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नीतीश कुमार की भटकन: सम्राट अशोक से शराबबंदी तक

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • नीतीश ने दो ऐसे फैसले किए हैं जो उनकी गले की हड्डी बनते जा रहे हैं. एक फैसला शराबबंदी का और दूसरा फैसला चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्मदिन को खोज निकालने और उसे सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का
  • नीतीश को इस बात का अहसास है कि उनकी आगे की राह कठिन है. वो हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं और यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने काम के आधार पर वोट मांगा था और काम ही कर रहे हैं.

बात बिहार चुनाव परिणाम के बाद की है. सभी लोग लालू-नीतीश की जोड़ी की जीत और भाजपा-एनडीए की बुरी हार के विश्लेषण में लगे हुए थे. तब भाकपा माले की तीन सीटों पर जीत की कोई खास चर्चा नहीं कर रहा था. भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य बार-बार एक बात दुहरा रहे थे कि यह नीतीश-लालू की जीत से ज्यादा जनता द्वारा भाजपा को नकारने का परिणाम है.

दीपंकर का कहना था कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में जो सरकार बन रही है, वह नयी सरकार नहीं होगी. हम यही मानकर चलेंगे कि नीतीश कुमार सत्ता के 11वें साल में हैं और लालू प्रसाद यादव की पार्टी शासन के 16वें साल मंे. इसलिए इस सरकार को संभलने या नए सिरे से नीति तय करने का समय देने का औचित्य नहीं है. जनता ने हमें जितनी ताकत दी उतना भर प्रतिरोध हम करेंगे.

दीपंकर की बातों में सच्चाई का अहसास नीतीश कुमार को भी है कि चुनावी नतीजे उनकी जीत से ज्यादा भाजपा हराओ अभियान के फलस्वरूप आया है. इसकी एक बड़ी वजह केंद्र की भाजपा सरकार को जनता से मिले भारी जनादेश के बावजूद जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरना है.

नीतीश को इस बात का अहसास है, इसकी झलक पहले दिन से उनके कामकाज में दिख रही है. वे हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं और यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने काम के आधार पर वोट मांगा था और काम ही कर रहे हैं.

बिहार में पारंपरिक तौर पर हर बात का राजनीतिक विश्लेषण होता है लिहाजा नीतीश कुमार के इस बदले हुए रूप का भी राजनीतिक विश्लेषण जारी है. कुछ जानकार मानते हैं कि वर्षों बाद नीतीश कुमार इतने सक्रिय दिख रहे हैं. जानकार इसके पीछे कुछ ठोस वजहें देख रहे हैं. नीतीश कुमार की यह जीत पिछली बार की तुलना में छोटी है. 2010 के चुनाव में उन्हें भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर भारी जीत मिली थी. इस बार वे लालू प्रसाद के साथ थे पर उनकी जीत छोटी रही.

जदयू के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि जब पिछली बार मिली अच्छी खासी जीत को दांव पर लगाकर नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया था तो इस बार तो साथ लालू प्रसाद ही हैं. दोनों दलों के बीच टकराव की संभावना हमेशा रहेगी. तब नीतीश कुमार के पास एक ही वकल्प होगा, एकला चलो का. इसके लिए जरूरी है कि वे पहले दिन से ही अपनी बुनियाद मजबूत करें, जनता के मन मंे अपनी जगह बनायें. इसी कोशिश में वे दिख रहे हैं.

नीतीश कुमार की सक्रियता को पिछले कुछ दिनों से पटना में जारी समीक्षा बैठकों से भी समझा जा सकता है. वो हर विभाग के मंत्री के साथ, प्रधान सचिव के साथ बैठक रहे हैं, योजनाओं का खाका तैयार कर रहे हैं, नये फैसले ले रहे हैं और अगले पांच सालों तक बिहार के विकास की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं. सिर्फ समीक्षा नहीं कर रहे हैं बल्कि लोगों को टाइम बाउंड टास्क सौंप रहे हैं.

पटना में राज्य का पहला वेटनरी विश्वविद्यालय, रिवर स्टडी सेंटर, पांच मेडिकल काॅलेज, पाटलीपुत्र स्कूल आॅफ इकोलनाॅमिक्स, कई सेंटर आॅफ एक्सिलेंस, हर घर में शौचालय और हर गांव में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का एलान करना ये सब उनके एक महीने के कार्यकाल की सूची है.

