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वोहरा एनआईए को कश्मीर में असीमित शक्ति क्यों दिलाना चाहते हैं

गौहर गिलानी | Updated on: 23 January 2016, 0:00 IST

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को 'असीमित शक्तियां' देने की बात कह के एक नया विवाद खड़ा कर दिया है.

राज्य में फिलहाल राज्यपाल शासन है. मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राज्य में नई सरकार के गठन पर असमंजस की स्थिति है.

वोहरा के सुझाव पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. राज्य के वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नेताओं ने उनके बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी.

वोहरा ने क्या कहा?

19 जनवरी को वोहरा ने कहा कि वो रनबीन पीनल कोड(राज्य की दंड संहिता) को एनआईए एक्ट 2008 के तहत लाना चाहेंगे ताकि केंद्रीय जांच एजेंसी को भारत के अंदर किसी भी जांच में पूरा अधिकार मिल सके.

वोहरा सातवें एनआईए दिवस पर बोल रहे थे. वो पठानकोट और गुरदासपुर हमले के संदर्भ में बात कर रहे थे.

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उन्होंने कहा कि अगर गुरदासपुर हमले की 'समुचित जांच' की गयी होती तो 'पठानकोट हमला लगभग असंभव था क्योंकि तब हमें आतंकवादियों के रूट का पता चल जाता.'

राज्यपाल के बयान पर टिप्पणी करते हुए सीनियर एडवोकेट ज़फ़र शाह ने कहा कि इसके 'गंभीर राजनीति परिणाम' हो सकते हैं.

'अपराध की जांच राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है. एनआईए को बीच में लाने से केंद्र के साथ संतुलन बिगड़ जाएगा'

शाह कहते हैं कि अपराध की जांच करना राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है. एनआईए को बीच में लाने से केंद्र और राज्य के बीच का संतुलन बिगड़ जाएगा.

उन्होंने कैच से कहा,"वो परोक्ष रूप से ये कहना चाहते हैं कि राज्य की जांच एजेंसी पर वो भरोसा नहीं करते. हर चीज को केंद्रीकृत करने की प्रवृत्ति से राज्य और केंद्र के बीच संतुलन बिगड़ जाएगा."

हालांकि शाह मानते हैं कि राज्य के क्षमता के बाहर के किसी 'ख़ास मामले' में एनआईए की मदद ली जा सकती. वो कहते हैं, "लेकिन इसके लिए भी राज्य की अनुमति की जरूरत होगी क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है."

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धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को भारतीय गणराज्य में विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है. इसके तहत राज्य में कोई संवैधानिक प्रावधान लागू करने के लिए भी राज्य की सहमति आवश्यक है.

प्रोफ़ेसर शेख शौकत हुुसैन सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ कश्मीर में कानून पढ़ाते हैं. हुसैन कहते हैं, "राज्य के संवैधानिक प्रमुख होने के नाते वोहरा को राजनीतिक बयान देने से बचना चाहिए."

वो कहते हैं, "ऐसे मुद्दे पर विधान सभा में विचार होना चाहिए. जब विधान सभा में कोई कानून पारित हो जाता है तो राज्यपाल को केवल उसपर दस्तखत करना होता है. यही उनका काम है. राजनीति बयानों के गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं. इसलिए उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं की जाती."

कश्मीर स्थित एक कानून के एक जानकार ने नाम न बताने की शर्त पर कैच से कहा, "राज्य की स्वायत्ता पहले ही कमजोर हो चुकी है. अब एनआईए को असीमित शक्ति देने का मतलब है आप जम्मू-कश्मीर में चीजों को जटिल बनाना चाहते हैं."

राजनीति नजरिया क्या है?

कश्मीर के आजादी के समर्थक गुटों ने भी वोहरा के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया की है.

हुर्रियत के एक धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने इसपर कहा कि इस बयान से "भारत-समर्थक पार्टियों की आंखें खुल जानी चाहिए जो 'स्वायत्तता'और 'स्वशासन' की कसमें खाते हैं."

फारूक कहते हैं कि आरपीसी को एनआईए के तहत लाने राज्य विधान सभा की शक्ति को कम करने के एक और तरीका मात्र है.

फारूक का मानना है कि भारत राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में कश्मीर की समस्या को मैनेज करना चाहता है.

सुरक्षा का नजरिया क्या है?

एक वरिष्ठ सुरक्षा विशेषज्ञ ने कैच को बताया एनआईए पहले से ही राज्य से जुड़े मामलों की जांच कर रहा है. जब किसी संदिग्ध की गैर-कानून गतिविधि निरोधक अधिनियम (यूएपीए) 1967 के तहत गिरफ़्तारी होती है तो वो अपने आप एनआईए के अधिकार क्षेत्र में आ जाता है.

वो कहते हैं, "हमारे लिए इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. सेना और सीआरपीएफ जैसी कई एजेंसियां पहले से ही जम्मू-कश्मीर में काम कर रही हैं. "

एनआईए और सीबीआई जैसी एजेंसियां पहले से ही जम्मू-कश्मीर से जुड़े कई मामलों की जांच कर रही हैं

हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ भी इस मामले पर सतर्कता बरतने की बात कहते हैं. वो कहते हैं, "व्यावहारिक तौर पर इंडियन पीनन कोड और रनबीर पीनल कोड में बहुत मामूली फर्क है लेकिन कानून मामलों में भाषा का अपना महत्व होता है."

उन्होंने बताया कि एनआईए जम्मू-कश्मीर के यूएपीए के तहत गिरफ्तार 10 संदिग्धों की पहले से जांच कर रही है.

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एनआईए के अलावा जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार चाहे तो सीबीआई भी राज्य के मामलों की जांच कर सकती है. मसलन, साल 2000 में दक्षिण कश्मीर के पथरीबल में मारे गए पांच मासूम मजदूरों की हत्या की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी.

सीबीआई ने कई सैन्य अधिकारियों को फर्जी एनकाउंटर का दोषी पाया था. हालांकि दोषी सैन्य अधिकारियों को कोई सज़ा नहीं हुई क्योंकि उन्हें आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत विशेष छूट प्राप्त है.

मुंबई हमलों के बाद भारतीय संसद ने 31 दिसंबर, 2008 को एनआईए एक्ट पारित किया था. इसका मक़सद आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए एक केंद्रीय एजेंसी का गठन.

इस एक्ट के तहत आतंकवाद से जुड़े मामलों की एनआईए जम्मू-कश्मीर छोड़कर किसी भी राज्य से अनुमति लिए बगैर जांच कर सकता है.

भारतीय संविधान के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है. यह भारत का एकमात्र राज्य है जिसका अपना झंडा और राष्ट्रगान है. दूसरे राज्यों के उलट यहां की जमीन-जायदाद को केवल यहां के स्थायी निवासी ही खरीद सकते हैं.

वोहरा के प्रस्ताव से राज्य के विशेष दर्जे के ऊपर खतरे पैदा हो सकता है यही सोचकर कई कश्मीरी उनसे नाराज हैं.

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First published: 23 January 2016, 0:00 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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