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नेशनल हेरल्ड: बांद्रा का प्लॉट बन सकता है आदर्श सोसाइटी घोटाला-2

अश्विन अघोर | Updated on: 17 December 2015, 19:05 IST
QUICK PILL
  • एक आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार बांद्रा स्थिति जो जमीन एजेएल को लाइब्रेरी और नेशनल हेरल्ड अखबार का छापाखाना स्थापित करने के लिए दी गयी थी, आज उस पर व्यावसायिक इमारत का निर्माण हो रहा है.
  • कांग्रेस का कहना है बीजेपी उसे निशाना बना रही है. वहीं बीजेपी का कहना है कि इस मामले में अनियमितता की शिकायत पांच साल पहले की गयी थी. इसका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं.

नेशनल हेरल्ड मामले में कांग्रेस हर दिन एक नई मुश्किल में उलझती जा रही है. महाराष्ट्र में एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के बांद्रा स्थिति भूमि के लैंडयूज़ को बदलने का कथित मामला सामने आया है. नेशनल हेरल्ड अखबार का मालिकाना हक़ एजेएल के पास ही है. ये लैंडयूज़ राज्य में कांग्रेस के शासन के दौरान बदला गया था.

नेशनल हेरल्ड से जुड़े मामले में 19 दिसंबर को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को दिल्ली की एक अदालत में पेश होना है.

एजेएल को दी गई जमीन का लैंडयूज़ बदलने का मामला अनिल गलगली की आरटीआई से सामने आया है.

कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई राज्य की भाजपा सरकार को किसानों की आत्महत्या, कर्जमाफी और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति पर घेरने की तैयारी में थी लेकिन नेशनल हेरल्ड मामले में सामने आ रहे अनियमितता के नए-नए मामलों के कारण पार्टी रक्षात्मक मुद्रा में नज़र आने लगी है.

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गलगली ने कैच को बताया, "पहले ये जमीन एजेएल को नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी बनाने के लिए दी गयी थी. हालांकि बृह्नमुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन (बीएमसी) के अग्निशमन विभाग से जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) में इमारत को कांग्रेस भवन बताया गया है. इसमें कहीं भी लाइब्रेरी का जिक्र नहीं है."

इस जमीन पर अब कांग्रेस भवन नाम की 11 मंजिला इमारत बनायी जा रही है. जिसका निर्माण कार्य जारी है.

वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के किनारे स्थित 3478.40 वर्ग मीटर जमीन 1983 में एजेएल को उसके अखबार नेशनल हेरल्ड का छापाखाना और नेहरू मेमोरियल रिसर्च सेंटर एंड लाइब्रेरी बनाने के लिए दी गयी थी.

एजेएल पर बकाया राशि पर लगने वाला 2.69 करोड़ रुपये का ब्याज तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने माफ कर दिया था

गलगली कहते हैं, "हैरत की बात है कि अग्निशमन विभाग ने अपने एनओसी में लाइब्रेरी का कोई जिक्र नहीं किया है. ये एक गंभीर चूक है इसकी पूरी जांच होनी चाहिए."

बाद में इस जमीन का लैंडयूज़ बदलकर व्यावसायिक इमारत कर दिया गया. आरोपों के अनुसार इस इमारत में दुकानें, दफ्तर और कारोबारी संस्थान होंगे.

आरोप-प्रत्यारोप


कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि उसे इस मामले में राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है.

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत कहते हैं, "सरकार इसे बेवजह मुद्दा बना रही है. राज्य की भाजपा सरकार अपनी विफलताओं से जनता का ध्यान बंटाना चाहती है."

सावंत ने लैंडयूज़ में किसी तरह की अनियमितता के आरोपों से इनकार किया.

सावंत कहते हैं, "इमारत अभी बन रही है. फिर सरकार ये कैसे कह सकती है कि इसमें लाइब्रेरी या छापाखाना नहीं होगा? उन्हें इमारत के पूरा होने तक इंतजार करना चाहिए था. ये केवल विपक्ष को बदनाम करने की कोशिश है."

गलगली सावंत से सहमत नहीं हैं.

गलगली कहते हैं, "एजेएल को ये जमीन तीस साल पहले दी गयी थी. इस दौरान इसपर कुछ नहीं हुआ. अचानक से ग्यारह मंजिला इमारत पर काम शुरू हो गया. जब मैंने बीएमसी से काग़ज़ात निकलवाये तो सच्चाई सामने आयी."

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गलगली की आरटीआई के जवाब में बीएमसी ने बताया कि इस ज़मीन पर 'ऊंची व्यावसायिक इमारत' बनाने की एनओसी दी गयी है. लेकिन जब उन्होंने अग्निशमन विभाग से इस एनओसी के बारे में जानकारी मांगी तो उन्हें जवाब मिला कि इस जमीन पर कांग्रेस भवन के निर्माण के लिए एनओसी दी गयी है.

गलगली कहते हैं, "दोनों विभागों के अलग अलग बयानों से जाहिर है कि इसमें अनियमितता का मामला हो सकता है."

नेशनल हेरल्ड की बांद्रा स्थित ज़मीन में अनियमितता का मामला करीब पांच साल पहले आदर्श सोसाइटी घोटाले के समय ही उठा था

कांग्रेस सरकार क़रीब पांच साल पहले भी आदर्श बिल्डिंग घोटाले से जुड़े आरोपों में घिरी थी. इस नए मामले ने भाजपा के हाथ में राज्य कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक और हथियार दे दिया है.

राज्य भाजपा के प्रवक्ता माधव भंडारी कहते हैं, "ये मामला भी आदर्श कोआपरेटिव हाउज़िंग सोसाइटी घोटाले जितना ही पुराना है. जब पांच साल पहले आदर्श घोटाला सामने आया तो बांद्रा की इस ज़मीन का मामला भी उठा. लैंडयूज़ में अनियमितता की शिकायत करीब पांच साल पहले ही दर्ज करायी गयी थी. इसके लिए हमें जिम्मेदार ठहराना महज बहाना है."

भंडारी के अनुसार अखबार और लाइब्रेरी के लिए दी गयी जमीन पर व्यावसायिक इमारत बनाना अपराध है.

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गलगली का आरोप है कि मामला केवल लैंडयूज़ बदलने भर का नहीं है. वो कहते हैं, "ये ज़मीन 1983 में एजेएल को 1.31 करोड़ रुपये में दी गयी थी. उसके साथ ये शर्त भी थी कि प्रस्तावित लाइब्रेरी और छापाखाना काम शुरू होने के तीन साल के अंदर बना लिया जाएगा और पूरी राशि एकमुश्त अदा की जाएगी. इन शर्तों का पालन नहीं किया गया और प्रशासन इसपर आंखें मूंदे रहा."

गलगली का आरोप है कि एजेएल पर बकाया राशि पर लगने वाला 2.69 करोड़ रुपये का ब्याज तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने माफ कर दिया था. कुछ खबरों के अनुसार मूलरूप से ये जमीन एससी और एसटी छात्रावास बनाने के लिए आरक्षित थी.

गलगली कहते हैं, "एजेएल ज़मीन पाने में कामयाब रहा. उसने इसे तीस साल के लिए लीज़ पर ले लिया. ये लीज़ 22 दिसंबर को खत्म हो रही है. सरकार को इस मामले को इसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए दोषियों को सज़ा दिलवानी चाहिए."

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First published: 17 December 2015, 19:05 IST
 
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