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सिंधु घाटी की सभ्यता के 8 हजार साल पुराने होने के क्या मायने है?

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 6 June 2016, 23:54 IST
(फाइल फोटो)

सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) भारतीय इतिहास का सबसे रहस्यमयी हिस्सा है. अभी तक सिंधु घाटी की लिपि को सफलतापूर्वक नहीं पढ़ा जा सका है, न ही निर्विवाद रूप से ये पता चल सका है कि आखिर इतनी बड़ी सभ्यता समाप्त कैसे हुई?

भारत और पाकिस्तान में फैली इस सभ्यता के भौगोलिक क्षेत्र का लगातार विस्तार होता रहा है. पहली बार इसके इतिहास का भी अभूतपूर्व विस्तार होता दिख रहा है. 

अब तक इतिहासकारों का मानना था कि सिंधु घाटी सभ्यता ईसा से साढ़े तीन हजार साल पुरानी थी. लेकिन भारतीय शोधकर्ताओं के ताजा अध्ययन के अनुसार ये सभ्यता ईसा से छह हजार साल पुरानी (अब से करीब आठ हजार साल पुरानी) हो सकती है.

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आईआईटी खड़गपुर, इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्कियाल्जी, डेक्कन कॉलेज पुणे, फीजिकल रिसर्च लैबोरैटरी और ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के संयुक्त प्रयास से ये शोध हुआ है.

अगर भारतीय शोधकर्ताओं का दावा सही निकलता है तो इससे दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं भारत, मिस्र और मेसोपोटामिया इत्यादि को लेकर अब तक का विमर्श बदल सकता है.

नई तकनीक से मिले नए नतीजे

एएसआई

शोधकर्ताओं ने ऑप्टिकल स्टिमुलेटेड लुमनसेंस (ओएसए) नामक नई तकनीकी से हड़प्पा में पाए गए मिट्टी के बर्तनों की आयु ईसा से चार हजार साल पूर्व निर्धारित की है. वहीं हड़प्पा-पूर्व हकरा काल के बर्तनों की आयु करीब आठ हजार साल पाई गई है. इस शोध के नतीजे नेचर साइंटिफि जर्नल में 25 मई को प्रकाशित हुए.

हरियाणा के भीरराना में हुई खुदाई से हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्तरों का पता चला है. यहां हड़प्पा काल के पहले के हकरा सभ्यता से लेकर पूर्व विकसित हड़प्पा सभ्यता तक के पुरातात्विक सुबूत मिले हैं. माना जाता है कि भीरराना मिथकीय नदी सरस्वती के किनारे बसी हुई बसावटों में एक है.

बीते समय का संग-ए-मील हैं ये कोस मीनारें

प्रोफेसर अनिंद्य सरकार आईआईटी खडगपुर के जियोलॉजी और जियोफीजिक्स विभाग में पढ़ाते हैं. प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "कई पुरातत्वविद् पिछले कुछ समय से कह रहे थे कि भीरराना और सिंधु घाटी सभ्यता के कुछ दूसरे पुरातात्विक स्थल 5700 साल से पुराने हैं. हमारे शोध से पता चला है कि ये सभ्यता कम से कम आठ हजार साल पुरानी है. इस नई जानकारी से भारतीय उपमहाद्वीप में मानवीय बसावट के विकास की अवधारणा में बड़ा बदलाव आएगा."

शोध से जुड़ी डेक्कन कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर आरती देशपाण्डे मुखर्जी ने बताया, "भीरराना में गाय, बकरी, हिरण इत्यादि पशुओं की हड्डियों, दांतों, सींगों के अवशेष मिले हैं. इससे हमें इस सभ्यता को समझने में काफी मदद मिलेगी." 

विकसित सभ्यता, उन्नत कृषि

एएसआई

पुरातत्वविदों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता में कृषि और व्यापास उन्नत थे. वो एक निश्चित स्तर तक साक्षर भी थे.

हड़प्पा सभ्यता कैसे नष्ट हुई ये अब तक रहस्य है. भारतीय शोधकर्ताओं का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता के नष्ट होने के लिए प्राकृतिक कारण जिम्मेदार थे.

प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "हमने खुदाई में प्राप्त जानवरों की हड्डियों और दांतों के ऑक्सिजन आइसोटोप कंपोजिशन का विश्लेषण किया. इससे हमें उनके समय में हुए जलवायु परिवर्तन के बारे में पता चलता है."

