Home » इंडिया » National Green Tribunal diesel car ban hurts the industry. But will it curb pollution?
 

डीजल कारों पर रोक से इंडस्ट्री परेशान, क्या प्रदूषण पर लगेगी लगाम?

नीरज ठाकुर | Updated on: 16 December 2015, 20:58 IST
QUICK PILL

  • एनजीटी\r\nने आदेश दिया है कि दिल्ली में\r\nअब किसी भी नई डीजल गाड़ी का\r\nरजिस्ट्रेशन नहीं होगाइस\r\nनिर्णय ने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री\r\nको चिंता में डाल दिया है.\r\nकार निर्माता\r\nअब हजारों करोड़ के नुकसान\r\nकी आशंका जता रहे हैं.
  • हालांकि,\r\nएनजीटी का\r\nप्रतिबंध केवल दिल्ली में\r\nलागू होता लेकिन अन्य राज्य\r\nभी एनजीटी के आदेश लागू कर\r\nसकते हैं. हिमाचल\r\nप्रदेश अपने यहां डीजल गाड़ियों\r\nपर पहले ही प्रतिबंध लगा चुका\r\nहै.  
\r\n \r\n \r\n \r\n\r\n\r\n

मुश्किल हालात में कठोर कदम उठाने पड़ते है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दिल्ली में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को कम करने के लिए लिया गया फैसला भी शायद ऐसा ही है. एनजीटी ने आदेश दिया है कि दिल्ली में अब किसी भी नई डीजल गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नहीं होगा.

इस निर्णय ने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को चिंता में डाल दिया है. कार निर्माता अब हजारों करोड़ के नुकसान की आशंका जता रहे हैं. भारत में एक साल के दौरान करीब 18 लाख कारों की बिक्री होती है. इनमें करीब आधी संख्या डीजल गाड़ियां होती हैं. दिल्ली के बाजार में डीजल कारों की हिस्सेदारी सात फीसदी है.

एनजीटी की पाबंदी के चलते दिल्ली के शोरूमों में खड़ी करीब 1000 हजार करोड़ रुपये की डीजल गाड़ियां शोपीस बन गई हैं.

पाबंदी का प्रभाव

हालांकि, एनजीटी का प्रतिबंध केवल दिल्ली में लागू होता लेकिन अन्य राज्य भी एनजीटी के आदेश लागू कर सकते हैं. हिमाचल प्रदेश अपने यहां डीजल गाड़ियों पर पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है. विशेषज्ञों का कहना है कि बेंगलुरू, चेन्नई और मुंबई में भी इस तरह का प्रतिबंध लागू हो सकता है.

सड़कों पर आखिर क्यों डीजल कारों की बहुलता है?

1990 के दशक में यूरोप में लोगों को पेट्रोल कारों की जगह डीजल कारों को खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा. उस समय डीजल इंजन को अन्य ईंधन इंजनों के अपेक्षा ज्यादा बेहतर माना गया. ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती के लिए डीजल कारों को ज्यादा अच्छा बताया गया.

पढ़ेः सुप्रीम कोर्ट ने डीजल गाड़ियों पर लगाया बैन

उत्सर्जन के यूरोपीय मानकों की राह पर चलते हुए भारत में डीजल कारें लोकप्रिय होने लगीं. डीजल कारें ग्राहकों को सस्ती पड़ती थीं और कार निर्माताओं को भी इससे फायदा हुआ. पेट्रोल कार की तुलना में 1 से 1.50 लाख रुपये ज्यादा महंगी डीजल कारें लोगों को ज्यादा पसंद आईं.

डीजल कारें कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती हैं जबकि वो वायु में जहर घोलने वाले कण और नाइट्रोजन ऑक्साइड ज्यादा उत्सर्जित करती हैं.दिल्ली में हवा प्रदूषित होने का मुख्य कारण यहां हवा में घुलने वाले जहरीले कण हैं लेकिन इसकी गाज डीजल कारों पर गिरी. 

क्या डीजल कारों के इंजन को कम प्रदूषित करने वाला बनाया जा सकता है?


डीजल कारें कम प्रदूषण फैलाएं इसके लिए केवल एक तरीका यह है कि आधुनिक ईंधन सक्षम तकनीक को अपनाया जाए. आज मुंबई, दिल्ली, चेन्नई में डीजल और पेट्रोल कारें बीएस 4 जबकि देश के बाकी हिस्सों में बीएस 3 ईंधन पर चलती हैं. वहीं, दूसरी ओर यूरोपीय संघ ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए 2009 में ही ज्यादा स्वच्छ यूरो 5 ईंधन को अपना लिया था.

