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उरी हमला: एनआईए जांच की सीमा है, आंच सिर्फ़ प्यादों तक

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 23 September 2016, 7:11 IST
QUICK PILL
  • पठानकोट के बाद उरी हमले की जांच भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई है लेकिन उरी हमले में सभी चार फिदायीन मारे जा चुके हैं और उनसे पूछताछ की गुंजाइश नहीं बची है. अगर एक भी आतंकी को ज़िंदा पकड़ने में कामयाबी मिल पाती तो मसूद अज़हर पर दबाव बनाया जा सकता था. इस लिहाज से एनआईए की जांच शुरू ही एक डेड एंड से हो रही है.
  • उरी से पहले पठानकोट हमले में जैश का नाम सामने आया था लेकिन कई कोशिशों के बावजूद मसूद अज़हर पर शिकंजा नहीं कसा जा सका. 
  • अब उसी मसूद अज़हर के फिदायीन दस्ते ने उरी में सेना पर बड़ा हमला कर दिया है लेकिन कार्रवाई के आसार इस बार भी नज़र नहीं आते. कम से कम पुराने हमलों में जुटाए गए सुबूत और सरकार की कमज़ोर कोशिशों के यही मायने निकलते हैं कि मसूद अज़हर इस बार भी बच निकलेगा.

उरी में सेना के कैंप पर हुए चरमपमंथी हमले के लिए भारत ने पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को ज़िम्मेदार ठहराया है. भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ मिलिट्री ऑपरेशन्स रणवीर सिंह ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि उरी हमले में इसी संगठन का हाथ है.

उरी समेत इस साल भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों पर हुए पांच बड़े आतंकी हमलों में कम से कम 29 जवान शहीद हुए हैं. उरी में हुआ फ़िदायीन हमला सबसे बड़ा है जिसमें 18 जवानों की जान गई.

लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन, इन्हीं तीन चरमपंथी संगठनों की भूमिका हर बड़े हमलों में उजागर होती है लेकिन इनके मुखिया बार-बार कार्रवाई से बच निकलते हैं.

उरी से पहले पठानकोट हमले में जैश का नाम सामने आया था लेकिन कई कोशिशों के बावजूद मसूद अज़हर पर शिकंजा नहीं कसा जा सका. 

इसी साल अप्रैल में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में जाकर मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने की मांग की थी लेकिन चीन ने अड़ंगा लगाकर यह कार्रवाई नहीं होने दी. 

अब उसी मसूद अज़हर के फिदायीन दस्ते ने उरी में सेना पर बड़ा हमला कर दिया है लेकिन कार्रवाई के आसार इस बार भी नज़र नहीं आते. कम से कम पुराने हमलों में जुटाए गए सुबूत और सरकार की कमज़ोर कोशिशों के यही मायने निकलते हैं कि मसूद अज़हर इस बार भी बच निकलेगा.

पठानकोट के बाद उरी हमले की जांच भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई है लेकिन उरी हमले में सभी चार फिदायीन मारे जा चुके हैं और उनसे पूछताछ की गुंजाइश नहीं बची है. अगर एक भी आतंकी को ज़िंदा पकड़ने में कामयाबी मिल पाती तो मसूद अज़हर पर दबाव बनाया जा सकता था. इस लिहाज से एनआईए की जांच शुरू ही एक डेड एंड से हो रही है.

पाकिस्तान का नहीं मिला साथ

शुरुआती सारे सबूत इशारा करते हैं कि उरी हमले के मुख्य साज़िशकर्ता पाकिस्तान में हैं लेकिन वहां जाकर संदिग्धों से पूछताछ कर पाना एनआईए के लिए लगभग नामुमकिन है. 

याद होगा कि एनआईए डायरेक्टर शरद कुमार ने पठानकोट हमले में पूछताछ करने के लिए पाकिस्तान जाने का आग्रह किया था लेकिन पाकिस्तान ने उसे खारिज कर दिया था. वह भी तब जब पाकिस्तानी दल को भारत में आकर जांच करने की छूट दी गई थी. अब उससे भी बड़ा हमला उरी के रूप में हमारे सामने है और एक नई जांच भी.

एनआईए को अगर तफ़्तीश में ठोस सुबूत हाथ लगे, तभी मसूद अज़हर को उरी हमले में आरोपी बनाया जा सकता है लेकिन जांच एजेंसियों की यह कार्रवाई भी रस्मी मालूम पड़ती है. 

हाफ़िज़ सईद, दाउद इब्राहिम समेत सभी बड़े प्लेयर पाकिस्तान में हैं. इनके ख़िलाफ़ पाकिस्तान अपने स्तर पर कोई कार्रवाई करता नहीं और अगर भारत सुबूत दे तो उसे मानता नहीं है.