समीक्षा करने, योजना बनाने और घोषणाएं करने का यह क्रम 29 दिसंबर तक चलेगा. उनकी समीक्षा बैठकों से बिहार में परसेप्शन के लेवल पर ही सही, माहौल बदला है

यह सूची आगे और लंबी होती जाती है. पंचायत स्तर तक राज्य सरकार के उपक्रम सुधा दूध को उपलब्ध करवाने का एलान करना, शराबबंदी का एलान करना, बारहवीं, कक्षा के बाद विद्यार्थियों को क्रेडिट कार्ड देने का एलान करना उनकी प्रमुख घोषणाओं में शामिल रहा है.

समीक्षा करने, योजना बनाने और घोषणाएं करने का यह क्रम 29 दिसंबर तक चलेगा. उनकी समीक्षा बैठकों से बिहार में परसेप्शन के लेवल पर ही सही, माहौल बदला है. चुनाव के पहले या चुनाव परिणाम के तुरंत बाद भी जिस तरह से जातीय तनाव का माहौल था, वह खत्म होने की राह पर है.

चुनाव के बाद लालू प्रसाद यादव के बेटों को महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बनाये जाने को लेकर जो मजाकिया माहौल बना था वह भी अब कहीं चर्चा में नहीं है. नीतीश खुद को आगे कर, इस तरह की आशंकाओं को खारिज कर रहे हैं.

यहां तक तो सब ठीक है लेकिन एक पखवाड़े तक चलने वाली समीक्षा बैठक और नित्य होने वाले नये एलान के दौरान नीतीश ने दो ऐसे फैसले भी कर लिये, जो उनकी गले की हड्डी बनते जा रहे हैं. एक फैसला शराबबंदी का और दूसरा फैसला चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्मदिन को खोज निकालने और उसे सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का.

नीतीश कुमार ने अपनी सरकार बनने के छठे दिन ही शराबबंदी का एलान किया था.

यह दोनों मामले ऐसे हैं, जिस पर नीतीश कुमार आगे तो बढ़ चुके हैं लेकिन उन्हें पीछे भी आना पड़ सकता है. शराबबंदी के मामले में तो सरकार आगे-पीछे होना शुरू भी हो चुकी है.

नीतीश कुमार ने अपनी सरकार बनने के छठे दिन ही शराबबंदी का एलान किया था. एक आयोजन में उन्हांेने कहा कि आगामी एक अप्रैल से राज्य में पूर्णतः शराबबंदी होगी. उन्होंने चुनाव के पहले यह वादा किया था. इस एलान से राज्य के एक बड़े वर्ग में खुशी की लहर थी. एक सच यह भी है कि पिछले दस साल में नीतीश कुमार के शासन में ही शराब गांव-गांव तक फैली है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान घरेलू आपसी कलह और सामाजिक तनाव के रूप में हुआ. महिलाएं इसकी सबसे बड़ी शिकार रही जो कि नीतीश का कोर वोट है.

बिहार मे फैलता शराब कारोबार नीतीश द्वारा लड़कियों को साइकिल, छात्रवृत्ति और महिलाओं को पंचायत चुनाव में दिए आरक्षण पर भारी पड़ रहा था. इसका राजनीतिक असर यह हुआ कि जैसे ही भाजपा नीतीश कुमार से अलग हुई, उसने राज्य भर में लड़कियों को इकट्ठा करके रैलियां निकाली. इसमें नीतीश की शराब नीति की आलोचना की गई. बच्चियों को भाजपा द्वारा राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल करने का संदेश यही था कि आज नहीं तो कल यह बड़ा मसला बनेगा.

इसलिए नीतीश कुमार ने चुनाव के पहले ही शराबबंदी का वादा कर दिया था. पिछले एकाध साल में राज्य में अलग-अलग हिस्से में महिलाओं ने शराब के खिलाफ छोटे-छोटे आंदोलन भी करने शुरू कर दिए थे. इन आंदोलन को देखते हुए शराबबंदी की घोषणा ही एकमात्र विकल्प बचा था. नीतीश कुमार को अंदाजा था लिहाजा उन्होंने चुनाव के पहले ही शराबबंदी का वादा कर दिया था. इसका फायदा भी उन्हें मिला. चुनाव में महिलाओं द्वारा इस बार जमकर वोट देने की एक बड़ी वजह यही माना गया कि नीतीश कुमार ने शराबबंदी का वादा कर दिया था.