सिंधु घाटी सभ्यता जितनी ही पुरानी है काशी

प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "हमारे अध्ययन के अनुसार हड़प्पा-पूर्व मानव इस इलाके में घग्गर-हाकड़ा नदी के किनारे बसना शुरू किया. ये इलाका रहने और खेती के अनुकूल था. नौ हजार साल से सात हजार साल के बीच मॉनसून जबरदस्त था, जिसकी वजह से इन नदियों में भयानक बाढ़ आई होगी." 

शोधकर्ताओं के अनुसार पांच हजार साल पहले मॉनसन की तीव्रता में कमी आई. इसी समय सिंधु घाटी सभ्यता विकसित हुई. सिंधु घाटी के लोगों ने मॉनसून के साथ तालमेल बिठा लिया था.

फीजिकल रिसर्च लैबोरैटरी, अहमदाबाद के डॉक्टर नवीन जुयाल कहते हैं, "ये जानना बहुत ही रोचक है कि पुराने लोगों ने जलवायु परिवर्तन का कैसे सामना किया. हम आज हो रहे जलवायु परिवर्तन में इस सबक का उपयोग कर सकते हैं."

जलवायु परिवर्तन से बदला जीवन

एएसआई

हड़प्पा के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के हिसाब से अपनी खेती के तरीके को बदला. वो मॉनसून की शुरुआत में गेहूं और जौ जैसी फसलों उगाते थे और बाद में धान और बाजरा इत्यादि.

प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "दिक्कत ये थी कि बाद वाली फसलों की पैदावर कम होती थी. जिसकी वजह से उनके पास हड़प्पा के प्रसिद्ध बड़े भंडारगृहों में रखने के लिए अनाज नहीं बचता था. इस शोध से पता चलता है कि इस कारण लोग अपने घरों में अनाज इत्यादि रखने लगे. जिसकी वजह से हड़प्पा का शहरी ढांचा धीरे धीरे विघटित होने लगा होगा. हड़प्पा सभ्यता रातों-रात नहीं खत्म हुई होगी."

हड़प्पा सभ्यता को मेसोपोटामिया की सभ्यता के समकालीन माना जाता है. लेकिन ताजा अध्ययन के नतीजे अगर सही हैं तो हड़प्पा सभ्यता मेसोपोटामिया से पुरानी सभ्यता होगी.

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मेसोपोटामिया के ईसा से तीन हजार साल पहले के ताम्र लेखों के अनुसार दोनों सभ्यताओं के बीच कारोबारी संबंध थे. हड़प्पाकालीन मुहरें, पासे, बटखरे इत्यादि भी मेसोपोटामिया में पाए गए हैं.

अगर दोनों सभ्यताओं की तुलना करें तो कई रोचक बातें पता चलती हैं. मसलन, हड़प्पा के मुअनजोदाड़ो शहर में चौड़ी सड़कें और नालियां, सफाई की व्यवस्था बेहतर नगरीय प्रबंधन दर्शाती हैं. वहीं मेसोपोटामिया में सफाई की कोई ठोस योजना नहीं नजर आती. 

इन दोनों सभ्यताओं की समकालीन तीसरी सभ्यता (मिस्र की सभ्यता) भी एक नदी (नील) के किनारे विकसित हुई थी.

मिस्र की सभ्यता को भी सिंधु घाटी सभ्यता की तरह बाढ़ और खेती के संकट से जूझना पड़ा था. लेकिन मिस्र की शासन व्यवस्था मजबूत थी और उनके पास एक शक्तिशाली सेना भी थी.

जबकि हड़प्पा में ऐसी किसी केंद्रीयकृत प्रशान व्यवस्था का चिह्न नहीं मिला है, न ही हड़प्पा में किसी तरह के बड़े हथियार मिले हैं. सेना तो बहुत दूर की बात है.

शांतिप्रिय हड़प्पावासी

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ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि हड़प्पावासी बहुत ही शांतिप्रिय थे. हड़प्पा में किसी राजपुरुष का संकेत देने वाला एक ही सुबूत मिला है. हड़प्पा में मिली एक टेराकोटा मूर्ति को 'पुजारी राजा' माना जाता है, जो शायद बहुत अमीर नहीं रहा होगा.

हड़प्पा के चारों तरफ किले जैसी दीवारें नहीं मिलते. उनके पास से जो हथियारनुमा चीजें मिली भी हैं वो हथियार कम और औजार ज्यादा लगते हैं.

हड़प्पा सभ्यता के नष्ट होने को लेकर दूसरी व्याख्या हथियारों और युद्ध के प्रति उनकी विरक्ति से संबंध रखती है. कई इतिहासकारों का मानना रहा है कि सिंधु घाटी सभ्यता बाहरी आक्रमण के कारण नष्ट हुई.

