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2019: नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय राजनीति में पहला कदम बढ़ा दिया है

अतुल चौरसिया | Updated on: 25 December 2015, 8:15 IST
QUICK PILL
  • पार्टी ने घोषणा की है कि वह अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन खड़ा करने में भूमिका निभाएगी. जबकि इन राज्यों में न तो भाजपा की कोई ताकत है न ही जदयू की.
  • राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन के विचार को समर्थन देने के बावजूद उनके सहयोगी लालू यादव का मानना है कि अभी किसी को नेता घोषित करना जल्दबाजी होगी.

बीते रविवार को कीर्ति आजाद की बहुचर्चित प्रेस कॉन्फ्रेंस के हो-हल्ले में एक और बात लगभग नजरअंदाज हो गई. राजधानी में जनता दल युनाइटेड की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई. इसकी अध्यक्षता शरद यादव ने की और इसमें शिरकत करने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल थे. बिहार में जीत से गदगद जदयू का आत्मविश्वास इस कार्यकारिणी द्वारा पारित प्रस्ताव में साफ दिख रहा है.

बैठक में पारित प्रस्ताव कहता है, 'अगले साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पारित किया कि इन राज्यों में बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने का प्रयास होगा. पार्टी ने तय किया है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा विकल्प खड़ा करेगी. समान विचारधारा वाले दलों को मिलाकर भाजपा का मुकाबला किया जाएगा.'

इस प्रस्ताव पर जेडीयू के सहयोगी राजद के मुखिया लालू यादव ने प्रतिक्रिया दी है. लालू यादव के मुताबिक, 'राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन का विचार अच्छा है लेकिन अभी किसी को इसका नेता घोषित करना जल्दबाजी होगी क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में अभी समय है.'

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित होने के बाद जदयू महासचिव केसी त्यागी ने मीडिया को बताया, 'भाजपा को छोड़कर एकदलीय शासन के दिन बीत चुके हैं. हमारी पार्टी पूरे देश में एकसमान विचारधारा वाली पार्टियों को एकजुट करके एक नया राष्ट्रीय विकल्प खड़ा करेगी.'

संकेत साफ है कि नीतीश कुमार कांग्रेस के छाते से बाहर निकल कर राष्ट्रीय फलक पर अपने लिए बड़ी भूमिका देख रहे हैं

जदयू के इस बयान के कई निहितार्थ हो सकते हैं. देश में पहले से ही भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन है. ऐसे में जदयू का यह कहना कि वो भाजपा के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर एक नया राष्ट्रीय विकल्प खड़ा करेगी, पहले से उसका कांग्रेस के साथ चल रहे गठबंधन को आइना दिखाने सरीखा है.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, 'आज की तारीख में यूपीए बचा कहां हैं. आज कांग्रेस की भी वह स्थिति नहीं रही कि वह बाकी विपक्ष के ऊपर मनमानी कर सके.'

जाहिर है कि जदयू और नीतीश कुमार दूर की देख रहे हैं. इस सवाल का जवाब न तो त्यागी ने दिया न ही नीतीश कुमार कि प्रस्तावित गठबंधन का नेतृत्व क्या नीतीश कुमार करेंगे. ऐसा होने की सूरत में कांग्रेस से उनके रिश्ते बिगड़ सकते थे.

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लेकिन प्रस्ताव की भावना को समझें तो एक संकेत साफ है कि नीतीश कुमार कांग्रेस के छाते से बाहर निकल कर राष्ट्रीय फलक पर अपने लिए एक बड़ी भूमिका देख रहे हैं.

जेडीयू प्रवक्ता और सांसद अली अनवर इसका समर्थन करते हुए कहते हैं, 'बिहार भले ही देश का एक हिस्सा भर है लेकिन इसने जो संदेश दिया है उसके मायने पूरे देश के लिए है. नीतीशजी के रूप में लोगों को फासिज्म और कट्टरवाद के खिलाफ एक उम्मीद दिखाई दे रही है.

नीतीशजी आने वाले समय में मौजूदा सत्ता के खिलाफ सबसे आगे रहकर नेतृत्व करेंगे. हम सबने उनसे यही अपील राष्ट्रीय कार्यकारिणी में की है.'

जदयू ने जिन पांच राज्यों में बिहार की तर्ज पर गठबंधन खड़ा करने की बात कही है उसकी भी सच्चाई पर एक नजर डाल लेनी चाहिए. ये राज्य हैं तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और केंद्र शासित पुदुच्चेरी. जदयू के लिहाज से देखें तो इन राज्यों में उसकी कोई हैसियत या सांगठनिक मौजूदगी नहीं है.

दूसरी तरफ दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जदयू जिस भाजपा के खिलाफ महागठबंधन खड़ा करने का प्रस्ताव पास कर रही है उसकी भी असम को छोड़कर बाकी चारो राज्यों में नाममात्र की मौजूदगी है. तो फिर इन राज्यों में जहां न तो खुद जदयू की कोई हैसियत है न ही भाजपा जिसके खिलाफ गठबंधन खड़ा करने की बात हो रही है.

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तो फिर जदयू किस मकसद से ऐसा कर रही है. सूबा दर सूबा अगर हम उन राज्यों की राजनीतिक वास्तविकता का थोड़ा विश्लेषण करें तो चीजें और आसानी से साफ हो जाएंगी.

तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवीय रही है. राज्य में दो मुख्य गठबंधन हैं. एक की जिम्मेदारी जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके के हाथ में है तो दूसरे का नेतृत्व करुणानिधि की पार्टी डीएमके करती है. इन्हीं दो दलों के बीच लंबे समय से सत्ता का हेरफेर चलता आ रहा है.


