Home » इंडिया » Catch Hindi: Niti Aayog is working on a vision document for Public Health
 

नीति आयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में करना चाहता है आमूलचूल बदलाव

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 8 July 2016, 7:59 IST
(कैच)

नीति आयोग देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाने वाला विजन डाक्यूमेंट तैयार कर रहा है. फिलहाल देश में 2002 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लागू है जो 1983 की स्वास्थ्य नीति का संशोधित रूप है. अभी तक भारत में दो स्वास्थ्य नीतियां ही लागू हो सकी हैं.

नई योजना का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि चौदहवें वित्त आयोग की अनुशंसा में स्वास्थ्य मामलों में केंद्र की हिस्सेदारी बढ़ गई है.

नीति आयोग ने अभी इस नीति के मसौदा सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन अप्रैल में हुई एक बैठक में आयोग ने प्राथमिक चिकित्सा सेवा को निजी डॉक्टरों को सौंपने और दूसरे स्तर की चिकित्सा सेवा के लिए सरकारी तथा निजी अस्पतालों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की बात कही.

नीति आयोग की नीति में बदलाव कर सकते हैं मोदी

प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में आम तौर पर एक डॉक्टर होते हैं और वहां मामूली सर्जरी इत्यादि हो सकती है. दूसरे स्तर के चिकित्सा सेवा केंद्र में विशेषज्ञ डाक्टर उपलब्ध रहते हैं.

माना जा रहा है कि ये नीति ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की तर्ज पर बनाई गई है. ब्रिटेन में इस नीति के तहत साल-दर-साल जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं में सरकार की भूमिका सीमित होती गई.

हालांकि कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ ब्रिटेन की स्वास्थ्य नीति की नकल पर नीति बनाने की आलोचना कर चुके हैं.

प्रस्ताव

नीति आयोग की बैठक में रखे गए कई सुझाव आकर्षक प्रतीत होते हैं, मसलन, एक सुझाव ये था कि ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों को फेमिली फिजिशियन के रूप में प्रशिक्षित किया जाए और वो जिन मरीजों का इलाज करें उनका खर्च सरकार उठाए.

हर जिले में कई फैमिली डॉक्टर होंगे और मरीज उनमें से अपनी पसंद का डॉक्टर चुन सकेंगे. साथ ही डॉक्टरों का प्रमोशन भी उनसे जुड़े मरीजों की संख्या के आधार पर किया जाएगा. 

स्वास्थ्य मंत्रालय ने 344 दवाओं को प्रतिबंधित किया

नीति आयोग ने तीन स्तरीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा बनाने के प्रस्ताव दिया है

इस बैठक में सरकार द्वारा सहायता प्राप्त प्रयोगशालाएं और सभी प्राथमिक केंद्रों पर मुफ्त दवाएं देने के प्रस्ताव पर भी विचार हुआ.

दूसरे स्तर के चिकित्सा केंद्रों, चाहे वो सरकारी हों या प्राइवेट, को सरकार विशेष मदद देगी. मरीजों को सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में से जिसे चाहे उसे चुनने की आजादी रहेगी. इस प्रस्ताव के अनुसार जो केंद्र (सरकारी या प्राइवेट) ज्यादा अच्छी सुविधा देंगे उन्हें सरकार ज्यादा मदद देगी.

अप्रैल की बैठक में शामिल सुरेंद्र श्रीवास्तव लोकसत्ता आंदोलन से जुड़े रहे हैं. श्रीवास्तव ने बताया कि इस नीति में ऊंची फीस लेने वाले कार्पोरेट अस्पतालों को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा. 

नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित तीन स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था में सरकारी अस्पतालों के अलावा कम खर्च वाले निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाएगा, मसलन विभिन्न एनजीओ या मिशनरी संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले अस्पताल.

राह में रोड़े

नीति आयोग की नई नीति को अमली जामा पहनना आसान नहीं होगा. साल 2015 में नीति आयोग ने स्वास्थ्य मंत्रालय को एक खत लिखकर आम स्वास्थ्य सेवाओं और मुफ्त दवा तथा जांच पर निवेश बढ़ाने पर आपत्ति की थी. बीजेपी गठबंधन की सरकार की 2014 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) में ये सुझाव दिए गए थे.

एनएचपी की स्टीयरिंग कमिटी और नीति आयोग के प्रस्ताव के बीच मतभेद दूर हुए बिना बात आगे नहीं बढ़ेगी

एनएचपी 2014 पर स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों ने सकारात्मक प्रक्रिया दी थी लेकिन वो अधर में ही लटका रहा.

रिपोर्ट के अनुसार दूसरे विकासशील देशों से तुलना की जाए तो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत काफी पीछे है. इसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य की कमियों को दूर करने के लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी की पैरवी की गई थी.

नीति आयोग ने अपने पत्र में कहा कि एनएचपी 2014 से स्वास्थ्य क्षेत्र बुनियादी तौर पर प्राइवेट सेक्टर पर निर्भर हो जाएगा. 

मध्य प्रदेश: स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकार चली निजीकरण की राह

12वीं पंचवर्षीय योजना में सभी के लिए बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा का लक्ष्य रखा गया था. स्वास्थ्य राज्य का विषय है इसलिए केंद्र की स्वास्थ्य योजनाओं में सबसे बड़ी दिक्कत राज्य और केंद्र के बीच सहमति की होती है. नीति आयोग द्वारा तैयार किए जा रही नीति में भी यही दिक्कत आ सकती है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पर एनएचए की स्टीयरिंग कमिटी और नीति आयोग के प्रस्ताव में जो अंतर है फिलहाल वो अंतिम नीति तय करने की राह में बड़ा रोड़ा है. और जब तक ये रोड़ा दूर नहीं होता सभी के लिए बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा का लक्ष्य पूरा करने की तरफ कदम बढ़ाना संभव नहीं.

First published: 8 July 2016, 7:59 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

पिछली कहानी
अगली कहानी