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नेशनल हेराल्ड मामला: कहां हुई गांधी परिवार से गलती

विवेक काटजू | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस ने फैसला लिया है कि वे इसके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील नहीं करेगी बल्कि संसद और जनता के बीच इस लड़ाई को ले जाएगी.
  • गांधी परिवार की रणनीति खुद को राजनीतिक दुर्भावना के तहत प्रताड़ित पक्ष के रूप में दिखाकर सहानुभूति बटोरने की है. भाजपा को इस मामले में चतुराई बरतनी होगी.

अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि कांग्रेस पार्टी ने नेशनल हेरल्ड मामले को राजनीतिक लड़ाई में बदलने का फैसला ले लिया है. और जरूरत पड़ी तो इसे सड़कों पर भी ले जाएंगे. पार्टी राजनीतिक उत्पीड़न का चोला ओढ़कर वही सब दोहराने की कोशिश कर रही हैं जिसे 1978 में इंदिरा गांधी ने सफलतापूर्वक किया था.

यह तय हो चुका है कि कांग्रेस हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करेगी. उनकी सोच यह है कि देश इस कानूनी मामले के तकनीकी पहलू को जानने की बजाय मोदी सरकार द्वारा गांधी परिवार और कांग्रेस नेताओं पर की जा रही कथित ज्यादती पर ध्यान लगाए. पार्टी की स्पष्ट सोच यही दिखती है कि मामले का हश्र चाहे जो भी हो लेकिन इससे गांधी परिवार को सार्वजनिक सहानुभूति के साथ राजनीतिक लाभ मिलेगा.

इस मामले के अंतर्गत उठाए गए मुद्दों और देश की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है. 

जब 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने यह मामला उठाया था तब सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सामने यह आया था कि राजनीतिक दलों की वैध गतिविधियां क्या हैं. कांग्रेस ने तब दलील दी थी कि उसने एसोसिएटेड जर्नल्स को 90 करोड़ रुपये का ऋण दिया था. नेशनल हेरल्ड के स्वामित्व वाली यह कंपनी गांधी-नेहरू की सोच को बढ़ावा देने का जरिया थी. यह भी दावा किया गया कि पार्टी इन नेताओं के विचारों पर आधारित है और इसलिए यह पूरी तरह जायज है कि उसे एक राजनीतिक पार्टी के रूप में ऋण दे दिया जाए. 

जब 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने यह मामला उठाया था तो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सामने यह आया था कि दलों की वैध राजनीतिक गतिविधियां क्या हैं

अब कांग्रेस पार्टी गांधी और नेहरू से काफी आगे निकल चुकी है. हालांकि यह इन दोनों को नियमित रूप से याद करती रहती है. नेहरू के राष्ट्र निर्माण की अवधारणा में अर्थव्यवस्था राज्य के अधीन थी. 1991 में मनमोहन सिंह ने जब सुधार चालू किए तब जाकर देश की अर्थव्यवस्था के तमाम पहलुओं से राज्य की भूमिका को घटाया.

पढ़े: नेशनल हेरल्ड की गांठ कस रही है गांधी परिवार के इर्द गिर्द

इसके अलावा, एक समतावादी समाज का निर्माण करने की गरज से समाजवाद को छोड़ दिया गया. कांग्रेस के किसी दस्तावेज में यह शब्द नहीं दिखाई देता. विडंबना यह है कि हाल ही में राज्यसभा में असहिष्णुता के मुद्दे पर बहस के दौरान यह शब्द फिर से देखने को मिला.

स्वामी ने इस बात को खारिज कर दिया कि कांग्रेस ने यह सब राजनीतिक उद्देश्य से किया है. उनकी दलील थी कि कांग्रेस पार्टी की इच्छा एसोसिएटेड जर्नल्स के स्वामित्व वाली अचल संपत्तियों पर कब्जा करने की थी, मुख्यतः गांधी परिवार की.

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एएफपी

अगर यह मामला ऊपरी अदालत में जाता है तो कांग्रेस पार्टी की वैध राजनीतिक गतिविधयों का दायरा निश्चित रूप से अदालत की जांच का विषय बनेगा. सभी राजनीतिक दलों पर इसका दीर्घकालिक असर पड़ेगा. अभी तक सभी राजनीतिक दल इस बात का भरोसा दिलाते आए हैं कि उनकी सभी गतिविधियां राजनीतिक परिभाषा के दायरे में आती हैं. इस बात की अदालत में जांच भी कराई जा सकती है. हमारे राजनीतिक वर्ग को यह बात कतई पसंद नहीं आएगी. इससे मुसीबतों की बाढ़ आ सकती है. 