इतने ज्यादा चिंताजनक प्रदूषण स्तर को देखते हुए भारत को पहले ही यूरो 5 मानक अपना लेना चाहिए था, लेकिन यह देश में उपलब्ध ही नहीं है.

आईएचएस ऑटोमोटिव के ऑटो विशेषज्ञ गौरव वंगाल कहते हैं, “हमारी औद्योगिक इकाइयों में पहले से ही विदेशी बाजार के लिए यूरो 5 ईंधन तकनीक पर आधारित वाहन निर्मित किए जा रहे हैं. लेकिन ईंधन की अनुपलब्धता के चलते कंपनियां इनको देसी बाजार में नहीं ला सकती हैं.”

हालांकि, यूरो 5 ईंधन सक्षम तकनीक पर आधारित वाहनों को लेना आसान नहीं होगा. पहली वजह कि यह बहुत ज्यादा कीमती है. इसके लिए तेल कंपनियों को करीब 80 हजार करोड़ और ऑटोमोबाइल उद्योग को करीब 40 हजार करोड़ रुपये केे निवेश की जरूरत पड़ेगी.

ग्राहक के हिसाब से देखा जाए तो इस तकनीक पर आधारित हर कार की कीमत करीब 90 हजार रुपये ज्यादा हो जाएगी.

पूरे देश में यूरो 5 मानक को लागू करने के लिए एक समय सीमा निर्धारित करने की जरूरत है

प्राइस वाटरहाउस कूपर्स में ऑटो विशेषज्ञ अब्दुल मजीद कहते हैं, “इस देश में हमने जिस प्रकार से ईंधन उत्सर्जन मानकों को लागू किया है, वो गलत है. इसपर उद्योगों और सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप किए जा रहे हैं. जिसे रोकने की जरूरत है.”

NGT Diesal car ban delhi afp.jpg

एएफपी

“पूरे देश में यूरो 5 मानक को लागू करने के लिए एक समय सीमा निर्धारित करने की जरूरत है. नहीं तो भविष्य में इस उद्योग को और ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा.”

तो क्या हमें इलेक्ट्रिक कारों को अपनाना चाहिए?

मजीद के मुताबिक, जैसे पूरी दुनिया में सरकारें शहरी प्रदूषण को कम करने का प्रयास कर रही हैं, पर्यावरण हितैषी इलेक्ट्रिक कारें बनाने वाली कंपनियों के पास बेहतरीन अवसर आ गए हैं.

आज भारत में केवल महिंद्रा एंड महिंद्रा के पास ही "रेवा” ब्रांड की इलेक्ट्रिक कार है

आज भारत में केवल महिंद्रा एंड महिंद्रा के पास ही "रेवा” ब्रांड की इलेक्ट्रिक कार है. हालांकि, पर्यावरण हितैषी तकनीक पर ज्यादा ध्यान दिए जाने के चलते इस दिशा में ज्यादा कंपनियों के आने की संभावना है.

सोसाइटी ऑफ मैन्यूफैक्चरर्स ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के कॉरपोरेट अफेयर्स डायरेक्टर सोहिंदर गिल शिकायती लहजे में कहते हैं, “देश में इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री के लिए सरकार का रवैया सहयोगी नहीं रहा है. अब जब सरकार कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए परेशान दिख रही है, हम उम्मीद करते हैं कि इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री को कुछ टैक्स छूट मिल जाए. केवल तभी ऑटोमोबाइल की दिग्गज कंपनियां भारत में इलेक्ट्रिक कारों के लिए बेहतर तकनीकी विकसित करने में निवेश के बारे में सोचेंगी.”

देश में इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री के लिए सरकार का रवैया सहयोगी नहीं रहा है

इस देश के लिए प्रदूषण नियंत्रण कभी तत्काल मुद्दा नहीं बना. लेकिन सरकार, उद्योग और उपभोक्ताओं को इसकी कीमत चुकानी होगी. सवाल उठता है कि क्या हम अपनी हवा को स्वच्छ बनाने के लिए कीमत चुकाने को तैयार हैं.

First published: 16 December 2015, 20:58 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी