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सरकार को दांव पर लगाकर शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाएंगे नीतीश कुमार?

अभिषेक पराशर | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
QUICK PILL
  • राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व सांसद और माफिया मोहम्मद शहाबुद्दीन को फिर जेल जाना पड़ सकता है. राजीव रौशन हत्याकांड में पिछले 12 सालों से जेल में बंद शहाबुद्दीन को पटना हाईकोर्ट से जमानत मिली और वह शनिवार को जेल से बाहर आ गया. 
  • नीतीश कुमार, शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाने के बारे में विचार कर रहे हैं. हाल ही में नीतीश सरकार ने निर्दलीय विधायक और दूसरे माफिया अनंत सिंह के खिलाफ सीसीए लगाया है, जिसके बाद सिंह को अगले एक साल तक जेल में रहना पड़ेगा.
  • विश्लेषकों की माने तो शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाने का फैसला महागठबंधन में दरार पैदा करेगा और इसका राजनीतिक लाभ बीजेपी को होगा. बीजेपी लगातार शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाने की मांग करती रही है.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व सांसद और माफिया मोहम्मद शहाबुद्दीन को फिर से जेल जाना पड़ सकता है. राजीव रौशन हत्याकांड में पिछले 12 सालों से जेल में बंद शहाबुद्दीन को पटना हाई कोर्ट से जमानत मिली है. 

नीतीश सरकार मोकामा के बाहुबली और निर्दलीय विधायक अनंत सिंह की तरह ही शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाने पर विचार कर रही है.

जेल से बाहर आते ही आरजेडी के सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं ने जिस तरह से 'जिंदाबाद' के नारे लगाकर उसका जोरदार स्वागत किया वह महागठबंधन की सरकार से कहीं ज्यादा नीतीश कुमार की उस छवि को तार-तार कर रहा है जिस पर भरोसा कर बिहार की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के चेहरे वाले महागठबंधन को ऐतिहासिक जनादेश दिया. 

नीतीश कुमार को भी इस जिम्मेदारी के बोझ का भली-भांति अंदाजा है. शहाबुद्दीन ने रिहाई के तत्काल बाद नीतीश कुमार को परिस्थितियों का नेता बताते हुए लालू यादव को अपना नेता करार दिया था. 

कुमार से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'बिहार के लोगों को पता है कि उन्होंने किसे अपना समर्थन और जनादेश दिया है.'

नवंबर 2005 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की कमान संभाली तब उन्होंने सबसे पहले स्पीडी ट्रायल की शुरुआत कर माफिया से नेता बने अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया और इसमें सबसे ऊपर शहाबुद्दीन थे, जिसे सरकार ने ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर बताया था.

रिहाई के बाद जिस तरह से शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार पर निशाना साधा, वह जेडीयू को परेशान कर रहा है. लालू प्रसाद यादव से शहाबुद्दीन के करीबी रिश्तों को देखते हुए पार्टी को लग रहा है कि वह लालू यादव की शह पर नीतीश कुमार के खिलाफ इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं. 

जेडीयू नेताओं को लग रहा है कि गठबंधन में रहने के बावजूद लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व को कबूल नहीं कर रहे हैं.  

शहाबुद्दीन ने रिहा होने के बाद नीतीश कुमार को परिस्थितियों की वजह से बना मुख्यमंत्री करार देते हुए लालू प्रसाद को अपना नेता करार दिया. उन्होंने कहा, 'मेरे और लालू के रिश्ते बेहद मजबूत हैं और इसे बताने की जरूरत नहीं है. सब जानते हैं कि मुझे फंसाया गया था.'

विपक्ष का कहना है कि सरकार ने बेहद सधे हुए तरीके से माफिया शहाबुद्दीन की रिहाई का रास्ता साफ किया. पटना हाईकोर्ट के जमानत के फैसले को चुनौती दिए जाने के बारे में बिहार सरकार की चुप्पी ने इन आरोपों को यकीन में बदलने का काम किया.

विपक्ष का कहना है कि सरकार ने बेहद सधे हुए तरीके से माफिया शहाबुद्दीन की रिहाई का रास्ता साफ किया

राज्य सरकार जब जमानत को डिवीजन बेंच में चुनौती दिए जाने के बारे में कुछ भी कहने से बच रही थी तब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट प्रशांत भूषण ने माफिया से नेता बने शहाबुद्दीन को मिली जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का एलान कर दिया. 

उन्होंने कहा, 'हाईकोर्ट का कुख्यात गैंगस्टर और नेता शहाबुद्दीन को जमानत दिया जाना शर्मनाक है और ऐसे खतरनाक अपराधी की रिहाई समाज के लिए खतरा है.' भूषण ने कहा कि जैसे ही मुझे मुकदमे से जुड़े कागजात मिलेंगे, मैं जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दूंगा.'

भूषण के इस फैसले के बाद नीतीश कुमार ने तत्काल अपने भरोसेमंद सहयोेगियों और कानून के जानकारों की बैठक बुलाई. यह नीतीश कुमार के काम करने का तरीका है. पहले वह किसी मामले में फैसला लेने के बाद अपने सहयोगियों के साथ उस पर विचार विमर्श करते हैं और फिर उसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखते हैं.

पटना हाईकोर्ट के एक सीनियर एडवोकेट बताते हैं, 'जो काम बिहार सरकार को करना था, वह प्रशांत भूषण करने जा रहे हैं. भूषण का सुप्रीम कोर्ट जाना बिहार सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बनता, उससे पहले ही नीतीश कुमार ने इस मामले में कार्रवाई करने का मन बना लिया है.'

