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भारत में अभी भी कुपोषण बड़ी समस्या बना हुआ है

श्रिया मोहन | Updated on: 23 January 2016, 23:02 IST

बीते सप्ताह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा 13 राज्यों की नवीनतम रिपोर्ट बताती हैं कि बीते दशक की तुलना में आज भारतीयों के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक हमारे बच्चे भी पहले की अपेक्षा काफी स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट हैं.

पिछले साल के ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने पहले ही घोषणा की थी कि 2005 से 2014 के बीच पांच साल की उम्र से कम बच्चों में कम वजन होने की समस्या 43.5 फीसदी से गिरकर 30.7 तक पहुंच गई थी. यह बात भारत में भुखमरी की स्थिति को सुधारने में मदद करती है.

तो क्या भारत में पोषण अभी भी एक चुनौती है? हमें हमारी ऊर्जा जरूरतों पर ध्यान कहां केंद्रित करना चाहिए?

कोशिशें रंग लाईं

क्या आपको वर्ष 2008 याद है जब भारत के राष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर देश के पतली टांगों वाले, पिचके पेट और बिखरे बाल वाले भूखे बच्चों की तस्वीरें छपी थीं. आईएफपीआरआई के ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने उस वर्ष तब और हलचल पैदा कर दी थी जब उसने कुपोषण पीड़ित 88 देशों की सूची में भारत को 66वें स्थान पर रखा था. यह गरीब अफ्रीकी देशों के समकक्ष थी और इसे देश में भुखमरी के खतरनाक स्तर का संकेत मिला था.

मध्य प्रदेश को तब भारत के सर्वाधिक कुपोषित राज्य के रूप में पहचान मिली थी, क्योंकि यहां की अधिकतर आदिवासी आबादी के बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार थे. 2005 में जब एनएफएचएस के आंकड़े जारी हुए थे तब बताया गया था कि यहां के 60 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम था और 35 फीसदी बच्चे जिंदा नहीं रह पाते थे. आज मध्य प्रदेश की स्थिति कुछ सुधरी है. अब यहां कम वजन के 42.8 फीसदी बच्चे हैं जबकि मृत्युदर 25 फीसदी हो गई है.

इसके अलावा भी कई अन्य राज्यों में कुपोषण की स्थिति में कमी आई है. उदाहरण स्वरूप हरियाणा में पिछले सर्वेक्षण की तुलना में मौजूदा सर्वेक्षण के दौरान कुपोषण की दर 39.6 से घटकर 29.4 फीसदी पर पहुंच गई है. जबकि बिहार में 55.9 से 43.9 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 38.7 से 31.5 फीसदी, सिक्किम में 19.7 से 14.2 और तमिलनाडु में कुपोषण अब 29.8 से घटकर 23.8 फीसदी रह गया है.

खून की कमी और सामान्य वजन से कम भार वाली महिलाओं का प्रतिशत 41.7 से घटकर 28.3 हो गया है

दिल्ली में भोजन का अधिकार अभियान चलाने वाली दीपा सिन्हा कहती हैं, "हमने काफी लंबा सफर तय किया है. मुझे लगता है कि सिविल सोसाइटी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने विभिन्न राज्य सरकारों को यह बात मानने के लिए बार-बार कहा कि समस्या अभी भी मौजूद है. पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव यह देखा है कि पहलेे इनकार किया जाता था लेकिन अब स्वीकृति मिलने लगी है."

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में कोरकू जनजाति के बीच काम करने वाली और स्पंदन समाज सेवा समिति की संस्थापक सीमा प्रकाश का मानना है कि शहरों की अपेक्षा गांवों में स्थिति ज्यादा गंभीर है. 

सेरेलैक कम और स्तनपान ज्यादा कराने की जरूरत

संस्थागत (अस्पताल या नर्स की उपस्थिति में) प्रसव को बढ़ावा देने का प्रमुख कारण केवल यह नहीं है कि इससे मां सुरक्षित प्रसव करा सकेगी बल्कि इसके जरिये उचित स्तनपान की आदतों को शुरुआत में ही अपनाया जा सकेगा. 

