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नई शिक्षा नीति: मसौदा पूरा, इच्छा अधूरी

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

देश में शिक्षा को हर स्तर पर प्रभावशाली बनाने के लिए, मौजूदा सरकार सत्ता संभालते ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव की ज़रूरत महसूस करने लगी थी. नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन किया गया था.  

30 अप्रैल को नई शिक्षा नीति पर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में काम करने वाले पैनल की तरफ से मानव ससांधन मंत्रालय को रिपोर्ट भेजी जा चुकी है. नई शिक्षा नीति में शिक्षा क्षेत्र के लिए सरकारी बजट बढ़ाने की सिफारिश की गयी है. साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया है कि देश में हाल ही में हुए जेएनयू विवाद जैसा तनावपूर्ण माहौल दुबारा पैदा न हो. 

कैच न्यूज़ ने नई शिक्षा नीति से जुड़े सारे दस्तावेजों की समीक्षा की है. हालांकि इन दस्तावेजों को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.

फिलहाल कमेटी ने नई नीतियों को लेकर मंत्रालय से सिर्फ सिफारिश की है. नीतियों के क्रियान्वयन को लेकर कमेटी की तरफ से मंत्रालय को किसी भी प्रकार का सुझाव नहीं दिया गया है. 

नई शिक्षा नीति से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु:

  • सूचना और संचार तकनीक की पढ़ाई, भारतीय शिक्षा तंत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए. इसके अंतर्गत शिक्षकों और विद्यार्थियों को कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़ी बातें जानने और सीखने को मिलेंगी. कंप्यूटर और इंटरनेट की मदद से क्लासरूम पढ़ाई की तकनीक को स्मार्ट और प्रभावशाली बनाया जा सकेगा.
  • करीब ढाई लाख ग्राम पंचायतों को पर्सनल हॉटस्पॉट से जोड़ा जायेगा. इससे दूर दराज के गांवों में बसे स्कूलों को इलेक्ट्रॉनिक कनेक्टिविटी की सुविधा मिल सकेगी.
  • नई शिक्षा नीति के लिए गठित कमेटी ने ये सिफारिश की है कि स्टैंडिंग एजुकेशन कमीशन की स्थापना की जानी चाहिए जो मानव संसाधन मंत्रालय को शिक्षा से जुड़ी नीतियों और कार्यक्रमों की व्याख्या और मूल्यांकन करने में मदद करे. साथ ही ये कमीशन दो साल में एक बार राष्ट्रीय शिक्षा रिपोर्ट जारी करेगी, जिससे मंत्रालय को शिक्षा नीतियों में बदलाव या उनको और प्रभावशाली बनाने के तरीकों में मदद मिलेगी. 
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  • कमेटी ने ये सिफारिश की है कि शिक्षण संस्थाओं को राजनैतिक मुद्दों का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए. बोलने की आज़ादी और स्वतंत्रता के बीच एक संतुलन बनाते हुए, शिक्षण संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सही ज्ञान देना होना चाहिए. शायद नई शिक्षा नीति में ये सिफारिश इसलिए की गयी है कि हाल ही में जितना तनावग्रस्त माहौल जेएनयू में पैदा हुआ था, वैसा कुछ भी देश में दोबारा न हो.
  • 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त लिंगदोह कमेटी की सिफ़ारिशों पर प्रभावशाली तरीके से अमल करने की ज़रूरत है. लिंगदोह कमेटी ने उन सारी गतिविधिओं पर रोक लगाने की मांग की थी जो शिक्षा से जुड़े क्रियाकलापों को प्रभावित करती हैं. समिति ने शिक्षा के मानदण्डों को देखते हुए कैंपस में विद्यार्थियों के रुकने की अवधि को भी तय करने की मांग की थी.
  • कमेटी ने ये सुझाव भी दिया है कि आल इंडिया सर्विस के तरह इंडियन एजुकेशन सर्विस की परीक्षा होनी चाहिए, और अधिकारिओं की भर्ती यूपीएसी द्वारा की जानी चाहिए. एजुकेशन सर्विस से जुड़े लोगों की नियुक्ति राज्य और केंद्र में शिक्षा निति से जुड़े उच्च पदों पर होनी चाहिए.

