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एनडीटीवी पर पाबंदी: इस तरह के अधिकार सरकार के हाथ होने चाहिए या न्यायिक तंत्र के?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 7 November 2016, 7:44 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार की तरफ से लगाई गई एक दिन की पाबंदी के ख़िलाफ़ एनडीटीवी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दिया है. 
  • मगर एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध लगाना नरेंद्र मोदी सरकार की मानसिकता उजागर करता है और साथ ही आईएंडबी मंत्रालय के उस कानून पर भी पुनर्विचार की मांग करता है जिसके तहत प्रतिबंध आयद हुए हैं.
  • यही मौका है जब मीडिया, खास तौर पर टीवी न्यूज कम्युनिटी इस तरह के भयावह कानून में संशोधन की पुरजोर मांग उठाए.

एनडीटीवी सरकार की तरफ़ से लगाई गई एक दिन की पाबंदी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा चुका है. केबल टेलिविजन नेटवर्क (नियमन) अधिनियम 1995 के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी चैनल के प्रसारण पर रोक लगा सकती है.

मगर एनडीटीवी पर जिस कानून के तहत प्रतिबंध लगाया है, वह 2015 में मूल कानून में किए गए संशोधन के आधार पर किया गया है. यानी जिस प्रावधान के तहत प्रतिबंध लगाया जा सकता है, वह 2015 से ही अस्तित्व में है. 

नए संशोधन के तहत एक नई शर्त यह लगाई गई है कि किसी चैनल पर किसी कार्यक्रम में सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का सीधा प्रसारण नहीं किया जा सकता. एनडीटीवी की दलील है कि बाकी कई दूसरे चैनलों और अखबारों ने भी ऐसी खबरें दी हैं, जिनके लिए सिर्फ एनडीटीवी को दोषी ठहराया जा रहा है.

फिर केवल एनडीटीवी को क्यों निशाना बनाया जा रहा है? असल कारण तो सिर्फ सरकार जानती है, लेकिन लगता है यह प्रतिबंध एक तरह का संदेश देने की कोशिश की गई है, जैसे पानी की थाह पता करने के लिए गुब्बारा तैराया जाता है.

बेमतलब का कायदा

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार को ऐसी बेलाग छूट क्यों है कि वह 'जब चाहे आसानी से किसी भी चैनल के प्रसारण पर रोक लगा दे?' क्यों नहीं सरकार ऐसे मामलों में अदालत का सहारा ले लेती? अगर यह किसी चैनल को किसी तरह से दोषी मानती है तो उसके खिलाफ संबंधित कानून के तहत अदालत में केस दर्ज करे? सरकार क्यों खुद ही जज, जूरी बन रही है?

एनडीटीवी के इस मामले से केबल टीवी अधिनियम के इस प्रावधान के खतरों का पता चलता है. दरअसल यह प्रावधान सरकार को पूरा अधिकार देता है कि वह किसी भी मीडिया आउटलेट के साथ सख्ती कर सके जिससे उसे किसी तरह की आपत्ति है. यह साफ़ नहीं है कि संसद में जब इस अधिनियम पर चर्चा हो रही थी, तब इस प्रावधान का विरोध किया गया या नहीं, लेकिन अब तक किसी का ध्यान इसकी समीक्षा और जांच करने पर भी नहीं गया क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कभी इसे थोपा नहीं गया. 

इससे पहले भी ऐसे कुछ मामले हुए हैं, जिनमें पिछली सरकारों ने कई अन्य चैनलों के प्रसारण पर रोक लगाई है. ज्यादातर मामलों में शिष्टाचार, अश्लीलता और नैतिकता को आधार बनाया गया, जो अपने आप में बहस का विषय है लेकिन एनडीटीवी मामला तो पूरी तरह से ही अलग नजर आता है. 

राष्ट्रीय साजिश

बीजेपी और मोदी लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में राजनीति करते आ रहे हैं. गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस ने कई संदिग्ध मुठभेड़ों को अंजाम दिया. और जितने भी सवाल उठे, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा का जामा पहना दिया गया.

2008 में 26-11 के मुंबई हमले के बाद जब मोदी ने वहां का दौरा किया तो उन्होंने तत्कालीन यूपीए सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि सरकार देश को आतंक से सुरक्षित नहीं बचा सकी.