सामान्य रूप से प्रसव के पहले घंटे में शिशु को मां का दूध पिलाना सबसे बेहतरीन उपाय है. इससे बच्चे को कोलोस्ट्रम, प्राकृतिक प्रतिरक्षण और जल्द संक्रमण का विरोध करने के लिए आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं. स्तनपान न कराना कुपोषण के सबसे सामान्य कारणों में से है. इससे बच्चों में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधकता बहुत कम हो जाती है. 

प्रत्येक राज्य में संस्थागत प्रसव में वृद्धि होना एक उल्लेखनीय सुधार है जिससे शिशु और मातृ मृत्यु दर को कम करने में मदद मिली है.

तमिलनाडु जैसे राज्यों में संस्थागत प्रसव दर अब 99 प्रतिशत हैं. जबकि बिहार में यह 19.9 से बढ़कर 63.8 फीसदी और मध्य प्रदेश में 26.2 से 80.8 तक बढ़ चुकी है. 

लेकिन खाद्य अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा इन आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा किया जाता है.

कुपोषण के सबसे सामान्य कारणों में से स्तनपान का न होना है. जिससे बच्चों में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधकता समाप्त हो जाती है

पिछले एक दशक में संस्थागत प्रसव में अभूतपूर्व वृद्धि के बावजूद एनएफएचएस आंकड़े ज्यादातर राज्यों में अभी भी स्वस्थ स्तनपान प्रथाओं को अपनाने में पीछे रहने की जानकारी देते हैं. 

जहां प्रसव के पहले घंटे के भीतर मध्य प्रदेश में 34.5 फीसदी मांओं ने ही शिशु को स्तनपान कराया. वहीं, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में यह आंकड़े क्रमशः 34.9 प्रतिशत, 47.5 प्रतिशत और 54.7 प्रतिशत ही रहे हैं.

जन्म के पहले छह महीनों में स्तनपान कराने वाली मां के संबंध में भी आंकड़े काफी कम हैं.

मध्य प्रदेश का उदाहरण लेते हैं

खून की कमी और सामान्य वजन से कम भार वाली महिलाओं का प्रतिशत 41.7 से घटकर 28.3 हो गया. पुरुषों में यही आंकड़े 41.6 से घटकर 28.4 फीसदी तक आ गए हैं. इसी प्रकार खून की कमी वाली गर्भवती महिलाओं का औसत 57.9 से घटकर 54.6 पर पहुंच गया है. इसमें बीते एक दशक में ज्यादा सुधार नहीं दिखा. पश्चिम बंगाल में देखें तो खून की कमी वाली गर्भवती महिलाओं में केवल एक फीसदी का ही सुधार हुआ. यहां एक दशक में यह दर 63.2 से घटकर 62.5 पर ही पहुंची है.  

हमें इस वक्त अपने सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले सरकारी व्यय को कम करने की जगह बढ़ाने की जरूरत है. 

जैन पूछते हैं, "हमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में दाल और तेल जैसे खाद्य पदार्थों को जोड़ने की जरूरत है. देश के ग्रामीण इलाकों में तमाम ऐसे परिवार हैं जिन्होंने सालों से दाल नहीं खाई हैं. हम यह कब समझेंगे कि हमें अपने खाने की थाली में विविधता लाने की जरूरत है. हम यह बात कब समझेंगे?" 

आंगनवाड़ी में बच्चों को अपनी खाद्य जरूरतों में से एक तिहाई ही मिल पाता है बाकी दो तिहाई हिस्सा उन्हें घर में ही मिल सकता है. पर समस्या यह है कि तमाम ग्रामीण भारतीय घरों में अभी भी बच्चों को उनकी न्यूनतम आवश्यक कैलोरी की मात्रा नहीं मिल पाती.

पिछले साल के बजट में सामाजिक क्षेत्र के व्यय में व्यापक पैमाने पर कटौती की गई और इसे बुनियादी सुविधाओं के विकास पर खर्च किया गया. सरकार को उम्मीद थी कि इससे अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार आएगा. हम सभी ने देखा है कि इस दौरान क्या अभूतपूर्व विकास देश में हुआ.

First published: 23 January 2016, 23:02 IST
 
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