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किशोर न्याय व्यवस्था: 'भीड़ की मांग पर कानून बनाना अक्लमंदी नहीं'

जी मोहन गोपाल | Updated on: 19 December 2015, 23:52 IST
QUICK PILL
  • 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार का एक आरोपी अब रिहा होने जा रहा है. इस घटना के बाद से संगीन अपराधों में 16 से 18 साल के अपराधियों को व्यस्क मानकर सज़ा देने की मांग उठती रही है.
  • लोकसभा में इससे जुड़ा नया विधेयक पारित हो चुका है. इसे अभी राज्यसभा में पारित होना बाक़ी है. वैश्विक अनुभव बताते हैं कि ऐसे कानून से कोई ज़मीनी फ़ायदा नहीं होता.

भारतीय संसद अपने युवा नागरिकों के प्रति एक गंभीर अपराध करने की दहलीज पर है. किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2014 पर संशोधन की तलवार हर उस किशोर पर लटक रही है जो 1997 के बाद पैदा हुआ है. इतना ही नहीं हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इस कानून की चपेट में आ जाएंगी.

किशोर न्याय से जुड़े मौजूदा कानून के अनुसार 18 साल से कम उम्र के नाबालिगों अपराधियों के लिए एक अलग किशोर न्याय व्यवस्था है. इसका उद्देश्य ऐसे किशोरों को सुधारकर समाज की मुख्यधारा में वापस में आने का मौका देना होता है.

भारतीय किशोर न्याय व्यवस्था पहले से ही उपेक्षा और आर्थिक तंगी से जूझ रही है. इस कानून से स्थिति और बिगड़  सकती है. मौजूदा भारतीय कानून अतंरराष्ट्रीय समुदाय में किशोरों के लिए मान्य सर्वसम्मत और तार्किक मानकों के अनुरूप है.

अन्यायपूर्ण कानून

भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत 'किशोर न्याय विधेयक' मौजूदा कानून को बदलना चाहता है. ये विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्य सभा में पारित होना बाक़ी है.

नए प्रस्तावित विधेयक के अनुसार 16 से 18 साल के बीच की उम्र वाले नाबालिग अगर सात साल या उससे अधिक सज़ा वाले अपराधों के मामले में अभियुक्त बनते हैं तो उन्हें बालिगों की जेल में रखा जाएगा. उनपर मुक़दमा भी व्यस्कों की तरह चलाया जाएगा.

प्रस्तावित कानून नाबालिग अपराधियों से जीवन में दोबारा सुधरने और बदलने का मौका छीन लेगा

इस कानून की जद में अमीर-ग़रीब सभी बच्चे आ जाएंगे. जो मध्य वर्गीय और उच्च वर्गीय समुदाय किशोरों के लिए कड़े कानून की मांग करता रहा है उनके बच्चे भी इससे नहीं बचेंगे. लेकिन ऐसे कानून का सबसे ज्यादा इस्तेमाल ग़रीब तबके के खिलाफ होता है. ख़ासकर, दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चे इसके ज्यादा शिकार होंगे. इन बच्चों के अपराध के चंगुल में फंसने से ज्यादा संभावना इस नये कानून के फंदे में फंसने की रहेगी.

कोई फ़ायदा नहीं होगा

प्रस्तावित कानून से समाज को कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होगा. निर्भया बलात्कार मामले के बाद बने कड़े बलात्कार कानून से ये साफ़ है कि कड़ी सज़ा के डर और अपराध की संख्या में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. इसके उलट इस कानून के जोखिम ज्यादा हैं.

एक अनुमान के मुताबिक प्रस्तावित कानून के बाद हर साल करीब 10 हज़ार नाबालिग जेल भेजे जाएंगे. वहां वो हार्डकोर अपराधियों और आतंकवादियों के साथ रहेंगे.

पढ़ेंः नाबालिग और गंभीर अपराधों के आंकड़े मेल नहीं खाते

भारतीय जेलों में वो बलात्कार और अन्य अपराधों के शिकार हो सकते हैं. भारत की जेलें अपने आप में अपराध का ट्रेनिंग ग्राउंड हैं. उनकी दुर्दशा को देखते हुए अगर ये नाबालिग जेल से बड़े अपराधी बनकर निकलें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

अमरीका की नकल सही नहीं

नाबालिगों के मामले को व्यस्कों की अदालत में भेजने के अमेरिकी प्रयोग की पूरी दुनिया में काफी आलोचना हो चुकी है. भारत आंख मूंदकर उसका अनुसरण कर रहा है जो एक बड़ी भूल साबित हो सकती है.

