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मोदी के लिए उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती है गुजरात

पाणिनि आनंद | Updated on: 7 August 2016, 8:32 IST

उत्तर प्रदेश में 2014 की जीत भाजपा के लिए ऐतिहासिक थी. 80 में से 73 सीटें एक अभूतपूर्व प्रदर्शन था. और इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो एक चिंता खाए जा रही है, वो है 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में इस प्रदर्शन की पुनरावृत्ति. भाजपा के पास 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य में केवल 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है. इसे 265+ के नारे में बदलने के लिए मोदी और उनके सेनापति दिन रात एक करने में लगे हैं.

लेकिन मोदी का दर्द केवल उत्तर प्रदेश नहीं है. ऐसे समय में, जबकि एक के बाद एक राज्यों में भाजपा दरकती नज़र आ रही है, उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती है उस दुर्ग को बचाना जिसके प्राचीर से मोदी ने दिल्ली को ललकारा और खुद को एक मॉडल के तौर पर प्रस्तुत किया. यहां बात गुजरात की हो रही है. गुजरात में वर्ष 2017 के अंतिम चरण में विधानसभा चुनाव होने हैं.

गुजरात मोदी का अभेद्य दुर्ग है. यहां पिछले 19 वर्षों से भाजपा की सरकार है. इसमें भी 2001 से यहां पर नरेंद्र मोदी की सत्ता रही. 2002 के बाद से तो गुजरात का मतलब मोदी और मोदी का मतलब गुजरात हो गया. मोदी 2001 से 2014 तक गुजरात की गद्दी पर जमे रहे. यह गद्दी उन्होंने तब छोड़ी जब प्रधानमंत्री की गद्दी उनके लिए खाली हो गई. गुजरात का तख्त खाली करते हुए मोदी ने अपनी सबसे विश्वस्त आनंदीबेन पटेल को इसका उत्तराधिकार सौंपा और खुद दिल्ली आ गए.

लेकिन आज गुजरात में न तो नरेंद्र मोदी हैं और न ही अमित शाह. दुर्ग जिन हाथों में सौंपा गया था, वो उसे साध नहीं सके. दीवारें दरक रही हैं. कहीं पाटीदार आंदोलन का हमला है तो कहीं आदिवासियों का मोहभंग. कहीं दलितों ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है तो कहीं पार्टी और राज्य सरकार की आपसी अंतर्कलह इस मोदी मॉडल की चूलें हिलाने में लगी है.

मोदी की ताकत

मोदी की राजनीति का ताना-बाना उनके गुजरात मॉडल के इर्द-गिर्द खड़ा है. इसमें एक अपना जनाधार है जो पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ रहा और दूसरा बड़ा हिस्सा कांग्रेस से तोड़कर अर्जित किया हुआ है. कांग्रेस की गुजरात में ताकत खाम (KHAM) के समीकरण पर आधारित रही है. खाम यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम. मोदी ने बहुत खूबसूरती से इसे कांग्रेस से तोड़कर अपने साथ मिलाया. सबसे ज़्यादा काम हरिजन और आदिवासी वोटों पर हुआ. इसका असर भी दिखा.

गुजरात में आदिवासियों और हरिजन वोट को तोड़ने में संघ की एक बड़ी भूमिका रही है. मिश्नरियों के खिलाफ शुरू हुए अभियान के ज़रिए संघ ने चुपचाप एक ज़मीन राज्य में तैयार की. इसी ज़मीन पर हिंदुत्व की खेती की गई और भाजपा के लिए जनाधार का विस्तार हुआ. यह संयोग नहीं था कि गुजरात में 27 फरवरी 2002 को गोधरा में ट्रेन में आग की घटना के तुरंत बाद पहली प्रतिक्रिया आदिवासियों की ओर से ही हुई थी. उन्होंने एक ही झटके में 40 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

व्यापारी वर्ग और पाटीदार भाजपा की ताकत रहे. उनका राज्य के व्यापार और राजनीति पर प्रभाव है. मोदी को इसका लाभ मिलता रहा. इसी ताने-बाने पर बैठकर मोदी ने मुसलमानों को राज्य में अप्रासंगिक बना दिया और एक के बाद एक चुनाव जीतते गए. इसी जीत को देश और दुनिया में एक सुशासन और विकास के मॉडल के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा. मोदी के पूरे प्रचार में सबसे अहम कड़ी गुजरात मॉडल था. इसी मॉडल की पुनरावृत्ति ने चुनाव में लहर बनाई और मोदी का छवि निर्माण किया.

दुरूह होता दुर्ग

लेकिन 19 साल बाद अब भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस आकर्षण को बनाए रखने की है. गुजरात में अब मोदी नहीं हैं. मोदी की अनुपस्थिति में यह चुनौती और भी कठिन हो जाती है. खासकर तब जब उत्तराधिकार और दूसरे रास्ते सत्ता पर नियंत्रण का खेल अंतर्कलह को बढ़ाने लगे.

रही सही कसर पाटीदार आंदोलन और अब दलितों के विद्रोह ने पूरी कर दी है. एक ही पार्टी की सरकार से अब ऊबने लगे गुजरात के लिए मोहभंग के लिए एक छोटा बहाना भी बड़ा बन सकता है. हार्दिक पटेल का आंदोलन और फिर उसका जेल जाना एक बड़ी चोट भाजपा को दे चुका है. किसानों की बदहाली और ग्रामीण गुजरात की कमज़ोर स्थिति ने आदिवासियों का मोहभंग शुरू कर दिया है. दलित ऊना की घटना के बाद से राज्यभर में भाजपा के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं.

इस तरह जीत का जो सामान्य सा अंतर भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा है, उस प्रतिशत की खाई तेज़ी से भरती जा रही है. कांग्रेस का नेतृत्व आज भी क्षत्रियों के हाथों में है. मुस्लिम वोट भी कांग्रेस के साथ है. बाकी का जनाधार अभी तक भाजपा की ओर था और इसलिए कांग्रेस के पास जीत का जादुई आकड़ा कम ही जुट पाता था. लेकिन अब ताज़ी बयार में कांग्रेस का जनाधार लौट रहा है. दलितों और आदिवासियों के बीच कांग्रेस ने काम भी शुरू कर दिया है. राज्य में चल रहे आंदोलनों को कांग्रेस भीतरखाने हवा दे रही है और अपने लिए संभावनाओ को मज़बूत कर रही है.

गुजरात में भाजपा का जनाधार बचाने के लिए उसे मोदी जैसे चमत्कार की ज़रूरत है. दरअसल, मोदी का कद इतना बड़ा है कि बाकी कोई नेता उसकी भरपाई कर नहीं सकता. और मोदी के लिए दिल्ली छोड़कर गुजरात संभालना संभव नहीं है. मोदी की स्थिति ऐसी नहीं है कि वो गुजरात के मॉडल को ध्वस्त होता देख सकें. गुजरात मॉडल की हार मोदी की नैतिक हार बन जाएगी. 2019 के चुनाव के लिए जितना ज़रूरी यूपी है, उससे भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी गुजरात है.

मोदी जिस नाव पर बैठे हैं, वो दिल्ली की है. और जिसे साथ में बांध रखा है, वो गुजरात की है. लेकिन बिना केवट यह दूसरी नाव कबतक थपेड़े सहन करेगी, यह कह पाना मुश्किल है.

First published: 7 August 2016, 8:32 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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