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निर्भया गैंगरेपः ज्योति की मां ने कहा, 'मुझे लंबी लड़ाई लड़नी है'

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 December 2015, 20:35 IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्भया कांड के सजायाफ्ता नाबालिग की रिहाई पर रोक से इनकार कर दिया है. सर्वोच्च अदालत ने गैंगरेप के नाबालिग दोषी की रिहाई के खिलाफ दायर दिल्ली महिला आयोग की याचिका को खारिज करते हुए साफ कर दिया नाबालिग को रोकने का अधिकार कानून के तहत नहीं है. 

अदालत ने कहा कि कानून के तहत दी गई तीन साल की सजा के बाद रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. इस आदेश के बाद निर्भया की मां आशा देवी रो पड़ीं और उन्होंने कहा कि मैं हारूंगी नहीं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुझे रोक नहीं सकता. मुझे एक लंबी लड़ाई लड़नी है. 

उन्होंने कहा कि मुझे पता था यही होगा. भारत में कभी कानून नहीं बदलेगा और महिलाओं को कभी इंसाफ नहीं मिलेगा. कानून में बदलाव के लड़ाई लड़ती रहूंगी. निर्भया मामले से सबक न लेना दुर्भाग्य है. अदालत का कहना है कि कानून किसी किशोर के लिए आगे की सजा की इजाजत नहीं देता, लेकिन अन्य दोषियों के खिलाफ अभी भी मामला लंबित क्यों है. अभी तक उन्हें फांसी क्यों नहीं दी गई. 

अदालत ने कहा कि कानून के तहत दी गई तीन साल की सजा के बाद रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा

निर्भया के पिता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय हमारे पक्ष में फैसला सुनाएगा हमें इस बात की बहुत उम्मीद नहीं थी. लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि देश में मौजूदा कानून में बदलाव के लिए कितनी निर्भयाओं की जरूरत होगी. अदालत को जनता की चिंताओं की कोई परवाह नहीं है. यह लड़ाई केवल निर्भया के लिए नहीं बल्कि एक देश में असुरक्षित उन सभी लड़कियों के लिए हैं जहां इस तरह के कानून हैं.

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 16 दिसंबर गैंगरेप मामले के दोषी किशोर की रिहाई के खिलाफ दिल्ली महिला आयोग की अपील ठुकरा दी थी. अदालत ने कहा था कि इस संबंध में स्पष्ट विधायी मंजूरी होनी चाहिए. न्यायमूर्ति एके गोयल और यूयू ललित की पीठ ने कहा कि अगर कुछ किया जाना है तो यह कानून के अनुसार होगा. हमें कानून लागू करना है. 

पीठ ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल द्वारा किए गए आग्रह पर सुनवाई से इनकार करते हुए इस तर्क से असहमति जताई कि किशोर अपराधी को किशोर कानून के तहत दो साल या अधिक अवधि तक सुधार की अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजारा जा सकता है.

निर्भया गैंगरेप के नाबालिग दोषी की तीन साल की सज़ा 20 दिसंबर को पूरी हुई

पीठ ने कहा कि क्या हम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए किसी के जीवन की गारंटी के अधिकार को नहीं छीन रहे हैं. इसके लिए कानून में कुछ नहीं है. 

वहीं, स्वाति मालीवाल ने कहा कि मामले की सुनवाई करीब आधा तक चली. कोर्ट ने कहा कि हम आपकी चिंता से पूरी तरह वाकिफ हैं. लेकिन कानून इतना कमजोर है कि हम आपकी मदद नहीं कर सकते. यह देश  के लिए काला दिन है. 

मामले की असली जड़


इस मामले की असल जड़ गैंगरेप के मामले में गिरफ्तारी के वक्त एक आरोपी की उम्र 18 वर्ष से कम होना है.

दोषी साबित होने के बाद किशोर न्याय अधिनियम के तहत सुनवाई कर कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक अधिकतम तीन वर्षों के लिए एक सुधार गृह में रखा गया. रविवार को रिहाई के बाद उसे एक गैर सरकारी संगठन के पास भेज दिया गया. 

First published: 21 December 2015, 20:35 IST
 
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