लेकिन इस एलान के बाद से सरकार की ओर से शराबबंदी पर हर दिन भटकाने वाले बयान आ रहे हैं. इस आशंका को बल मिल रहा है कि बिहार में शराब को बंद करवाना इतना असान नहीं होगा. पहले तो सरकार ने पूर्ण शराबबंदी की बात कही. फिर उन्होंने कई चरणों मंे शराबबंदी की बात की. फिर यह एलान हुआ कि सिर्फ देशी शराब पर रोक लगेगी, विदेशी नहीं.

रोज-रोज बदलते फैसले से कई सवाल खड़े हो गये हैं. पहला सवाल तो यही उठाया जा रहा है कि क्या शराबबंदी कर देने से वर्षों की लगी हुई लत एकबारगी से खत्म हो जाएगी या फिर शराबखोरी दूसरे रूप में देखने को मिलेगी. कई लोग जानते हंै कि शराबबंदी के महज एलान से कुछ नहीं होने वाला. उसका स्वरूप बदलेगा और उसका कोप-प्रकोप भी, क्योंकि चुलाई वाले शराब से स्थितियां और भी बद से बदतर होंगी. लोजपा नेता व सांसद चिराग पासवान कहते हैं कि नीतीश कुमार की इस घोषणा का स्वागत है लेकिन उनके ही राजकाज में शराब गांव-गांव तक पहुंची है तो वे अपने इस फैसले को लागू कैसे करवायेंगे, यह देखना होगा.

भाजपा नेता गिरिराज सिंह जैसे लोग इस फैसले की दूसरी तरह से आलोचना कर रहे हैं. उनके मुताबिक नीतीश कुमार के इस फैसले में लालू प्रसाद यादव की कितनी सहमति है, इसका लागू होना उस पर निर्भर करेगा. गिरिराज का मानना है कि लालू प्रसाद यादव इतनी आसानी से सरेआम शराबबंदी का एलान नहीं करेंगे. लालू प्रसाद हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि अगर शराब बंद ही होना है तो विदेशी शराब बंद हो, देशी नहीं लेकिन नीतीश कुमार देशी शराब को बंद करने का एलान कर रहे हैं. जानकारों की मानें तो अप्रैल आते-आते शराबबंदी का मामला नीतीश-लालू के बीच टकराव का कारण भी बन सकता है.

बिहार ऐसा राज्य है, जहां राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत शराब ही रहा है

महिलाओं को सशक्त करने के लिए नीतीश ने तमाम काम किए हैं. इसकी वजह से महिलाएं राजनीतिक तौर पर उनकी मुरीद हुई हैं बस शराब ही एक ऐसा पेंच है जिसके कारण वे नीतीश से अलग हो सकती थी. अब सुशील मोदी जैसे भाजपा नेता रोजाना कह रहे हैं कि नीतीश कुमार शराब माफियाओं के दबाव में शराबबंदी पर अपने बयान रोजाना बदल रहे हैं.

राजनीति से इतर शराबबंदी का मामला राज्य की आर्थिक सेहत से भी जुड़ा है. शराबबंदी के साथ बड़ा सवाल राजस्व का खड़ा हुआ है. बिहार ऐसा राज्य है, जहां राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत शराब ही रहा है. लगातार शराब से राजस्व बढ़ता भी रहा है. वित्तीय वर्ष 2012-13 मंे जहां शराब से 2600 करोड़ राजस्व की प्राप्ति हुई थी वहीं साल 2013-14 में यह बढ़कर 3100 करोड़ हो गई. 2014-15 में यह बढ़कर 4000 करोड़ तक पहुंच गया.

शराब से बिहार में प्राप्त होनेवाले राजस्व का एक गणित यह भी है कि इससे उत्पाद विभाग के अलावा वाणिज्यकर विभाग भी राजस्व वसूलता है. इस आधार पर देखें तो चालू वित्तीय वर्ष में इसके 5300 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है. इससे अधिक राजस्व बिहार को सिर्फ वाणिज्यकर से ही प्राप्त होता है. वित्तीय वर्ष 2014-15 में 21,375 करोड़ रुपये का राजस्व वाणिज्यकर से प्राप्त हुआ.

