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जम्मू-कश्मीरः बिजली परियोजनाओं से हो रहे मुनाफे को लेकर मनमुटाव

गौहर गिलानी | Updated on: 4 May 2016, 8:09 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर में एनएचपीसी की जलबिजली परियोजनाओं से 194 अरब रुपये का मुनाफा हुआ है. राज्य में पहले से ही पानी से बनने वाली बिजली का मुद्दा उठता रहा है.
  • राज्य के कई नागरिक संगठन, बुद्धिजीवी और नेता यहां के बिजली संयंत्रों को राज्य को सौंपने की मांग कर रहे हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ राज्य की इन संयंत्र के चलाने के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं.

कश्मीर घाटी से नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कार्पोरशन (एनएचपीसी) से पिछले 14 सालों में 194 अरब रुपये का मुनाफा हुआ है. इस खबर के आने के बाद कश्मीरियों का एक तबका एनएचपीसी की तुलना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से करने लगा है.

घाटी के लोगों को पहले से विश्वास रहा है कि "एनएचपीसी के लिए कश्मीरी पानी सोने की खदान सरीखा है." हाल ही में इस खबर के सामने आने के बाद राज्य में बिजली परियोजनाओं की वापसी की मांग उठने लगी है.

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केंद्र सरकार के अधीन एनएचपीसी के भारी मुनाफे की खबर राज्य के हर प्रमुख अंग्रेजी और उर्दू अखबार में छपी. आखिर, अचान से ये खबर आई कहां से और इसका पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार पर क्या असर हो सकता है?

एनएचपीसी को जम्मू-कश्मीर में पिछले 14 सालों में 194 अरब रुपये का मुनाफा हुआ है

राज्य की गठबंधन सरकार फिलहाल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी), श्रीनगर में छात्रों के बीच हुए विवाद और भारतीय सेना एवं जम्मू-कश्मीर पुलिस के हाथों मारे गए पांच नागरिकों से उपजे आक्रोश से घिरी हुई है.

आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने सूचना के अधिकार के तहत केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच बिजली परियोजनाओं के वापसी संबंधी पत्राचार की जानकारी मांगी थी. नायक कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) के लिए काम करते हैं.

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नायक को ये सूचना देने से यह कह कर इनकार कर दिया गया कि अभी ये मामला विचाराधीन है और इस समय जानकारी देने से एनएचपीसी के आर्थिक हितों को क्षति पहुंच सकती है.

लेकिन नायक की एक दूसरी आरटीआई के जवाब में एनएचपीसी ने मुनाफे से जुड़ी जानकारी दे दी.

ईस्ट इंडिया कंपनी का ठप्पा


एनएचपीसी लिमिटेड की स्थापना 1975 में हुई थी. जम्मू-कश्मीर में उसके अधीन सलाल-1, सलाल-2, ऊरी-1, ऊरी-2, दल हस्ती, सेवा-2, चतक और निम्मो बाजगो पावर प्लांट आते हैं. इनके अलावा किशनगंगा हाइड्रोपावर स्टेशन निर्माणाधीन है. इसके 2016 तक पूरे हो जाने की उम्मीद है.

सामाजिक कार्यकर्ता शकील कलंदर के अनुसार 1969 में जम्मू-कश्मीर सरकार और तत्कालीन जल एवं ऊर्जा मंत्रालय के बीच हुए समझौते की प्रति खो गई है.

जून 2011 में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और तत्कालीन राज्य सरकार में मंत्री ताज मोहियुद्दीन ने उस समझौते की प्रति खोजने का दावा किया. उन्होंने दावा किया कि इस समझौते के तहत सलाल बिजली संयंत्र से राज्य और केंद्र के बीच 50-50 प्रतिशत का बंटवारा होना था. फिलहाल, सलाल बिजली संयंत्र से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली मिलती है.

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मोहियुद्दीन एनएचपीसी पर ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह बरताव करने का आरोप लगाया था क्योंकि वो राज्य के ऊर्जा स्रोत का दोहन कर रही है.

