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इस तरह से रुक सकता है गन्‍ने की फसल पर मंडराने वाले कीटों का आतंक

उमाशंकर मिश्र | Updated on: 3 June 2017, 12:10 IST

गन्‍ने की फसल में व्‍हाइट ग्रब (सफेद गिडार) की परेशानी से एक दशक से भी अधिक समय से जूझ रहे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड के किसानों को अब इससे निजात मिल सकती है. भारतीय वैज्ञानिकों ने इससे निपटने के लिए एक अनूठा रास्‍ता खोज निकाला है.

यह सब जानते हैं कि गन्‍ना एक प्रमुख नकदी फसल है लेकिन सफेद गिडार के संक्रमण से इसकी खेती चौपट हो रही है. नई दिल्‍ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्‍थान (आईएआरआई) के वैज्ञानिकों ने सफेद गिडार के जैव नियंत्रण के लिए अब एक नई तकनीक विकसित की है, जिसके सकारात्‍मक नतीजे मिले हैं. वैज्ञानिकों ने एंटोमोपैथोजेनिक नेमोटेड (ईपीएन) नामक कीट की पहचान की है, जो सफेद गिडार के नियंत्रण के लिए एक प्रभावी अस्‍त्र बन सकता है.

सफेद गिडार गन्‍ने के पौधे पर आश्रित परजीवी है और इसका परजीवी ईपीएन है. ईपीएन की दो प्रमुख प्रजातियों हेटेरोरैब्‍डाइटिस और स्‍टीनरनेमा की आंतों में खास तरह के सहजीवी बैक्टिरिया होते हैं, जो सफेद गिडार समेत कई अन्‍य कीटों को नष्‍ट करने की क्षमता रखते हैं. मुंह, गुदा या फिर पतली चमड़ी वाले अंगों के जरिये ईपीएन सफेद गिडार के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उनके शरीर में मौजूद जहरीले बैक्टिरिया गिडार को मार देते हैं.

गिडार को भोजन बनाकर ईपीएन कीट अपनी आबादी में निरंतर बढ़ोतरी करते रहते हैं. भारतीय शोधकर्ताओं ने सफेद गिडार को नष्‍ट करने के लिए हेटेरोरैब्‍डाइटिस ईपीएन कीट की देसी प्रजाति एच. इंडिका का उपयोग किया है.

ईपीएन पर आधारित जैव नियंत्रण की इस तकनीक के खेती में टिकाऊ उपयोग के लिए ईपीएन कीटों का व्‍यापक स्‍तर पर उत्‍पादन जरूरी है. इसके लिए वैज्ञानिकों ने गैलेरिया मेलोनेला नामक कीट का उपयोग किया है, जो ईपीएन कीटों के भोजन का एक अन्‍य स्रोत है. पहले गैलेरिया मेलोनेला को ईपीएन कल्‍चर से संक्रमित किया जाता है और फिर मृत गैलेरिया कीटों का उपयोग गन्‍ने की फसल में किया जाता है. इस तरह गिडार के दुश्‍मन बैक्टिरिया अपने लक्ष्‍य तक पहुंचकर उन्‍हें मार देते हैं.

 

शोधकर्ताओं की टीम में शामिल डॉ. शरद मोहन ने बताया कि बड़ी संख्‍या में किसानों को इस तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जो सफलतापूर्वक ईपीएन-संक्रमित गैलेरिया का उत्‍पादन कर रहे हैं. शरद मोहन के अनुसार अभी इस तकनीक का व्‍यावसायीकरण नहीं हुआ है और युवा किसान इन कीटों के उत्‍पादन एवं उपयोग की विधि सीख लें तो ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

वर्ष 2008 से 2014 के बीच उत्‍तर प्रदेश के गाजियाबाद, मेरठ, अमरोहा, सहारनपुर, गजरौला, बुलंदशहर और हापुड़ समेत सात जिलों में किए गए फील्‍ड ट्रायल के बाद आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने पाया है कि जैव नियंत्रण की यह तकनीक गन्‍ने की फसल को कीटों से बचाने में कारगर साबित हो सकती है. शोधकर्ताओं के मुताबिक ईपीएन-सं‍क्रमित गैलेरिया मेलोनेला कीटों के जरिये एक एकड़ खेत के उपचार की लागत करीब 1500 रुपये आती है. सफेद गिडार पौधों की जड़ों को खाती है, जिसके कारण पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पौधे का विकास नहीं हो पाता है.

संक्रमण अधिक होने पर पौधे मर जाते हैं. इस समस्‍या से निपटने के लिए आमतौर पर ऑर्गेनोफास्‍फेट और कार्बामेट जैसे सिंथेटिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है. लेकिन, इन कीटनाकशकों का उपयोग पर्यावरण हितैषी नहीं माना जाता और एक समय के बाद कीटों में इनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित होने लगती है. जमीन के भीतर छिपे कीटों को मारने के लिए भी कीटनाशकों का उपयोग कारगर नहीं है. जबकि, सफेद गिडार के प्रबंधन के लिए ईपीएन का उपयोग पर्यावरण हितैषी होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी अनुकूल पाया गया है.

ईपीएन विभिन्‍न प्रकार के कीटों के परजीवी होते हैं, जो दुनिया भर के कृषि एवं प्राकृतिक वातावरण में पाए जाते हैं. लार्वा के स्‍तर पर सफेद गिडार के नियंत्रण के लिए इन्‍हें दुनिया भर में प्रभावी जैव नियंत्रक के तौर पर स्‍वीकार किया गया है. खुले वातावरण में ईपीएन को गैलेरिया मेलोनेला (ग्रेटर वैक्‍स मोथ) कीट के लार्वा पर पाला जा सकता है. जबकि गैलेरिया को घर अथवा लैब में प्‍लास्टिक के बॉक्‍स या फिर लकड़ी की ट्रे में गेहूं, मक्‍का, गेहूं अथवा धान की भूसी, वैक्‍स, शहद या फिर ग्लिसरॉल पर पाल सकते हैं.

गैलेरिया और ईपीएन के निशुल्‍क बीज प्राप्‍त करने के लिए आईएआरआई के सूत्रकृमि विज्ञान विभाग से संपर्क किया जा सकता है. आईएआरआई से इस तकनीक का निशुल्‍क प्रशिक्षण भी लिया जा सकता है. यह अध्‍ययन हाल में करंट साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है. अध्‍ययनकर्ताओं की टीम में अकांक्षा उपाध्‍याय, आरोही श्रीवास्तव और के. श्रीदेवी शामिल थे.

(साभारः इंडिया साइंस वायर)

First published: 2 June 2017, 19:57 IST
 
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