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वो जीना चाहती थी और मैं भी चाहता हूं कि वो जिंदा रहे

हर्षवर्धन त्रिपाठी | Updated on: 17 December 2015, 19:56 IST

अब धीरे-धीरे उस लड़की की कहानियां दबे-छिपे लोगों के सामने आ रही है. दरअसल ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर कोई जानना चाहता है. सुनना चाहता है. उस दर्द से दोबारा कोई न गुजरे ऐसा इस देश में ही नहीं दुनिया चाहने वाले लगभग पूरे ही हैं. वो, लड़की एक ऐसी कहानी बन गई है जिसक चर्चा, बातचीत हर कोई कर रहा है लेकिन, सच्चाई ये है कि बातचीत हम उसकी तो, कर रहे हैं. उसे जिंदा रखने की कसमें खा रहे हैं. उसके मरने से पूरे समाज के जिंदा होने की आशा भी जगा चुके हैं. 

 अजीब टाइप के प्रतीकों के जरिए उसकी पहचान बनी हुई है. कोई उसे दामिनी कह रहा है तो, कोई निर्भय, वेदना या जाने क्या-क्या

मैं ये दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि उसकी असल पहचान किसी को नहीं पता. अजीब टाइप के प्रतीकों के जरिए उसकी पहचान बनी हुई है. कोई उसे दामिनी कह रहा है तो, कोई निर्भय, वेदना या जाने क्या-क्या. अब सवाल यही है कि जिसके नाम पर सारा देश जग गया है. उसको हम मारने पर तुले हुए हैं. हम पता नहीं किस वजह से उसकी पहचान खत्म करने पर तुले हुए हैं.

टीवी संपादकों की संस्था ब्रॉकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (BEA) ने सहमति बनाई कि हम उस सामूहिक दुष्कर्म की शिकार लड़की की निजी स्वतंत्रता को बचाए रखेंगे. और, इसके लिए उन्होंने ये तय किया कि जंतर-मंतर  और देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले आंदोलनों को तो, दिखाएंगे लेकिन, उस लड़की के नाम, चेहरे को लोगों के सामने नहीं लाएंगे. 

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उस लड़की के परिवार के लोगों की पहचान नहीं दिखाएंगे. ये सहमति उनके अतिपरिपक्व पत्रकार मन को शायद ठीक लगती होगी. लेकिन, मैं जब अपने मन को टटोलता हूं तो, मुझे लगता है कि ऐसा करना दरअसल उस लड़की की निजी जिंदगी में दखल देने से कहीं ज्यादा ये लगता है कि सरकार के स्थायित्व पर ज्यादा टकराहट न हो. लगभग सारे न्यूज चैनलों, अखबारों ने अपने हिसाब से उसका कुछ नाम रख लिया है और देश की जनता से अपील कुछ इस अंदाज में कर रहे हैं कि सरकारी दूरदर्शन भी उनके सामने पानी भरता दिखे. 

सवाल यही है कि वो, क्या चाह रहे हैं कि देश एक ऐसी घटना के नाम पर जो, जागा है वो, फिर सो जाए. बल्कि मुझे तो लगता है कि सरकारी उदारवाद की नीति से घुटता वर्ग जो, यथास्थिति वादी हो चुका था. जो, जागा था लेकिन, आंख बंदकर सोए होने का नाटक कर रहा था सिर्फ इस बेवजह की उम्मीद में बुरी घटनाएं सिर्फ बगल से छूकर खबरों में आकर निकल जाएंगी. 

Rape protest_Saarthak Aurora/ Hindustan Times via Getty Images

इस घटना ने उसे डराया है. और, इस डर ने उसे ‘निर्भय’ होने का एक मंत्र दे दिया है लेकिन, ये निर्भय मंत्र आखिर कब तक काम आएगा. जिस लड़की की ‘शहादत’ के बाद देश में ऐसा करने वालों के खिलाफ एक ऐसा माहौल बना है जो, सीधे और तुरंत कार्रवाई की स्थिति पैदा कर रहा है. उसी लड़की की पहचान हम क्यों मारने पर तुले हैं.

ये कहानियां आनी शुरू हो चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गांव से वो लड़की देश की राजधानी आई थी. उस लड़की के पिता के साक्षात्कार नाम बिना बताए अखबारों में छप चुके हैं. पिता ये बता चुका है कि उस लड़की की पढ़ाई के लिए उसने खेत बेच दिया. 

क्या अभी भी उसके साथ हुआ दुष्कर्म उसके मां-बाप, भाई-बहन के माथे पर कलंक जैसा है

छोटे भाइयों को पढ़ाना उस लड़की का सबसे बड़ा सपना था. इस सबकी बात हो रही है लेकिन, जो असल वजह है इन सब बातों की यानी वो लड़की. उसकी पहचान या कहें उसे जिंदा रखने से हम डर रहे हैं. क्या अभी भी उसके साथ हुआ दुष्कर्म उसके मां-बाप, भाई-बहन के माथे पर कलंक जैसा है. आखिर क्यों हम डर रहे हैं उसकी पहचान जाहिर करने से. 