मुनाफे की ताजा जानकारी के बाद एक बार फिर एनएचपीसी पर वही आरोप लगने लगे हैं.

कलंदर ने कैच से बातचीत में कहा, "कश्मीरी सिविल सोसाइटी ने ये साबित कर दिया है कि सलाल, ऊरी और दल हस्ती बिजली संयंत्र पर एनएचपीसी का नियंत्रण गैर-कानूनी और असंवैधानिक है."

कांग्रेसी नेता ताज मोहियुद्दीन ने एनएचपीसी की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की थी

श्रीनगर स्थित रिसर्च एंड डेवलपमेंट पॉलिसी (सीआरडीपी) के निदेशक सुहैल मसूदी कहते हैं कि राज्य सरकार को कड़ा फैसला लेते हुए एनएचपीसी से हाइड्रोपावर परियोजनाओं का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेना चाहिए.

मसूदी कहते हैं कि एनएचपीसी का मुद्दा केवल कश्मीरी पानी से मुनाफा कमाने तक सीमित नहीं है. वो कहते हैं, "असली बहस कश्मीरियों के विस्थापन, जीविका छीनने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की है. एनएचपीसी का परेशान करना मतलब नई दिल्ली परेशान करना है और कोई भी स्थानीय सरकार ये जोखिम नहीं उठा सकती."

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पीडीपी-बीजेपी के बीच पिछले साल हुए समझौते में दल हस्ती और ऊरी हाइड्रोपावर को राज्य सरकार को सौंपने की प्रक्रिया पर विचार करना भी था.

दोनों दलों के बीच समझौते में जम्मू-कश्मीर के पाने से एनएचपीसी को होने वाले मुनाफे में राज्य को हिस्सा देने की चर्चा की गई थी.

इस नए रहस्योद्घाटन के बाद महबूबा मुफ्ती सरकार पर इन समझौतों को अमली जामा पहनाने का दबाव बढ़ जाएगा.

कलंदर ने बताया कि कश्मीर सेंटर फॉर सोशल एंड डेवलपमेंट स्टडीज(केसीएसडीएस) ने अगले हफ्ते इस मुद्दे पर एक सम्मेलन आयोजित किया है. केसीएसडीएस के एक अहम मांग ये होगी कि राज्य के बिजली संयंत्रों को एनएचपीसी से ले लिया जाए.

विशेषज्ञों की राय अलग


कई विशेषज्ञ ऐसी मांगों पर सवाल उठा रहे हैं. पीडीपी मंत्री हसीब द्राबु के भाई इफ्तीकार द्राबु को संदेह है कि जम्मू-कश्मीर स्टेट पावर डेवलपमेंट कार्पोरेशन(जेकेएसपीडीसी) इन संयंत्रों को चलाने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम है.

ग्रेटर कश्मीर में लिखे लेख में इफ्तीखार ने इन हाइड्रो परियोजनाओ के सुदूर इलाकों में होने और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों-इंजीनियरों की कमी का मुद्दा उठाया था.

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जेकेएसपीडीसी की सीमित क्षमता की बात पर मसूदी द्राबु से सहमत हैं. वहीं कलंदर कहते हैं कि ये मुद्दा जेकेएसपीडीसी की क्षमता से ज्यादा कानून और अधिकार का है. कलंदर कहते हैं, "आजकल किसी भी परियोजना के लिए आउटसोर्सिंग की जा सकती है. मूल सवाल ये है कि एनएचपीसी राज्य के कानून का उल्लंघन कर रही है."

कश्मीर के अलगाववादी नेता भी इस मुद्दे को उठा रहे हैं. जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट(जेकेएलएफ) के नेता यासिन मलिक ने कैच से कहा, "भारत नहीं चाहता कि कश्मीर अपने पैरों पर खड़ा हो. वो एनएचपीसी जैसी कंपनियों के सहारे यहां के पानी से मुनाफा कमाता है और फिर हमें ही सब्सिडी पर चावल बेचता है."

First published: 4 May 2016, 8:09 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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