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

यह भी अहम मुद्दा है कि कांग्रेस ने इस पूरे मामले को किस तरह से संभाला है. सच्चाई यह है कि एक समय में भारतीय मीडिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेशनल हेरल्ड ने अपना अस्तित्व खो दिया है. साथ ही पार्टी को जनता से जोड़ने की प्रासंगिकता भी खत्म हो गई है. लिहाजा पार्टी के लिए सबसे उपयुक्त यही था कि इसे बंद कर दे.

पार्टी ने इस बात का ध्यान रखा कि इससे नेशनल हेरल्ड के कर्मचारी प्रभावित न हों. हालांकि यह सबकुछ यंग इंडियन (2010 में बनी गैरलाभकारी कंपनी)को इसमें शामिल किए बिना भी किया जा सकता था. तो पार्टी ने ऐसा कदम उठाया क्यों जिस पर प्रथम दृष्टया सवाल उठे? पार्टी को अदालत में इस बात का जवाब देना होगा और इसी बात पर अब उन्हें अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए. संसद और सड़कों पर हंगामा करने ने यह सवाल खत्म नहीं होगा. 

साथ ही उसे इस सवाल का राजनीतिक जवाब भी देना होगा. एसोसिएटेड जर्नल के कर्ज का भुगतान करने के लिए उसकी अचल या अन्य संपत्तियों को बेचा जा सकता था. कांग्रेस ने ऐसा क्यों नहीं किया?

यह महत्वपूर्ण है कि गैरलाभकारी होने के बावजूद यंग इंडियन एक कंपनी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसका उद्देश्य "एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज के आदर्श के लिए भारतीय युवाओं के मन में प्रतिबद्धता पैदा करना और इसको पाने के लिए अपने लाभ या आय को प्रदान करना" जैसी गतिविधि संचालित करने का है. 

यह धारणा मजबूत हो रही है कि कांग्रेस की पूरी कवायद अपना उद्देश्य पूरा करनेे की नहीं बल्कि एजेएल की संपत्ति हड़पने की थी

अब जब कांग्रेस नेतृत्व ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का निर्णय ले लिया है तब यह जरूरी है कि वह कंपनी की शुरुआत से अब तक हुई कमाई और अपने मूल उद्देश्यों को हासिल करने में खर्च की गई रकम का ब्यौरा सार्वजनिक करे. स्वामी के हमले के खिलाफ इस तरह की पारदर्शिता इस मामले को जनता की अदालत में मजबूत करेगी.

लेकिन अगर पार्टी ने ऐसा नहीं किया तो वह इस धारणा को मजबूत करेगी कि कांग्रेस की यह पूरी कवायद अपने पेशेवर उद्देश्य को पूरा करनेे की नहीं बल्कि एसोसिएटेड जर्नल्स की संपत्ति को हड़पने की थी. 

यंग इंडियन के शानदार लक्ष्य और इसके प्रमुख शेयर धारकों के नाम निश्चित रूप से व्यापक समर्थन आकर्षित करेंगे. इसे अपनी आय या संपत्ति के लिए एसोसिएडेट जर्नल्स पर निर्भर होने की जरूरत नहीं है. इस संदेह को कांग्रेस पार्टी द्वारा साफ कर देना चाहिए. 

एक और निष्कर्ष है. ऐसा प्रतीत होता है कि इस पूरी कवायद के जरिए एसोसिएटेड जर्नल्स की अचल संपत्ति को गांधी परिवार द्वारा नियंत्रित उनकी निजी कंपनी को हस्तांतरित कर दिया गया. इस दौरान गांधी परिवार की कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी और एक कंपनी के निजी मालिक के बीच की स्थितियों में जो अंतर था उसकी अनदेखी की गई.

यह एक और उदाहरण है कि भारतीय राजनीतिक पार्टियां किस तरह से कुछ परिवारों की निजी जागीर बन गए हैं. स्वाभाविक है कि अगर गांधी परिवार की मंशा कांग्रेस को एक आधुनिक लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में स्थापित करने की होती तो वह ऐसी किसी सौदेबाजी में नहीं पड़ती जिसमें उनका निजी फायदा सबसे ज्यादा हो और बाकी का फायदा उनके कुछ खास नजदीकी लोगों को हो.

एक सच्चाई है, और इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, कि आज की तारीख में कांग्रेस गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को खुद का नेतृत्व करते हुए नहीं देख सकती.

कांग्रेस को लेकर भाजपा का रवैया बहुत चतुराई भरा होना चाहिए. उसे 1978 और 1979 में जनता पार्टी द्वारा दिखाई गई मूर्खता से बचना होगा. उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि लोगों का सारा ध्यान केवल गांधी परिवार के खिलाफ चल रहे कानूनी मामले पर बना रहे औऱ कहीं भटकने न पाए. क्या भाजपा उतनी समझदारी और सहजता से यह काम कर पाएगी?

First published: 11 December 2015, 6:01 IST
 
विवेक काटजू @catchhindi

पूर्व राजनयिक और स्वतंत्र टिप्पणीकार

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