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NDTV छापे: प्रणय रॉय से ज़्यादा ICICI बैंक क्यों मुश्किल में है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 7 June 2017, 12:40 IST

देश की शीर्षस्थ जांच एजेंसी सीबीआई ने एनडीटीवी न्यूज चैनल के मालिक प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय के घरों पर 5 जून को छापे मारे. कुछ का कहना है कि ऐसा करके सरकार ने उनसे अपना बदला लिया है, क्योंकि चैनल ने हमेशा उनकी नीतियों की आलोचना की है. कुछ लोगों को इस मामले में दम नजर आ रहा है. उन पर बेईमानी से पैसा निकालकर काले धन को वैध बनाने का आरोप है. उन पर यह आरोप भी है कि एनडीटीवी के प्रमोटर्स ने आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ रुपये नहीं चुकाए.

सच क्या है?

सीबीआई ने छापे से पहले रॉय के खिलाफ ‘आपराधिक साजिश, धोखा-धड़ी और आपराधिक दुराचार’ का आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की गई. एफआईआर संजय दत्त की शिकायत पर दर्ज की गई, जो कभी टीवी चैनल में सलाहकार थे और जिनका कंपनी में थोड़ा हिस्सा भी था.

एफआईआर को पूरा पढ़ने से पता चलता है कि दत्त के आरोप एनडीटीवी के प्रमोटर्स से ज्यादा आईसीआईसीआई बैंक को कठघरे में खड़ा करते हैं. दरअसल रॉय पर आरोप यह है कि उन्होंने बैंक का कर्ज पूरा नहीं चुकाया. दत्त के सभी आरोपों से लग यह रहा है असली अपराधी बैंक का प्रबंधन है.

एफआईआर

आरोप एक: एफआईआर में बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 19 (2) का हवाला है, जिसके तहत आईसीआईसीआई बैंक ने एनडीटीवी के प्रमोटर्स के शेयर्स पर 375 करोड़ रुपये का कर्ज दिया. कुल 39614759 इक्विटी शेयर्स थे. बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के अनुसार किसी भी बैंकिंग कंपनी (आईसीआईसीआई) को शेयर पर कर्ज देने की अनुमति नहीं है. एक्ट के अनुसार कोई भी बैंकिंग कंपनी 30 प्रतिशत चुकता पूंजी से ज्यादा किसी कंपनी के शेयर नहीं रख सकती.

अगर आरोप सही है, तो रॉय ने एनडीटीवी के प्रमोटर के तौर पर शेयर्स गिरवी रखने की सूचना सेबी को नहीं दी. पर आईसीआईसीआई बैंक ने क्या किया? क्या उसने बैंकिंग एक्ट को ताक पर रखकर उन्हें कर्ज नहीं दे दिया?

आरोप दो: दूसरा आरोप यह है कि आईसीआईसीआई ने आरबीआई एक्ट की धारा 19 (2) का उल्लंघन करके कंपनी को कर्ज दिया, ताकि वह कंपनी में हिस्सा पा सके या बनाए रख सके. एफआईआर के अनुसार रॉय ने आईसीआईसीआई के कर्ज का इस्तेमाल इंडिया बुल्स लिमिटेड से लिया पैसा चुकाने के लिए किया.

आरोप तीन: एनडीटीवी के प्रमोटर्स के खिलाफ तीसरा आरोप यह है कि उन्होंने 6 अगस्त 2009 में आईसीआईसीआई बैंक के साथ अनुबंध किया था कि वे कर्ज का 99 प्रतिशत यानी 350 करोड़ रुपये चुका देंगे. शिकायतकर्ता का आरोप है कि बैंक पूरी राशि की मांग कर सकता था, जिसके अनुसार 19 प्रतिशत ब्याज के हिसाब से 48 करोड़ की अतिरिक्त राशि हो सकती थी. कर्ज के समझौते पर हस्ताक्षर करते समय ही ब्याज तय कर दिया था. यह आरोप का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो फिर आईसीआईसीआई बैंक के प्रबंधन पर सवाल उठाता है. उसने एनडीटीवी के प्रमोटर्स को दिए कर्ज पर बहुत कम ब्याज लगाया है.

दोधारी तलवार

अगर जांच एजेंसी इस आरोप पर कार्रवाई कर रही है कि आईसीआईसीआई प्रबंधन को 48 करोड़ रुपये के घाटे पर कर्ज के दोबारा भुगतान पर समझौता नहीं करना चाहिए था, तो यही तर्क पूरे बैंकिंग सेक्टर को जल्द ही याद दिलाएगा कि 10 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा के कर्ज पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने दिए हैं, जिसे कॉरपोरेट सेक्टर ने नहीं चुकाया.

देर-सबेर, बैंकों को कंपनी के साथ वन-टाइम सेटलमेंट करना पड़ेगा. इस आधार पर आईसीआईसीआई के खिलाफ फैसले से यही सामने आएगा कि पब्लिक सेक्टर बैंकों के प्रमुख अपने डूबे कर्जों पर कम ब्याज लेने में संकोच करेंगे. इससे भारतीय बैंकिंग सेक्टर में नॉन-परफॉर्मिंग असेट्स की समस्या बढ़ेगी, जो कुल कर्ज का करीब 9 प्रतिशत है.

यह सबसे छिपा नहीं है कि मोदी सरकार के एनडीटीवी के साथ संबंध अच्छे नहीं हैं, क्योंकि चैनल सरकारी नीतियों की हमेशा आलोचना करता रहा है. पर दोधारी तलवार से मीडिया हाउस से बदला लेना सरकार की मूर्खता होगी, क्योंकि इससे केवल मरने वाला ही नहीं, मारने वाला भी आहत होता है.

First published: 7 June 2017, 12:40 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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