मोदी ने 2014 के अपने चुनाव प्रचार अभियान का मुख्य आधार भी राष्ट्रीय सुरक्षा ही रखा था और यूपीए सरकार पर लगातार पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाया था.

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद क्या हुआ? यह सरकार भी पूरी तरह से तो पाकिस्तान का प्रतिकार नहीं कर पाई, नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राइक की और बीजेपी बार-बार इसी का ढिंढोरा पीट कर अपनी सरकार को मजबूत बताने में जुटी हुई है. उसके बाद से ही नियंत्रण रेखा पर हमले बढ़े हैं.

मोदी और उनके मंत्री बार-बार 'पहले राष्ट्र' के थोथे सिद्धान्त का ढोल पीटते रहते हैं और उन्होंने कई मुद्दों पर इसका इस्तेमाल विपक्ष की आवाज दबाने के लिए भी किया है.

हाल ही में रामनाथ गोयनका अवार्ड में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने 'पहले राष्ट्र' की बात कही थी. बीजेपी को इस जुमले से इतना अधिक लगाव हो गया है कि हर जगह इसे एक 'बहाने' की तरह इस्तेमाल करने से नहीं चूकती, भले ही फिर वह मीडिया की आजादी पर प्रतिबंध लगाने का मामला हो. एनडीटीवी पर प्रतिबंध लगा कर सरकार यही दिखाना चाहती है कि यह अपने खिलाफ मीडिया कवरेज को बर्दाश्त नहीं करेगी.

न्यायिक जांच?

सरकार के इस कदम के खिलाफ एनडीटीवी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस पर सुप्रीम कोर्ट किस तरह से प्रतिक्रिया देती है, यह बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कैच से कहा, 'सरकार द्वारा एनडीटीवी के खिलाफ पेश किए गए सबूतों को केंद्र में रख कर बहस होगी.'

उन्होंने बताया अगर सबूत के रूप में ऐसा वीडियो पेश किया गया है, जिससे यह पता चलता हो कि एनडीटीवी ने पठानकोट के आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के किसी हिस्से को लाइव दिखाया है तो प्रतिबंध की वैधता को चुनौती देना मुश्किल होगा. 

उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट 26-11 के हमलों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्यवाही के मीडिया द्वारा सीधा प्रसारण दिखाए जाने पर पहले ही लताड़ चुका है. साथ ही, उन्होंने कहा कि अगर यह पाया गया कि एनडीटीवी ने महज वे तथ्य दिखाए हैं जो कि पहले ही सार्वजनिक थे, तो हो सकता है कि प्रतिबंध को अनावश्यक करार दिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके और प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष रह चुके मार्कण्डेय काटजू का मानना है कि यह प्रतिबंध अवैध है क्योंकि यह केवल सुरक्षा बलों द्वारा आतंक रोधी कार्यवाही के 'सीधे प्रसारण' पर लागू होता है. यानी कि 'सुरक्षा बलों को आतंकियों को ढूंढ़ते, पकड़ते और उनके साथ लड़ाई करते दिखाना.'

उन्होंने कहा 'एनडीटीवी ने आतंक रोधी कार्रवाई के बारे में केवल रिपोर्टिंग की है न कि वास्तविक घटना स्थल के दृश्य दिखाए हैं, जिनमें सुरक्षा बल आतंकियों का पीछा कर रहे हों या उनसे लड़ाई कर रहे हों.'

सुधार की गुंजाइश

एनडीटीवी के इस मसले को पूरा मीडिया समुदाय उठाएगा और केवल मौजूदा प्रतिबंध को हटाने की मांग तक ही सीमित नहीं रहेगा. मीडिया की आजादी और बोलने व अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के हित में या तो सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई जाएगी कि वह केबल टीवी अधिनियम के प्रावधान को हटाए, जो सरकार को चैनलों पर प्रतिबंध लगाने की छूट देता है या फिर संसद में याचिका लगा कर इस अधिनियम में संशोधन कर यह प्रावधान हटाने की मांग की जाएगी. इस प्रावधान को लागू होने देना बड़ी भूल थी और अब समय आ गया है कि इसे हटा दिया जाए.

First published: 7 November 2016, 7:44 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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