  • एजुकेशन सर्विस से जुड़े मामलों की जांच पड़ताल के लिए, एजुकेशनल ट्रिब्यूनल की स्थापना होनी चाहिए. ट्रिब्यूनल के पास शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार होगा और इसका संचालन हाईकोर्ट के रिटायर जज या डिस्ट्रिक्ट जज करेंगे.
  • कमिटी ने सिफारिश की है कि सामाजिक और आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए और उन्हें हर तरह की सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी.
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  • 1992 की शिक्षा नीति के अनुसार जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए. लेकिन रिपोर्ट के अनुसार मात्र 3.5 प्रतिशत हिस्सा ही शिक्षा पर खर्च हो रहा है. शिक्षा के क्षेत्र में नई चुनौतियों का सामना करने के लिए क्षेत्र में हो रहे खर्च को 6 प्रतिशत तक बढ़ाने की सख्त जरूरत है.
  • कमेटी ने सुझाव दिया है कि मौजूदा स्कूल सिस्टम के एकीकरण पर ध्यान देने की ज़रूरत है. जिन स्कूलों में विद्यार्थिओं की संख्या ज्यादा नहीं है और आवश्यक मूलभुत सुविधाओं की कमी है, उनको मिला कर एक स्कूल बना देना चाहिए. इससे विद्यार्थिओं के लिए ज्यादा शिक्षक उपलब्ध हो सकेंगे और बच्चों की शिक्षा से जुड़ी बाकि मूलभुत अवश्यकताएं भी पूरी हो सकेंगी.  
  • केंद्र और राज्य स्तर पर शिक्षकों, प्रिंसिपल और दूसरे कैडरों की नियुक्ति मेरिट के आधार पर होनी चाहिए. साथ ही नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता का होना बहुत ज़रूरी है. हेडमास्टर और प्रिंसिपल के पद के लिए आवेदन भरते समय शिक्षा के अधिकार द्वारा तय किये गए मानकों का कड़ाई से पालन होना जरूरी है.
  • मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा शिक्षकों की अनुपस्थिति को जांचने के लिए सूचना एवं संचार तकनीकों का प्रयोग करना ज़रूरी है. ऐसे मामलों में गैरज़िम्मेदार शिक्षकों के ख़िलाफ़ दण्ड सम्बन्धी मानकों को तय किया जाना चाहिए. 
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  • नयी शिक्षा नीति की सिफारिशों के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाने वाले बच्चों और शिक्षकों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मौज़ूदा एक साल के बीएड कोर्स की जगह एकीकृत बीएबीएड कोर्स होना चाहिए. शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक टीचर एंट्रेंस टेस्ट होना चाहिए और जो पहले से शिक्षक पद पर कार्यरत हैं उनके लिए पांच साल की ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहिए.
  • कमेटी ने सुझाव दिया है कि राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता पालिसी 2015 के अंतर्गत व्यवसायिक शिक्षा पर ज़ोर देने की ज़रूरत है. आठवीं क्लास से ही व्यवसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन मिलना चाहिए.
  • मौजूदा नो डिटेंशन पॉलिसी के अनुसार सातवीं क्लास तक के विद्यार्थिओं को (जब उसकी उम्र 14 साल होगी) परीक्षा में फेल नहीं किया जा सकता. नई शिक्षा नीति इसे घटा कर पांचवी क्लास तक करना चाहती है (जब बच्चे की उम्र 11 साल होगी). 