जब आखिरी बादशाह ने खायी रोटी-चटनी

पुरातत्वविद् एसआर राव ने लिखा है, "1900 ईसा पूर्व तक हड़प्पा सभ्यता के ज्यादातर नगर खाली हो चुके थे. ऐसा लगता है कि उन्होंने बहुत जल्दी में अपने नगर छोड़ थे. वो छोटे छोटे समूहों में निर्वासित हुए."

कुछ लोगों के मानना है कि आर्यों के आक्रमण के कारण हड़्प्पावासी जल्दबाजी में पलायन करने लगे. हालांकि अब ज्यादातर इतिहासकार इस अवधारणा को औपनिवेशक मिथक मानते हैं.

आलोचकों के अनुसार यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने अपनी अतिक्रमण को जायज ठहराने के लिए इस अवधारणा को बल दिया. लेकिन हड़प्पा के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के हिसाब से अपनी खेती के तरीके को बदला. वो मॉनसून की शुरुआत में गेहूं और जौ जैसी फसलों उगाते थे और बाद में धान और बाजरा इत्यादि.

प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "दिक्कत ये थी कि बाद वाली फसलों की पैदावर कम होती थी. जिसकी वजह से उनके पास हड़प्पा के प्रसिद्ध बड़े भंडारगृहों में रखने के लिए अनाज नहीं बचता था. इस शोध से पता चलता है कि इस कारण लोग अपने घरों में अनाज इत्यादि रखने लगे. जिसकी वजह से हड़प्पा का शहरी ढांचा धीरे धीरे विघटित होने लगा होगा. हड़प्पा सभ्यता रातों-रात नहीं खत्म हुई होगी."भारतीय शास्त्रों में भी इस क्षेत्र में संघर्ष की झलक मिलती है.

पुरों को नष्ट करने वाले इंद्र

औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि की उपज आर्य आक्रमण की अवधारणा लगभग खारिज की जा चुकी है

1947 में एएसआई के डायरेक्टर-जनरल आरईएम व्हीलर ने एक विवादित बयान दिया. हड़प्पा से मिले पुरातात्विक सुबूतों की ऋग्वेद के सूक्तों से तुलना करते हुए व्हीलर ने कहा, "ऋग्वेद में पुर का जिक्र है, जिसका अर्थ किला या गढ़ होता है. आर्यों के देवता इंद्र को पुरंदर यानी पुरों को नष्ट करने वाला कहा गया है." 

व्हीलर ने आगे कहा, "हो सकता है कि जलवायु, आर्थिक या राजनीतिक कमजोरियों से हड़प्पा सभ्यता कमजोर हुई हो लेकिन इसपर आखिरी आघात बड़े पैमाने पर मचाई गई तबाही रही होगी. हड़प्पा सभ्यता के आखिरी काल में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह कत्ल कर दिया गया. परिस्थितिजन्य सुबूतों की मानें तो इसके लिए इंद्र जिम्मेदार था. "

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व्हीलर की इस स्थापना की काफी आलोचना हुई. 1964 में पुरातत्वविद जॉर्ज डैलेस ने लिखा, "हड़प्पा में मिले कुछ कंकाल हत्या की ओर संकेत करते हैं ....लेकिन ज्यादातर अवशेष प्राकृतिक रुप से दफनाए जाने की ओर इशारा करते हैं. न ही व्यापक तौर पर नष्ट किए जाने या जलाए जाने के निशान मिलते हैं. न ही ऐसे किसी सेनानी या व्यक्ति का कंकाल मिला है जिसके आसपास ढेर सारे हथियार रखे हुए हों. हड़प्पा में किसी भी तरह की आखिरी निर्णायक लडाई के सुबूत नहीं मिलते."

अब शोधकर्ता इस बात पर लगभग एकमत होने लगे हैं कि हड़प्पा सभ्यता के नष्ट होने के लिए प्राकृतिक कारण सर्वाधिक जिम्मेदार रहे होंगे.

प्रोफेसर सरकार कहते हैं, "एक बात तय है कि प्राचीन भारत के ये लोग बगैर किसी आधुनिक तकनीकी के भी हजारों साल तक जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सक्षण रहे. हमें उनसे सीखना चाहिए. हम इस समय सूखे और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं. देखना है कि आधुनिक मनुष्य अपने समस्त तकनीकी ज्ञान के साथ कितने दिनों तक वैश्विक जलवायु परिवर्तन का सामना कर पाता है."

First published: 6 June 2016, 23:54 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

Feminist and culturally displaced, Durga tries her best to live up to her overpowering name. She speaks four languages, by default, and has an unhealthy love for cheesy foods. Assistant Editor at Catch, Durga hopes to bring in a focus on gender politics and the role in plays in all our interactions.

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