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रोहिणी सैलियन: एनआईए की चार्जशीट उनकी राय है, अदालत का फैसला नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर  2008 को हुए बम धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई थी जबकि 101 घायल हो गए थे. इस मामले में एनआईए ने मुंबई की विशेष अदालत में एक पूरक चार्जशीट दायर कर मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा का नाम हटाने के साथ ही पांच अन्य अभियुक्तों का नाम भी हटाते हुए इन सभी को मकोका से बरी करने की सिफारिश की है.

लेकिन इस मामले में पूर्व विशेष सरकारी वकील रोहिणी सैलियन नेे इस चार्जशीट में कुछ सवाल उठाए हैं. रोहिणी के मुताबिक एनआईए चार्जशीट केवल राष्ट्रीय जांच एजेंसी की राय भर है और यह अदालत पर निर्भर करता है कि वो इस राय को मानें या नहीं.

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इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में सैलियन ने कहा, "एनआईए ने जो चार्जशीट दायर की है वो केवल उनकी राय है कोई फैसला नहीं. फैसला अदालत को सुनाना है जो पहले और अब पेश किए गए सबूतों के आधार पर लिया जाएगा. उन्हें पहले एटीएस द्वारा दायर चार्जशीट और अब एनआईए द्वारा पेश की गई चार्जशीट को मिलाकर देखने के बाद अपने स्वयं के, स्वतंत्र आकलन के आधार पर निष्कर्ष निकालना होगा."

पूरक चार्जशीट में एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और पांच अन्य के खिलाफ आरोप हटा दिए हैं. जांच एजेंसी द्वारा कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत 10 अन्य आरोपियों के खिलाफ भी मकोका कानून के तहत लगी धाराएं हटा दी गई हैं.

सैलियन ने इस मामले में 24 जून 2015 को विरोध जताते हुए इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि एक विशेष सरकारी वकील के रूप में केंद्र में आई नई सरकार के बाद से उनपर एनआईए का भारी दबाव था कि आरोपियों के साथ नरमी से पेश आएं. अक्तूबर में उन्हें मामले के वकील से हटाए जाने के बाद उन्होंने एनआईए अधिकारी का नाम बताया जिन्होंने उनसे संपर्क किया था.

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उन्होंने कहा, "पहले दायर की गई 5,000 पन्नों  की चार्जशीट का क्या जिसमें फोन कॉलों और लैपटॉप से मिले सबूत शामिल थे? 2009 में एटीएस द्वारा दायर की गई चार्जशीट के हिसाब से ही मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. अब एनआईए कुछ और कह रही है. लेकिन वे एटीएस पर कोई फैसला नहीं दे सकते, वे एटीएस की जांच नहीं कर रहे हैं, क्या वाकई? उन्हें कानून के तरह काम करने और देश में मौजूद सीआरपीएसी की धाराओं के तहत काम करने की जरूरत है. अदालत के पास ही केवल सभी पक्षों से प्राप्त सबूतों के आधार पर फैसला सुनाने का अधिकार है."

First published: 14 May 2016, 2:32 IST
 
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