एनआईए के सूत्रों की माने तो पिछले साल अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने भी सरेंडर किया था.

इनपर भारत में ढंग से मुक़दमा तभी चल सकता है, जब ये किसी एजेंसी की गिरफ़्त में आएं. मगर इस मोर्चे पर भी भारतीय एजेंसियां कमज़ोर हैं. जब 1999 में हुए कंधार विमान हाईजैक के पांच अपहरणकर्ता चंगुल में नहीं आ सके तो दो बार हुए मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड दाउद इब्राहिम और हाफिज़ सईद को पकड़ पाना काल्पनिक लगता है. 

एनआईए के सूत्रों की माने तो पिछले साल अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने भी सरेंडर किया था ना कि उसे किसी एजेंसी ने ऑपरेशन चलाकर गिरफ़्तार किया था.

समझौता एक्सप्रेस धमाके की जांच टीम के मुखिया रह चुके रिटायर्ड पुलिस अफ़सर विकास नारायण राय कहते हैं कि जांच होनी चाहिए लेकिन अब ऐसी कार्रवाइयों का ज़्यादा महत्व नहीं है. ज़्यादा से ज़्यादा इनके खि़लाफ़ ग़ैर ज़मानती वारंट निकल जाएंगे. इंटरपोल से रेड अलर्ट करवा दिया जाएगा. 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थोड़ा दबाव बनाने की कोशिश होती है लेकिन पाकिस्तान इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करता. फिर चीन सीधेतौर पर पाकिस्तान का मददगार है और अमेरिका भी आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में पाकिस्तान को अपना सहयोगी मानता है. लिहाज़ा, इनपर शिकंजा कसने के लिए जो कुछ करना है, भारतीय एजेंसियों को अपने स्तर पर ही करना होगा.

आतंकवाद के मामलों के जानकार क़मर आगा कहते हैं कि इन जांचों का यही फ़ायदा है कि हमारे स्तर पर हुई चूक का पता चल पाता है. अगली बार से इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाएगा कि आतंकियों ने कैंप पर उस वक्त हमला किया जब यूनिट बदल रही थी. 

जांच इसलिए भी ज़रूरी है कि स्लीपर सेल वग़ैरह एक्टिव हों तो उन्हें ख़त्म किया जा सके. आर्मी अपने स्तर पर भी जांच कर रही होगी कि कहीं किसी इनसाइडर ने तो सूचनाएं आगे नहीं बढ़ाईं?

पठानकोट जांच के निष्कर्ष

पठानकोट हमले में पाकिस्तानी जांच दल ने कहा था कि इसमें पाकिस्तान या उसकी किसी एजेंसी की कोई भूमिका नहीं है. 

मगर क़मर आग़ा कहते हैं कि उरी में सेना के कैंप पर इतना बड़ा हमला बिना किसी ख़ुफिया एजेंसी की मदद के मुमकिन नहीं है. जांच इस तथ्य को ध्यान में रखकर होनी चाहिए. दोनों ही हमलों में प्रशिक्षण, हथियार, जीपीएस सिस्टम और मैप पर पाकिस्तानी मिलिट्री एम्युनेशन की मार्किंग मिली है.

पठानकोट हमले की जांच का कुल जमा निचोड़ यह है कि उसके जुटाए गए सुबूतों के आधार पाकिस्तान में एफआईआर दर्ज करके तीन मुलज़िमों ख़ालिद महमूद, इर्शादुल हक़ और मोहम्मद शोएब को फरवरी में गिरफ़्तार किया गया लेकिन जांच की आंच इनके आका मसूद अज़हर या उसके ख़ास सिपहसालारों को छू भी नहीं सकी और उन्होंने एक नया और उससे भी बड़ा हमला कर दिया. यह उनके मनोबल को दर्शाता है.

क्या ऐसे हमलों को टाला जा सकता है? मिलिट्री इंटलिजेंस में एक अफ़सर बताते हैं कि भौगोलिक स्तर पर उरी का इलाक़ा थोड़ा मुश्किल है. 

ज़रा-सी चूक या मौक़ा मिलने पर आतंकी घुसपैठ की कोशिश करते हैं लेकिन यहां मामला सिर्फ घुसने का नहीं है. सेना के कैंप पर हमला किसी इनसाइडर या पाकिस्तानी एजेंसी के इनपुट के बाद ही मुमकिन है, एजेंसियां ज़रूर इस पहलू पर भी जांच कर रही होंगी.

First published: 23 September 2016, 7:11 IST
 
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