर सांसद को एक गांव गोद लेकर उसे 2016 तक आदर्श गांव में परिवर्तित करना था.

पहले चरण में लोकसभा के 50 सांसदों ने और राज्यसभा के 57 सांसदों ने इस योजना में कोई दिलचस्पी नहीं ली

इसके अलावा 2019 तक दो अतिरिक्त गांवों को विकसित करना था.दूसरा चरण कायदे से जनवरी 2017 से शुरू होना है. लेकिन पहले ही चरण का कामकाज आधे-अधूरे तरीके से हुआ है. ज्यादातर सांसद पहले चरण के तयशुदा मानकों से काफी पीछे हैं. किसी ने भी दूसरा गांव चुनने की जहमत नहीं उठाई है.

सांसद आनाकानी कर रहे है

पहला चरण भी कोई खास सफल नहीं कहा जाएगा. पहले चरण में लोकसभा के 50 सांसदों ने और राज्यसभा के 57 सांसदों ने इस योजना में कोई दिलचस्पी नहीं ली. योजना को नजरअंदाज करने वाले सबसे ज्यादा सांसद पश्चिम बंगाल से हैं. यहां के 38 सांसदों ने कोई भी गांव गोद नहीं लिया है.

तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों सुल्तान अहमद और बिजॉय चंद्र बर्मन ने ही इस योजना के लिए कदम बढ़ाया है.केन्द्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने भी अभी तक कोई गांव गोद नहीं लिया है. पर्रीकर की श्रेणी में ही भाजपा सांसद तरूण विजय भी हैं. आदर्श ग्राम योजना के पहले चरण के अनुभव के बाद अब दूसरे चरण के लिए ज्यादातर सांसद तैयार नहीं हो रहे है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बार-बार पत्र लिखकर अनुरोध करने के बाद भी ज्यादातर सांसदों ने अभी तक इस योजना में दिलचस्पी नहीं दिखाई है. भाजपा के सांसदों को लग रहा है कि इस योजना से उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा है.

दूसरे चरण के लिए 90 प्रतिशत भाजपा सांसदों ने गांव का नाम भी तय नहीं किया है

भाजपा के एक सांसद नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, 'आदर्श ग्राम योजना के तहत चुने गए गांव के विकास के लिए अलग से फंड न होने के कारण उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. आदर्श ग्राम योजना में पैसा ज्यादा लग रहा है जिसके कारण क्षेत्र में दूसरी अन्य जगहों पर कटौती करनी पड़ रही है और जनता की नाराजगी झेलनी पड़ रही है. इसकी वजह से दूसरे चरण से भाजपा के ज्यादातर सांसद मुंह फेरे हुए हैं.'

दूसरे चरण के अन्तर्गत सांसदों को एक और गांव का चयन कर दिंसबर 2015 तक ग्रामीण विकास मंत्रालय को देना था ताकि 2016 की शुरुआत में इससे जुड़ी औपचारिकताएं पूरी हो सके. लेकिन दूसरे चरण के लिए 90 प्रतिशत भाजपा सांसदों ने गांव का नाम भी तय नहीं किया है.

भाजपा सांसदों की इस योजना से दूरी के चलते ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह को दो बार पत्र लिखकर सभी सांसदों से अनुरोध करना पड़ा कि महीने के अंत तक वे आदर्श ग्राम के लिए किसी गांव का चयन करें और मंत्रालय को इसकी सूचना दें. ग्रामीण विकास मंत्रालय के लगातार अनुरोध के बाद भी अभी तक लोकसभा के सिर्फ 28 और राज्य सभा के 7 सांसदों ने इस पत्र का जवाब दिया है.

भाजपा के एक कद्दावर नेता और केन्द्र में कैबिनेट मंत्री का कहना है, ‘यह योजना कई मुश्किलें पैदा कर रही है. अलग से फंड न होने से आदर्श ग्राम के लोगों की अपेक्षाएं पूरी कर पाना संभव नहीं हो रहा है. इससे दूसरे गांवों के लोगों का सामना करने में सांसदों को दिक्कत हो जाती है. लोगों को लगता है कि चुना तो सबने मिलकर है लेकिन फायदा किसी एक गांव को मिल रहा है.' नेता दूसरे गांवों की इस नाराजगी का नतीजा आने वाले चुनाव में वोटों के नुकसान के रूप में देख रहे हैं.भाजपा के सांसदों का कहना है कि प्रधानमंत्री को आदर्श ग्राम से जुड़ी मुश्किलें और व्यवहारिक दिक्कतों को समझना होगा.

योजना की प्रगति से पीएमओ खुश नहीं

सूत्र बताते है कि प्रधानमंत्री कार्यालय आदर्श ग्राम योजना के एक साल बाद की प्रगति से खुश नहीं है. भले ग्रामीण विकास मंत्रालय इस योजना का नोडल मंत्रालय है लेकिन इसकी निगरानी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय कर रहा है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में पाया है कि एक साल के दौरान ज्यादातर सांसद सिर्फ एक बार ही अपने आदर्श ग्राम का हालचाल जानने गए.इसके अलावा एक साल के अंदर गांव में जिस तरह की प्रगति का अनुमान था उसमें ज्यादातर गांव खरे नहीं उतरे हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय की समीक्षा रिपोर्ट के मुताबिक सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, पुस्तकालय, सामुदायिक केन्द्र जैसे बुनियादी ढांचे का विकास, ई गवर्नेस, ई साक्षरता, समयबद्ध सेवा, शिकायत निवारण केन्द्र, पर्यावरण अनुकूल विकास के मानक पूरे करने के साथ ही समग्र विकास के मापदंड पर ज्यादातर सांसदों के गांव विफल रहे हैं और अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है.

क्या है मोदी की योजना

  • कुल 793 सांसद है. इनमें लोकसभा के 543 व राज्यसभा के 250 सांसद है.
  • 800 गांवों की तस्वीर दो साल के भीतर बदलना चाहते हैं प्रधानमंत्री मोदी.
  • 11 अक्टूबर 2014 को जेपी के जन्मदिन पर मोदी ने आदर्श ग्राम योजना शुरू की.
  • 2016 तक हर एक सांसद के लिए एक आदर्श गांव बनाने का लक्ष्य रखा है.
  • देश के गांवों का हाल
  • 50 प्रतिशत गांवों में अभी तक सड़क नहीं बनी है.
  • 11 प्रतिशत से ज्यादा गांवों में पेयजल की सुविधा नहीं.
  • देश में कुल 6,38,365 गांव हैं.
  • भारत की 68.84 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है.
  • 2500 गांवों का कायाकल्प करने की योजना थी 2019 तक आदर्श ग्राम योजना के तहत.

First published: 20 January 2016, 12:04 IST
 
समीर चौगांवकर @catchhindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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