अमेरिका की अपराधिक न्याय प्रणाली को दुनिया की सबसे ख़राब प्रणालियों में माना जाता है. अमेरिका में कड़ी सज़ा और जेल भेजने की दर काफ़ी अधिक है फिर भी वहां हिंसा से जुड़े मामले काफ़ी अधिक हैं.

किशोर न्याय व्यवस्था के मामले में अमेरिका की स्थिति काफ़ी ख़राब है. अमेरिका संयुक्त राष्ट्र में शामिल एकमात्र देश है जिसने यूएन कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ़ द चाइल्ड को स्वीकार नहीं किया है.

गंभीर अपराधों में 16-18 साल के नाबालिगों को व्यस्क मानकर मुक़दमा चलाने से कोई सामाजिक लाभ नहीं होता

अमेरिका और भारत के हालात काफ़ी अलग हैं. हमें हमारी ज़रूरतों के हिसाब से कानून बनाना होगा. भारत को अपनी न्याय प्रणाली बेहतर करने की जरूरत है. प्रस्तावित विधेयक भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रतिकूल है.

अभी तक ऐसा कोई वैज्ञानिक अध्ययन सामने नहीं आया है जिसके आधार पर कहा जा सके कि 16 से 18 साल आयु वर्ग के किशोरों को व्यस्कों की जेल में भेजने से कोई सामाजिक लाभ होता हो. दुनिया के विभिन्न देशों के अनुभव यही बताते हैं कि 18 साल से कम आयु के किशोरों को नाबालिग मानना ही उचित है.

ऐसे विधेयक का समर्थन क्यों?

ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि सभी दल इस प्रस्तावित विधेयक का समर्थन करते क्यों नज़र आ रहे हैं?

इस विधेयक को समाज के एक तबके का भी समर्थन हासिल है. इसके समर्थकों में बड़ा हिस्सा उच्च वर्ग और मध्य वर्ग से आता है. इस वर्ग को इस बात की बहुत चिंता रहती है कि वो ऐसे अपराधों का शिकार हो सकता है.

पढ़ेंः बलात्कार शब्द मेरी ज़िंदगी में पहली बार कब आया?

ऐसे लोगों की राय है कि ऐसे किशोर अपराधियों से निपटने का एक ही तरीका है कि उन्हें कड़ा शारीरिक दंड दिया जाए जिससे वो अपराध करने से डरें.

अगर ये सच होता तो अमेरिका, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों में अपराध ही नहीं होते क्योंकि वहां काफ़ी कड़ी सजाओं के प्रावधान हैं. ऐसा होता तो निर्भया मामले के बाद बलात्कार से जुड़े नए कड़े कानून के बाद बलात्कार नहीं होते या बहुत कम हो जाते.

दरअसल प्रस्तावित विधेयक हमारी सामंती ग्रंथियों का सूचक है जो दूसरों को कष्ट पहुंचाकर तुष्ट होती हैं

भारतीय कानून निर्माता विवेकहीन भीड़ के नारे, "अगर आपकी उम्र बलात्कार करने लायक हो गयी है तो आपकी उम्र फांसी पर लटकाने के लिए काफ़ी है" से प्रभावित हो गये लगते हैं.

बदला बनाम न्याय

ऐसा लगता है कि हमारे नेता बदले और न्याय के बीच का फर्क भूल गये हैं. बुद्ध के समय से ही न्याय और बदले से कोई सम्बन्ध नहीं है. महात्मा गांधी ने हमें चेताया था कि आंख के बदले आंख की नीति पूरी दुनिया को अंधा बना देगी.

क्या भारतीय राज्य सभा इतिहास के इस निर्णायक मोड़ पर महात्मा गांधी के विचारों को भूलकर इस विधेयक को पारित कर देगी?

क्या वो अपने ही बच्चों से बदला लेने की भावना पर मुहर लगाएगी? क्या इन बच्चों से सुधरने और जिंदगी को दोबारा शुरू करने का एक मौका छीन लेना न्यायोचित होगा?

भारतीय कानून निर्माताओं को विवेकहीन भीड़ की मांग पर कानून नहीं बनाना चाहिए

विवेकहीन भीड़ को तुष्ट करने के लिए नीतियां नहीं बनायी जातीं. 'मेक इन इंडिया' का कोई मतलब नहीं रह जाएगा अगर हमारा लोकतंत्र इसके सबसे युवा नागरिकों के संग मानवीय व्यवहार नहीं करता.

16 से 18 साल के बीच के नाबालिगों से जुड़े अपराधों पर किशोर न्याय व्यवस्था के अंतर्गत विचार करने से ही उनका भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है और उनके भविष्य से ही हमारा भी भविष्य जुड़ा हुआ है.

First published: 19 December 2015, 23:52 IST
 
जी मोहन गोपाल

Director of Rajiv Gandhi Institute for Contemporary Studies, New Delhi.

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