 जदयू जिस भाजपा के खिलाफ महागठबंधन का प्रस्ताव पास कर रही है उसकी असम को छोड़कर बाकी राज्यों में कोई मौजूदगी नहीं है

कांग्रेस की भूमिका भी यहां डीएमके की सहयोगी की है. भाजपा के पास मौजूदा विधानसभा में एक भी सीट नहीं हैं. 2011 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा यहां एनडीए के तहत चुनाव लड़ी थी और उसका खाता भी नहीं खुला था. विडंबना यह है कि तब जदयू भी एनडीए में उसकी सहयोगी हुआ करती थी और उसने भी आठ सीटों पर किस्मत आजमायी थी. भाजपा को उस साल कुल वोट का महज 2.2 फीसदी वोट मिला था.

जयललिता से नरेंद्र मोदी के अच्छे रिश्तों के बावजूद भाजपा के लिए तमिलनाडु में कोई संभावना नहीं बन रही है. हां मौजूदा लोकसभा में कुछ स्थानीय गठबंधनों के सहारे भाजपा का एक सांसद जरूर जीता है. उनका नाम है पोन राधाकृष्णन.

केरल की राजनीति में भी भाजपा की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी तमिलनाडु में. हालांकि यहां के कुछ इलाकों में संघ की उपस्थिति बड़ी संख्या में है. बावजूद इसके सूबे की राजनीति यूडीएफ (कांग्रेस के नेतृत्व वाला) और एलडीएफ के इर्द-गिर्द घूमती है. फिलहाल कांग्रेस नीत यूडीएफ सत्ता में है और सीपीएम नीत एलडीएफ मुख्य विपक्षी दल है. न तो यहां भाजपा बड़ी पार्टी है न ही जदयू का कोई आधार है.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी भाजपा हमेशा हाशिए पर रही. बंगाल की राजनीति वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस के इर्द गिर्द घूमती है. बची-खुची जगह में कांग्रेस पायी जाती है. नीरजा के मुताबिक अगर वहां कोई गठबंधन बनता है तो वह तृणमूल और कांग्रेस के बीच होगा, हालांकि इसकी संभावना कम है, और वह वामपंथी मोर्चे के खिलाफ होगा.

हाल के पंचायत चुनावों को अगर कोई संकेत माने तो तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का जलवा वहां कायम है. यहां भी जदयू का कोई मजबूत आधार नहीं है.

असम अकेला राज्य है जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की 14 में से सात सीटों पर विजय हासिल हुई थी. राज्य में दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस है. इसके अलावा बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और असम गण परिषद भी महत्वपूर्ण पार्टियां हैं.

यहां पर भाजपा के खिलाफ किसी महागठबंधन की संभावना बन सकती है. यह गठबंधन कांग्रेस-एआईयूडीएफ का हो सकता है. यहां भी जेडीयू अप्रासंगिक है. लेकिन इस गठबंधन के अपने खतरे हैं.

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नीरजा कहती हैं, 'कांग्रेस और एआईयूडीएफ के मिलने की सूरत में राज्य में हिंदू-मुसलमान का जबर्दस्त ध्रुवीकरण हो सकता है. जाहिर है इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा. कांग्रेस कभी भी यह नहीं चाहेगी.' यानी स्थितियां कोई महागठबंधन बनाने से रोकेंगी.

बावजूद इसके नीतीश कुमार पहले ही कांग्रेस, असम गण परिषद और एआईयूडीएफ के बीच महागठबंधन की पहल कर चुके हैं. अली अनवर कहते हैं, 'इन राज्यों में भले ही हमारी कोई उपस्थिति नहीं है लेकिन हमारी जिम्मेदारी है कि हम समान विचारधारा वाले दलों को एकजुट कर भाजपा को किसी भी तरह से सफल नहीं होने दें.'

इन स्थितियों के मद्देनजर जब हम जेडीयू के मौजूदा राष्ठ्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव और महागठबंधन की बहस को देखते हैं तो एक बात साफ होती है कि नीतीश कुमार इस कदम के जरिए खुद को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना चाहते हैं. उनका बहाना बिहार की तर्ज पर महागठबंधन है लेकिन चालें 2019 के हिसाब से चली जा रही हैं.

नीरजा पूरा इत्तफाक नहीं रखतीं. उनके शब्दों में, 'यह कहना कि नीतीश कुमार 2019 में विपक्षी समूह के सबसे बड़े नेता होंगे, अभी जल्दबाजी होगी. हां ऐसा लग रहा है कि नीतीश उस दिशा में बढ़ रहे हैं. लेकिन इसका अंतिम फैसला 2017 के विधानसभा चुनावों से होगा. तब उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. उत्तर प्रदेश में इस तरह के महागठबंधन की संभावना है.'

नका बहाना बिहार की तर्ज पर महागठबंधन है लेकिन चालें 2019 के हिसाब से चली जा रही हैं

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक चीज पूरी तरह से नीतीश कुमार के पक्ष में जाती है. नीतीश कुमार ने सबसे पहले खुद को नरेंद्र मोदी की लहर में उनके खिलाफ खड़ा किया. सिर्फ खड़ा ही नहीं किया बल्कि उन्हें बुरी तरह हराया भी. जाहिर है इसकी वजह से आज की तारीख में वे एंटी मोदी खेमे के नेताओं की कतार में सबसे आगे खड़े हैं.

First published: 25 December 2015, 8:15 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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