शहाबुद्दीन की रिहाई के तत्काल बाद ही राजीव रौशन हत्याकांड और एक हिंदी अखबार के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की हत्या की निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठने लगे हैं. 

राजीव रौशन के बुजुर्ग माता पिता ने शहाबुद्दीन की रिहाई को अपनी मौत बताया वहीं राजदेव रंजन की पत्नी आशा रंजन ने अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का समय मांगा है.

राजदेव रंजन की हत्या में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है वह शहाबुद्दीन के बेहद करीबी हैं और अभी तक इस मामले की सीबीआई जांच की शुरुआत भी नहीं हो पाई है. ऐसे में शहाबुद्दीन की रिहाई से इन मामलों की जांच के प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

फिर से होगी जेल!

सूत्रों के मुताबिक नीतीश कुमार शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाने के बारे में विचार कर रहे हैं. हाल ही में नीतीश सरकार ने निर्दलीय विधायक और दूसरे माफिया अनंत सिंह के खिलाफ सीसीए लगाया है, जिसके बाद सिंह को अगले एक साल तक जेल में रहना पड़ेगा.

हालांकि नीतीश के इस कदम के राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं. सीसीए लगाने की स्थिति में सरकार की साझेदार आरजेडी से नीतीश कुमार से अलग हो सकती है.

बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता और जेडीयू-बीजेपी की गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार मोदी पूछते हैं, 'खूंखार अपराधी और निर्दलीय विधायक अनंत सिंह के खिलाफ सीसीए लगाया गया तो फिर सरकार शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए क्यों नहीं लगा रही?'

अगर सरकार ने शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाया तो इस कानून की धारा 3 के तहत उसे अगले एक साल तक जमानत नहीं मिल पाएगी. लेकिन नीतीश कुमार के लिए शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाना आसान नहीं होगा.

पटना के वरिष्ठ पत्रकार सुकांत कहते हैं, 'अगर नीतीश कुमार ने शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाया तो उनका यह फैसला उन्हें बीजेपी के और अधिक करीब ले जाएगा क्योंकि बीजेपी लगातार शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाने की मांग करती रही है. इससे बीजेपी को राजनीतिक फायदा होगा और महागठबंधन में जेडीयू और आरजेडी के बीच रिश्ते बेहद खराब हो जाएंगे.'

शहाबुद्दीन के खिलाफ अगर सीसीए लगाया जाता है तो उससे मुस्लिम मतदाताओं में भी गलत संदेश जाएगा. वहीं इस बात की संभावना कम ही है कि लालू यादव, नीतीश कुमार के सीसीए के फैसले को मंजूरी दें. 

दहीं नीतीश कुमार लालू की मर्जी के बिना शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाने का फैसला लेते हैं तो फिर बाहर यह संदेश जाएगा कि विधायकों की संख्या के आधार पर मजबूत स्थिति में होने के बावजूद नीतीश कुमार ने लालू यादव और उनकी पार्टी को नजरअंदाज कर फैसला लिया. ऐसी स्थिति में उनकी सरकार दांव पर होगी.

अगर लालू प्रसाद यादव की मर्जी के साथ शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाया जाता है तो वैसी स्थिति में उन्हें मुस्लिम मतदाताओं का जवाब देना होगा कि आखिर उन्होंने ऐसा होने से रोकने के लिए क्यों कुछ नहीं किया. 

उन्होंने कहा मुस्लिम मतदाताओं खासकर युवा मुस्लिमों के बीच शहाबुद्दीन की लोकप्रियता से इनकार नहीं किया जा सकता. वो हमेशा से लालू के करीबी रहे हैं और आरजेडी के मुस्लिम नेताओं में वो सबसे बड़े कद के नेता बन चुके हैं.

शहाबुद्दीन के बढ़े कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जमानत मिलने से पहले बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर जेल में उनसे मिलने पहुंचे और फिर इसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल कर लिया गया.

जेल में रहने के दौरान ही शहाबुद्दीन को आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया था

सुकांत बताते हैं, 'शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाने का  फैसला नीतीश सरकार के लिए यह आगे कुंआ पीछे खाई जैसी स्थिति है. कार्रवाई करने का सियासी नतीजा कार्रवाई नहीं करने के सियासी नतीजे से ज्यादा बड़ा है.' 

अगर बिहार सरकार माफिया से नेता बने शहाबुद्दीन की जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में  चुनौती देती है तो ऐसी स्थिति में लालू यादव को कोई दिक्कत नहीं होगी. लेकिन राज्य सरकार केे ऐसा करने से पहले प्रशांत भूषण इसकी घोषणा कर चुके हैं. इसलिए सरकार के पास सीसीए से बेहतर कोई विकल्प बचा नहीं है. 

प्रशांत भूषण के शहाबुद्दीन की जमानत अर्जी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की घोषणा के बाद नीतीश सरकार पर नैतिक दबाव भी बढ़ गया है. कायदे से शहाबुद्दीन की जमानत का विरोध राज्य सरकार को करना था लेकिन वह ऐसा करने में विफल रही. अभी भी बिहार सरकार ने शहाबुद्दीन की जमानत को चुनौती दिए जाने के बारे में चुप्पी साध रखी है. 

जेल से निकलने के बाद शहाबुद्दीन अपने कई बयानों में लालू प्रसाद यादव का जिक्र कर चुके हैं. लेकिन अभी तक लालू यादव ने इस मामले में मुंह नहीं खोला है. ऐसा लगता है कि वह नीतीश कुमार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं. 

शहाबुद्दीन की जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे प्रशांत भूषण

शहाबुद्दीन फिर से जा सकते हैं जेल, किरकिरी के बाद जागे सुशासन बाबू

First published: 13 September 2016, 7:08 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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