  • उच्च प्राथमिक स्तर विद्यार्थी के फेल हो जाने के बाद उसे कोचिंग की सुविधा के साथ दो अतिरिक्त मौके दिए जाने चाहिए. इसके लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट में बदलाव की ज़रूरत होगी. अगर दिए गए दूसरे मौके के बाद भी बच्चा फेल हो जाता है तो, वैकल्पिक तौर पर उसे व्यवसायिक शिक्षा दी जानी चाहिए. (ये सिफारिश नीति के उस तर्क का विरोध करती है जिसमें व्यवसायिक शिक्षा को वैकल्पिक न बना कर मुख्य धारा में जोड़ने की बात की गयी थी)
  • हर सरकारी और प्राइवेट स्कूल में बच्चों को योग की शिक्षा मिलनी चाहिए. 
  • कमेटी ने सुझाव दिया है कि एक परीक्षा के स्थान पर लगातार मूल्यांकन की प्रक्रिया होनी चाहिए. बच्चे की योग्यता का आकलन क्लासरूम में उसकी सहभागिता और समय-समय पर लिए जाने वाले टेस्ट से की जानी चाहिए. उसकी रटी हुई यादाश्त के आधार पर नहीं. दसवीं और बारहवीं के बच्चों पर बोर्ड की परीक्षा का बहुत बोझ होता है.
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  • असाधारण बच्चों को संभालने के लिए शिक्षकों की ख़ास ट्रेंनिंग होनी चाहिए. 
  • बच्चों में बढ़ते कुपोषण और अनीमिया को देखते हुए, सेकेंडरी स्कूलों में भी मिड-डे मील की सुविधा होनी चाहिए. 
  • उच्च शिक्षा से जुड़े प्रबंधन के कार्य को देखने के लिए यूजीसी को अलग कानून बनाने की जरूरत है. 
  • बच्चों के स्वास्थ की नियमित तौर पर जांच होनी चाहिए. इसके लिए स्कूलों को सारी मेडिकल सुविधाओं से लैस मोबाइल वैन की व्यवस्था करनी होगी. साथ ही डॉक्टरों से अच्छी कनेक्टिविटी बना कर रखनी होगी.
  • कमिटी ने सिफारिश की है कि यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर की नियुक्ति पर किसी भी तरह का राजनैतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए. वाइस चांसलर की नियुक्ति, उनकी कार्यक्षमता और लीडरशिप के विशिष्ट गुणों पर राज्य और केंद्र- दोनों सरकारों की आम सहमति होनी चाहिए . 
  • कॉलेजों को आधिकारिक मान्यता देने के लिए एक बेहतर सिस्टम बनाने की ज़रूरत है, जिससे उन प्राइवेट कॉलेजों को खत्म किया जा सके जो अयोग्य शिक्षकों और स्टाफ के जरिये शिक्षा के स्तर में गिरावट ला रहें हैं. 
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  • 100 नए सरकारी और प्राइवेट शैक्षिक संस्थान खोले जाने चाहिए जो विभिन क्षेत्रों में रिसर्च और नई चीजें खोजने का काम करेंगे.
  • बच्चे पढ़ाई पूरी करने के लिए देश से बाहर न जाएं, इसके लिए विदेशी यूनिवर्सिटी को भारतीय यूनिवर्सिटी के साथ जोड़ने का प्रयास किया जायेगा. 
  • तकरीबन 10 लाख बच्चों को ट्यूशन फीस, रहने और पढ़ाई के दौरान आने वाले बाकी खर्च मुहैया कराने के लिए हर साल नेशनल फेलोशिप फण्ड बनाया जायेगा. इस फंड के जरिये आर्थिक रूप से तंगी झेल रहे कमजेर वर्ग और गरीबी रेखा से नीचे रह रहे बच्चों को स्कॉलरशिप प्रदान की जायेगी.
  • शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की लाइसेंसिंग जरूरी होगी और हर 10 साल में एक बार एक्सटर्नल परीक्षा के निर्णय के बाद उनके लाइसेंस का नवीनीकरण किया जायेगा.

First published: 24 June 2016, 7:10 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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