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ट्रांसजेंडर विधेयक: जो ऐतिहासिक हो सकता हो सकता था उसे कमजोर कर दिया सरकार ने

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 24 July 2016, 8:20 IST
(फाइल फोटो)

नया ट्रांसजेंडर विधेयक कमजोर है. यह कहना है पहला ट्रांसजेंडर विधेयक लाने वाले सांसद तिरुचि शिवा का. बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ट्रांसजेंडर विधेयक (ट्रांसजेंडरों के अधिकारों की रक्षा) 2016 पेश कर दिया. संसद में पेश किए गए इस विधेयक का उद्देश्य देश भर में ट्रांसजेंडर लोगों के कल्याण और उन्हें समानता का अधिकार देना है. विधेयक अभी जनता की पहुंच से दूर है.

दो साल पहले तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) से सांसद तिरुचि शिवा ने संसद में एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया था. उन्हें उम्मीद थी कि इसे कहीं तो महत्व मिलेगा. यह विधेयक ट्रांसजेंडरों के लिए काम कर रहे विभिन्न समूहों, समुदायों और संगठनों के साथ सलाह मशविरे के बाद प्रस्तुत किया गया था.

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एक साल बाद 24 अप्रैल 2015 को राज्यसभा में पारित किए गए इस विधेयक से देश भर में ट्रांसजेंडर समुदाय में खुशी की लहर छा गई. राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए इस विधेयक को लोकसभा में भी पारित किया जाना था.

45 साल में पहली बार ऐसा हुआ जब किसी निजी सदस्य का विधेयक संसद के किसी सदन में पारित हुआ हो. यह विधेयक हर लिहाज से एक मिसाल है.

एक साल पहले के विधेयक का ब्यौरा देते हुए शिवा ने कहा यह अत्यंत भावुक क्षण था. ट्रांसजेंडर समुदाय के कई लोगों को उम्मीद थी कि प्रारंभिक विरोध के बाद यह विधेयक पारित कर दिया जाएगा.

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शिवा ने इस विधेयक में नौकरियों में आरक्षण, सरकारी शिक्षण संस्थान, वित्तीय सहायता, सामाजिक कार्यक्रमों सहित बहुत सी सुविधाओं के बारे में बात की है. हम नहीं जानते कि नया विधेयक कैसा होगा लेकिन ट्रांसजेंडर विधेयक 2014 लाने वाले सांसद तिरूची शिवा को आशंका है कि इसमें पिछले विधेयक के वादे दुहराए जाएंगे.

सांसद तिरुचि शिवा से बातचीत के कुछ अंश:

क्या आपको लगता है नए विधेयक में भी वही वादे किए जाएंगे, जो आपने अपने विधेयक में किया था?

मैं खुश हूं कि यह विधेयक लाया गया और सरकार ने इसका संज्ञान लिया, लेकिन ज्यादा खुशी वाली कोई बात नहीं है. इस विधेयक का मसौदा पिछले विधेयक के मुकाबले कम प्रभावी है. वह विधेयक ज्यादा सम्यक और संपूर्ण था. इसमें देश भर के ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और आवश्यकताओं को शामिल किया गया था.

किस प्रकार से नया विधेयक आपके पुराने विधेयक के मुकाबले कमजोर है?

संसद में दो साल पहले पारित किए गए इस विधेयक के दो मूलभूत पक्ष इस बार कमजोर कर कर दिए गए हैं. एक तो ट्रांसजेंडरों को नौकरी में आरक्षण, दूसरा, इस विधेयक में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए वैधानिक आयोग या राज्य स्तरीय आयोग के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया है.

राज्यसभा द्वारा पिछले साल पारित विधेयक में सरकारी शिक्षण संस्थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों में नौकरियों में ट्रांसजेंडरों को 2 प्रतिशत आरक्षण की बात कही गई थी. जहां तक प्राइवेट सैक्टर का सवाल है तो विधेयक में कहा गया है कि सरकार नियोक्ताओं को प्रोतसाहन राशि दे ताकि वे अपने यह विधेयक लागू होने की तिथि से पांच साल की अवधि में कार्य दल में दो प्रतिशत संख्या ट्रांसजेंडरों की रखें.

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दूसरा पहलू राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय आयोग का गठन करना है. इन आयोगों के गठन का उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाना और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है. ये आयोग राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की तरह ही काम करेगा.

नए विधेयक में सुप्रीम कोर्ट के 2014 में दिए गए फैसले का भी खयाल नहीं रखा गया है जिसमें कोर्ट ने तीसरे लिंग को मान्यता देते हुए ट्रांसजेंडरों को समान अधिकार और सुरक्षा की बात कही थी.

कोर्ट ने पहचान पत्रों जैसे मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और राशन कार्ड में लिंग के कॉलम में एक तीसरी श्रेणी शामिल करने का सुझाव दिया था, जो इनके स्कूल, कॉलेज में भर्ती, अस्पतालों व सार्वजनिक शौचालयों में प्रवेश में सहायक हों.

अदालत ने यह भी कहा था कि ट्रांसजेंडरों को अपने दस्तावेज स्वयं सत्यापित करने का भी अधिकार मिलना चाहिए. नए विधेयक में इस संबंध में विशेषज्ञ समिति की सिफारिश की गई है. इससे मुश्किलें बढ़ेंगी ही, कम नहीं होंगी क्योंकि ट्रांसजेंडर समुदाय में आपस में पहले ही बहुत मतभेद हैं. पिछले विधेयक में चिकित्सा सहायता, पेंशन आदि की भी बात कही गई थी जो नए विधेयक से गायब हैं.

जिस वक्त आपने राज्यसभा में विधेयक पेश किया, सभी पार्टियों की ओर से इसका पुरजोर विरोध हुआ था. तत्कालीन सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा था कि विधेयक के कुछ प्रावधान व्यावहारिक नहीं हैं. वहीं तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी और कांग्रेस के पीजे कुरियन ने आग्रह किया था कि विधेयक के मौजूदा स्वरूप को वापस लिया जाए. क्या आपको लगता है नया विधेयक उनकी मांगों के अनुरूप होगा?

मुझे लगता है सरकार मात्र हमारे विधेयक को खारिज करने के लिए यह विधेयक ला रही है. इसके अलावा सरकार की इस विषय में कोई रूचि नहीं है. भाजपा को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और सरकार की स्थिति वहां काफी मजबूत है. मुझे नहीं लगता कि मेरा विधेयक लोकसभा में पारित होगा. अगर ऐसा होता है तो नया विधेयक निराधार हो जाएगा और इसे वापस लेना होगा.

ट्रांसजेंडरों को अपने ही परिवारों में काफी भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इस दिशा में यह विधेयक उनके लिए आशा की किरण था लेकिन इसमें भी मिलावट हो गई है. इस बात पर अफसोस के साथ ही शिवा को अब भी उम्मीद है कि लोकसभा में उनका विधेयक पारित होगा.

First published: 24 July 2016, 8:20 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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