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पीरियड्स के टैबू को चुनौती देती महिलाएं

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 November 2015, 9:09 IST
QUICK PILL

क्या आपको लगता है कि यह तस्वीरें ठीक नहीं है? दरअसल इसमें एक समस्या छिपी हुई है. लंबे समय से पीरियड के दिनों में महिलाओं को न केवल धार्मिक जगहों बल्कि घर के भीतर किचन तक में घुसने की मनाही रही है. पीरियड ऐसा मामला है जिसके बारे में कभी परिवार के लोगों के बीच बातचीत नहीं होती और लड़कियों को तो इस मसले पर कभी भी सार्वजनिक तौर से बातचीत नहीं करने की नसीहत दी जाती है.

हालांकि देर से ही सही पीरियड के बारे में बातचीत होने लगी है और यह निजी दायरे से निकलकर सार्वजनिक विमर्श के दायरे में आने लगा है. इस साल कुछ ऐसे मामले सामने आए जिसका जिक्र करना जरूरी है.

सबरीमाला विवाद

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धर्मयात्रा शुरू होने के बाद केरल के मशहूर सबरीमाला मंदिर में दुनिया भर से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. हालांकि यहां पर 15-50 साल के उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है. इस महीने की शुरुआत में सबरीमाला के अधिकारी प्रयार गोपालकृष्णन ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि मंदिर में प्रवेश करने से पहले महिलाओं की स्कैनिंग की जाएगी ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि उन्हें पीरियड तो नहीं हो रहा. उन्होंने कहा कि इस मशीन को बनाया जा चुका है और यह स्कैनर की तरह काम करेगा, 'जिसकी मदद से हथियारों की तलाशी ली जाती है.'

गोपालकृष्णन के बयान पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और फिर #HappyToBleed कैंपेन चल पड़ा. इस पेज पर दिए गए मैसेज में कहा गया, 'यह बयान महिला विरोधी मानसिकता को थोपने की कोशिश है और महिलाओं से जुड़ी झूठी अवधारणाओं को बढ़ावा देती है. 'इस कैंपेन की शुरुआत निकिता आजाद के खुले पत्र से हुई जिसे उन्होंने गोपालकृष्णन के बयान के विरोध में लिखा था. उनके इस खुले पत्र को जोरदार समर्थन मिला और जल्द ही इसने कैंपेन का रूप ले लिया.

निकिता आजाद ने कैच को बताया, 'मुझे इस तरह के समर्थन की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी. सोशल मीडिया एक तरह की सोच रखने वाले लोगों की तरफ से प्रतिरोध जताने का मजबूत मंच बनता जा रहा है. इसने वाकई में मुझे देश और विदेश में लोगों से जुड़ने का मौका दिया. 'निकिता के मुताबिक #HappyToBleed कैंपेन एक हफ्ते से चल रहा है. आगे की कार्रवाई के बारे में अगले साल जनवरी में फैसला किया जाएगा.

नॉर्मल बॉडी फंक्शन

पीरियड्स को लेकर जारी टैबू के खिलाफ लोग समय-समय पर आवाज उठाते रहे हैं. इस साल अगस्त महीने में लंदन मैराथन की एक रनर ने सुर्खियां बटोरी. किरण गांधी ने इस मैराथन को पीरियड के दिनों में पूरा किया. पीपल मैग्जीन से बातचीत में उन्होंने कहा, 'मैं अपने पैरों पर रिसते खून की बूंदों के साथ दौड़ी. उन बहनों के लिए जिनके पास पैड नहीं होता और उनके लिए भी जो दर्द सहते हुए इसे इस तरह से छिपाती है मानो यह कुछ होता ही नहीं.'

सैनेटरी पैड्स का मैसेज

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इस साल मार्च में नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के  छात्रों के एक समूह ने सैनेटरी पैड्स पर नारीवादी अधिकारों से जुड़े मैसेज लिखकर उसे कैंपस में हर जगह चिपका दिया. कैंपेन का मकसद बलात्कार और लैंगिक हिंसा के खिलाफ अपनी बात को रखने से शुरू हुआ था जो जल्द ही कैंपेस से बाहर निकलकर देश भर में फैल गया.

इंस्टाग्राम की गलती

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इसी साल मार्च में इंस्टाग्राम ने ऊपर लगी तस्वीर यह कहते हुए हटा दिया था कि इससे 'कम्युनिटी के गाइडलाइंस का उल्लंघन होता है.' लेकिन इसे लगाने वाली रूपी कौर ने इसे हटाने की बजाए लड़ाई छेड़ते हुए इंस्टाग्राम को कठघरे में खड़ा कर दिया. इंस्टाग्राम की सोशल मीडिया पर जबरदस्त आलोचना हुई. विरोध बढ़ता देख इंस्टाग्राम ने इस फोटो को फिर से रूपी के अकाउंट में अपलोड कर दिया. रूपी कौर ने कहा कि वह इस फोटो की मदद से यह बताने की कोशिश कर रही थी पीरियड के दिनों में होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. विरोध के कुछ मैसेज यूं थे-

'पीरियड में निकलने वाला खून अशुद्ध नहीं है बल्कि तुम्हारी मानसिकता गलत है.'

'पीरियड नैचुरल है, न कि बलात्कार.'

'दिल्ली की गलियां महिलाओं के लिए भी हैं.'

'बलात्कारी लोगों का बलात्कार करते हैं न कि कपड़ों का.'

ये सभी महिलाएं फिलहाल जर्मन महिला इलोन कैस्ट्रेटा के संपर्क में हैं जिन्होंने #padsagainstsexism के हैशटैग के साथ अंतरराष्ट्रीय कैंपेन की शुरुआत की है.

First published: 26 November 2015, 9:09 IST
 
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