नीतीश कुमार का कहना है कि उन्हें मालूम है कि शराब से करोड़ों के राजस्व की प्राप्ति होती है. यह राजस्व इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि हमने उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग में राजस्व की चोरी रोकने के उपाय किये. इसी वजह से यह पांच सालों में एक हजार करोड़ से बढ़कर चार हजार करोड़ तक पहुंचा. राजस्व की इस क्षति को हम दूसरे तरीके से प्राप्त करने की कोशिश करेंगे लेकिन महिलाओं के हित को ध्यान में रखकर इस फैसले को जरूर लागू करेंगे.

नीतीश कुमार जितने दृढ़ संकल्प के साथ इस बात को दुहरा रहे हैं, उससे यह भरोसा मिलता है कि बिहार में अप्रैल से शराबबंदी लागू होगी. हालांकि कुछ लोगों को आशंका है कि 1977-78 वाला ही हाल होगा. बिहार में पहली बार पूर्ण शराबबंदी की घोषणा 1977-78 में हुई थी लेकिन वह कारगर नहीं हो सका था.

शराब के अलावा उनका एक और फैसला फंसता हुआ दिख रहा है. सरकार ने फैसला किया है कि अब राज्य में 33 दिन की बजाय 35 दिनों की छुट्टी राज्य सरकार के कर्मियों को दी जाएगी. इस क्रम में उन्होंने दो छुट्टियां जो बढ़ायी है, उसमें एक छुट्टी गुरु गोविंद सिंह जयंति की है और दूसरी चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जयंती की. यह दूसरी छुट्टी जो सम्राट अशोक के जन्मदिन पर मिलनेवाली है, उसे लेकर ही पेंच फंसा है. बौद्धिक गलियारे में चर्चा छिड़ गई है. रोमिला थापर से लेकर दूसरे तमाम बड़े इतिहासकार कह रहे हैं कि जिस अशोक के जन्म का साल तक नहीं पता उसकी जन्मतिथि बिहार की सरकार ने कैसे खोज निकाली.

नीतीश कुमार ने अशोक का जन्मदिन 14 अप्रैल निर्धारित किया है. 14 अप्रैल को ही बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती आती है. पिछले कुछ सालों से बिहार में बाबा साहब अंबेडकर की जयंती को बड़े स्तर पर मनाने की शुरुआत हुई है. बिहार में दलितों की राजनीति का एकत्रीकरण भी बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर होना शुरु हुआ है. बाबा साहब अंबेडकर को लेकर ही बिहार में दलित राजनीति को पिछड़ों की राजनीति से अलग करने की छटपटाहट भी है.

इस बात की संभावना है कि 14 अप्रैल को भीमराव अंबेडकर के साथ अशोक का जन्मदिन मनाने का फैसला दलितों को रास नहीं आएगा. पर अब नीतीश कुमार के लिए इस तिथि को बदल पाना आसान नहीं होगा. खुद जदयू का दावा था कि 14 अप्रैल को अशोक की जन्मतिथि का निर्धारण इतिहास के पन्ने को खंगाल कर, तथ्यों को परखने के बाद किया गया है.

भाजपा पिछले एक साल से अशोक के नाम पर राजनीति कर रही थी. कुछ माह पहले भाजपा ने सम्राट अशोक की जाति का पता लगाया था और उसके बाद केंद्र की भाजपा सरकार ने अशोक की तसवीरों की कल्पना कर उन पर डाक टिकट जारी किया था.

अशोक को भाजपा द्वारा कुशवाहा जाति का बताने और फिर उन्हें लगातार ग्लोरिफाई करते रहने के बाद जदयू और नीतीश कुमार की ओर से भी उसकी काट मंे कुछ करना जरूरी था ताकि पिछड़ी जातियों में एक मजबूत समूह माना जानेवाला कुशवाहा साथ में जुड़ा रहे और इसके लिए जल्दबाजी में अशोक के बर्थडे का पाशा फेंक दिया गया.

ये घटनाएं आने वाले दिनों की झलकियां हैं.

First published: 23 December 2015, 8:54 IST
 
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