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जेडीयू में नीतीश की ताजपोशी और एक दुर्लभ अच्छाई का अंत!

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • नीतीश के अध्यक्ष बनने का फैसला उस सूरत में काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब पार्टी विभिन्न राज्यों \r\nमें प्रभावी कई छोटे दलों को साथ लेकर एक मोर्चा तैयार करने के प्रयासों \r\nमें लगी हुई है.
  • लेकिन इस फैसले से नीतीश कुमार और जेडीयू भी राजद और उसके सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की तरह एक दूसरे के पर्यायवाची बन जाएंगे.

जनता दल यूनाइटेड ने रविवार को अपनी एक ऐसी खासियत को तिलांजलि दे दी जो अब तक इस पार्टी को दूसरे क्षेत्रीय दलों से अलग करती थी.

सपा, बसपा, डीएमके, एआईडीएमके, बीजेडी, एआईटीसी, जेएमएम और ऐसे कई दूसरे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विपरीत जेडीयू एक ऐसी दुर्लभ क्षेत्रीय पार्टी है जिसमें राष्ट्रीय कद वाले एक से अधिक नेता नेता हैं, वे एक-दूसरे से किसी निजी रिश्ते में जुड़े नहीं रहे हैं और पार्टी के भीतर सत्ता के विभिन्न पदों पर आसीन रह चुके हैं.

शरद यादव के पार्टी अध्यक्ष पद से हटने और नीतीश कुमार के इस पद पर विराजमान होने के साथ ही पार्टी की यह विशेषता अब बीते समय की बात हो गई है.

नई दिल्ली में रविवार को हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने अपना इस्तीफा सौंपा और साथ ही नीतीश कुमार का नाम अगले अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित किया. कार्यकारिणी ने इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया. नीतीश कुमार ने पार्टी के पैसले को स्वीकार करते हुए कहा कि वे इस जिम्मेदारी से अभिभूत हैं.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने आज सर्वसम्मति से फैसला किया कि अब जेडीयू की कमान नीतीश कुमार के हाथों में होगी

पार्टी अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री की दोहरी भूमिका निभाने जा रहे नीतीश कुमार अब पार्टी से जुड़े तमाम फैसलों और निर्णयों पर अपना पूरा नियंत्रण रखेंगे.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो पार्टी की नीतियों और गठबंधनों को लेकर होने वाले तमाम महत्वपूर्ण निर्णय अब उनके हाथों में होंगे.

यह फैसला उस सूरत में काफी महत्वपूर्ण हो जाता है जब पार्टी विभिन्न राज्यों में प्रभावी कई छोटे दलों को साथ लेकर एक मोर्चा तैयार करने के प्रयासों में लगी हुई है. यह बाहर से देखने में भले ही छोटा लगे लेकिन बाहर से देखने में काफी बड़ा महसूस होगा.

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नीतीश कुमार अब तक जिन भी राजनीतिक संगठनों का हिस्सा रहे हैं, वे उनका प्रमुख चेहरा रहे हैं फिर चाहे वह जेडीयू हो, जनता दल हो या समता पार्टी.

हालांकि वे कभी भी अपने दल का अध्यक्ष बनने में सफल नहीं हुए और इस प्रकार वे पहली बार इस पद को संभालेंगे. कैच ने इस घटना के निहितार्थ को समझने के लिये तमाम राजनीतिक पर्यवेक्षकों से बातचीत की.

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, 'यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कुमार अब राष्ट्रीय फलक पर अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं. यह पहल ऐसे समय में हुई है जब चर्चा यह है कि रालोद और जेवीएम (पी) जैसे दल जेडीयू के साथ विलय करने जा रहे हैं.' 

सुमन का कहना है कि पार्टी से संबंधित तमाम फैसलों में अब कुमार का निर्णय अंतिम होता है और इस विस्तार के होने से पहले उन्हें पूर्ण अधिकार अपने हाथ में चाहिये थे.'

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हालांकि सुमन इस फैसले के दूसरे पहलू पर भी नजर रखे हुए हैं. वे कहते हैं कि ढांचे के मामले में उनकी पार्टी भी अब सहयोगी राजद की तरह ही हो गई है और अब वह क्षण दूर नहीं है जब नीतीश कुमार और जेडीयू भी राजद और उसके सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की तरह एक दूसरे के पर्यायवाची बन जाएंगे.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उनकी ‘राष्ट्रीय भूमिका’ की बात से ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखते हैं. उनका मानना है कि नीतीश के भीतर इतनी क्षमता हमेशा से मौजूद थी कि वे बिना पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए भी अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का प्रदर्शन कर सकते थे.

उनके अनुसार इस कदम के जरिए पार्टी नीतीश कुमार के ऊपर और अधिक निर्भर होकर केंद्रीयकृत हो जाएगी जो कि हमेशा से पार्टी का एक प्रमुख चेहरा रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक विनोद अनुपम का मानना है कि यह बेहद जरूरी कदम था क्योंकि जेडीयू को अब एक पार्टी के रूप में खुद को विकास का पर्याय दिखाने के लिये एक ऐसे मोर्चे को तैयार करने की जरूरत है जो एनडीए को चुनौती देने में सक्षम हो. वह मानते हैं कि नीतीश की अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी उनकी और पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का स्पष्ट संकेत हैं.

नीतीश की अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी उनकी और पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का स्पष्ट संकेत हैं

पटना के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर पार्टी के इस कदम के पीछे दोहरा उद्देश्य देख रहे हैं- पहला तो पार्टी का विस्तार और दूसरा पार्टी से जुड़े तमाम मामलों और फैसलों में नीतीश का एकाधिकार.

उनका कहना है कि ऐसा करना पहले से ही कुमार के राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर की भविष्य की योजनाओं में शामिल था.

पढ़ें: शरद यादव की विदाई और नीतीश कुमार की निष्कंटक राह

जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 23 और 24 अप्रैल को पटना में आयोजित होगी जिसमें कुमार की ताजपोशी की आधिकारिक घोषणा होगी. इसके बाद सबकी नजरें प्रस्तावित विलय की घोषणाओं पर भी लगी रहेंगी.

नीतीश कुमार ने कभी इन बातों का खंडन करने का प्रयास नहीं किया है कि इन तमाम प्रयासों के माध्यम से वे केंद्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये एक चुनौती के रूप में खुद को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं. उनका पार्टी में शीर्ष पद पर आसीन होना भी उसी दिशा में बढ़ाए गए एक और कदम के रूप में देखा जा रहा है.

हालांकि आने वाले दिनों मे संभावित कड़ी स्पर्धा को देखते हुए नीतीश कुमार के लिये स्थिति थोड़ी मुश्किल भी हो सकती है. भविष्य में कम से कम दो नेता जरूर उन्हें कड़ी चुनौती देंगे. एक हैं कांग्रेेस के राजकुमार राहुल गांधी और दूसरे आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल.

जिस तरीके से यह दोनों ही नेता स्वयं को इस तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं आने वाले दिनों में ये उनके लिये सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी बनकर सामने आएंगे.

First published: 11 April 2016, 2:15 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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