आखिर क्यों उस लड़की का चेहरा इस देश की सारी लड़कियों के लिए संबल, ताकत नहीं बन सकता. क्यों उस लड़की का नाम इस देश में महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह के अपराध के खिलाफ एक हथियार नहीं बन सकता. पाकिस्तानी मलाला को तालिबानियों ने गोली मार दी थी.

वो, लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा उठा रही थी. एक तालिबानी सोच ने उस लड़की को खत्म करना चाहा. ईश्वरीय ताकत या प्रकृति जिसे भी मान लें उसने मलाला को तालिबानी सोच के खिलाफ जिंदा रखा. आज वो, दुनिया में महिलाओं की ताकत और तालिबानी सोच के खिलाफ एक बहुत बड़ी पहचान बन चुकी है. फिर हमारी ये बहादुर लड़की दिल्ली ब्रेवहर्ट के प्रतीक नाम से ही क्यों नहीं जानी जा सकती.

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सारी बात तो, सोच बदलने की ही है. अगर दुष्कर्म की शिकार लड़के प्रति नाम छिपाने की सोच इस समाज में जिंदा है तो, उससे दुष्कर्म करने वालों को तो ऑक्सीजन मिलती ही रहेगी. फिर कैसे दुष्कर्म की शिकार कोई लड़की पूरी ताकत से दुष्कर्म करने वालों को दुष्कर्म साबित कर सकेगी. 

क्यों आखिर कोई लड़की उस तरह से अपनी चोट से उबर नहीं सकती, अपने सामाजिक अपमान से उबरने का काम नहीं कर सकती जैसे किसी को भी सरेआम पीटा जाता है, हत्या की कोशिश की जाती है या फिर हत्या ही कर दी जाती है. लेकिन, हम सोच बदलने के बजाए सारी ताकत इस बात पर लगा रहे हैं कि उसकी पहचान न जाहिर हो. फिर सोच कैसे बदलेगी. 

अगर सोच बदलने के इस देश के सबसे बड़े आंदोलन की वजह बनी उस लड़की की मौत के बाद हम, हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज उसकी पहचान को भी मार देना चाह रहे हैं. काफी हद तक मार भी दिया है. अभी आंदोलन जल रहा है. कुछ-कुछ लोग जंतर-मंतर पर अभी जुटे हैं. कड़ाके की सर्दी में भी लोग उस लड़की पहचान जिंदा रखने के लिए जुट रहे हैं. 

उसकी पहचान जगजाहिर न होने देना ही उसके प्रति असली श्रद्धांजलि है

लेकिन, मीडिया (पत्रकारिता) और मंत्री (सरकार) तो, तय कर चुके हैं कि उसकी पहचान जगजाहिर न होने देना ही उसके प्रति असली श्रद्धांजलि है. लेकिन, मुझे लगता है कि इन सारे लोगों की उसकी इच्छा की दरअसल कोई फिक्र नहीं है या ये कहें कि वो, इससे अनजान हैं. अब सोचिए कि जो लड़की अपने सबसे बुरे हाल में भी जीना चाहती थी. 

उसे हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज - मार देना चाह रहे हैं. वो, जिंदा रहना चाहती थी. और, मैं भी चाहता हूं कि वो, जिंदा रहे. किसी भी स्वस्थ समाज के लिए ये जरूरी है कि वो, अपनी बुराइयों को दूर करे. और, किसी बुराई के शिकार को समाज में सम्मान से जीने का मौका दे. 

दुष्कर्म के मामले में हमारे समाज की गिरी सोच की वजह से उसकी शिकार लड़की पहचान छिपाने की पारंपरिक समझ पत्रकारिता, सरकार और समाज को है. लेकिन, ये समझने की जरूरत है कि अगर हम इस पारंपरिक समझ को बदल नहीं सके तो, समाज कहां से बदलेगा और दुष्कर्म कैसे रुकेंगे. 

मैं सरकार से अपील करता हूं कि दुष्कर्म की शिकार उस लड़की के असल चेहरे को सबके सामने लाए और उसे इस देश में महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बनाए. सरकार जिस हाल में है और जो कर रही है वो, सबके सामने है. मैं तो मानता हूं कि स्थिति ऐसी हो गई है कि देश में सरकार है ऐसा अहसास ही नहीं होता. 

फिर सरकार ये क्यों नहीं करती कि उसे महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बना दे

फिर सरकार ये क्यों नहीं करती कि उसे महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बना दे. उसके नाम से दुष्कर्मियों या महिलाओं के खिलाफ अपराध पर ऐसी सजा का एलान करे कि वो, जिंदा रहे. मरने के बाद भी जिंदा रहे. क्यों नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ में ये प्रस्ताव भारत सरकार की तरफ से जाए कि हम जाग गए हैं दुनिया को जगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ उसे अपना ब्रांड अबैसडर बनाए. 

दुष्कर्मियों के वहशीपन के बाद वो जिस हाल में थी उसमें वो, जिंदा भी रहती तो, शायद इसी मकसद से कि दुष्कर्म करने की दोबारा कोई सोच न सके. फिर उसे क्यों मारने पर तुले हैं हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज.

First published: 17 December 2015, 19:56 IST
 
हर्षवर्धन त्रिपाठी @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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