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फिलहाल भाजपा कीर्ति आज़ाद को माफ करने के मूड में नहीं है

पाणिनि आनंद | Updated on: 13 January 2016, 23:25 IST
QUICK PILL
  • डीडीसीए में कथित घपले को लेकर कीर्ति आजाद की आक्रामक मुहिम की वजह से वित्त मंत्री अरुण जेटली विपक्ष के निशाने पर आ गए थे. आजाद के कारण पार्टी को जेटली का बचाव करने में मुश्किल हो रही थी.
  • पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में आजाद के निलंबन को लेकर कई लोगों को आपत्ति थी. हालांकि सरकार और पार्टी में जेटली के कद को देखते हुए किसी ने खुलकर इस फैसले का विरोध नहीं किया.

कीर्ति आजाद को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के बाद 10 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था. आजाद अपना जवाब दे चुके हैं लेकिन फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में उनकी वापसी होने जा रही है.

क्रिकेटर से नेता बने आजाद फिलहाल बिहार के दरभंगा से बीजेपी के सांसद हैं और उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से निलंबित किया जा चुका है. आजाद ने डीडीसीए में हुए कथित वित्तीय घपले को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली को निशाना बनाया था. 

आजाद के निलंबन को लेकर जबर्दस्त ड्रामा हुआ था और पार्टी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर कई लोगों ने इस फैसले की आलोचना की थी. हालांकि किसी ने खुलकर इस बारे में नहीं बोला और आखिरकार आजाद इस लड़ाई में अकेले पड़ गए.

निलंबन के तत्काल बाद पार्टी के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा की जोशी के घर पर बैठक हुई. उन्होंने हालांकि बैठक के एजेंडे के बारे में नहीं बताया लेकिन ऐसा समझा गया कि मार्गदर्शक मंडल आजाद के खिलाफ लिए गए फैसले से खुश नहीं है.

आजाद के निलंबन का फैसला बेहद तेजी में लिया गया और उन्हें पार्टी के भीतर या बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं मिला. इसके अलावा जिस तरह से आजाद को बाहर किया गया उसे लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी खुश नहीं था. बीजेपी के कई बड़े नेताओं ने हाल के महीनों में पार्टी नेतृत्व की आलोचना की है. इन नेताओं में आरके सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा भी शामिल हैं लेकिन पार्टी ने कार्रवाई केवल आजाद के खिलाफ ही की.

रविवार को आजाद ने मीडिया को बताया कि वह प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें यह बताना चाहते हैं कि उन्होंने अनुशासन के परे जाकर कोई काम नहीं किया और न ही उनका कोई काम पार्टी के खिलाफ है. हालांकि एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'आजाद के प्रधानमंत्री से मिलने की कम ही संभावना है. उन्हें जब मौका मिला तब वह ऐसा नहीं कर पाए. अब इसमें काफी देर हो चुकी है.' उन्होंने कहा, 'यहां तक कि पार्टी प्रेसिडेंट अमित शाह ने उन्हें घर बुलाकर शांत रहने की सलाह दी थी. लेकिन वह नहीं रुके. कारण बताओ नोटिस तो महज औपचारिकता थी. अब फिलहाल उनकी वापसी की कोई संभावना नहीं है.'

जेटली के कद और उनकी पकड़ की वजह से कोई भी नेता या मंत्री कीर्ति आजाद के पक्ष में बोलने को तैयार नहीं है 

आजाद के निलंबन से पार्टी में सख्त संदेश गया है और कुछ ऐसे नेता हैं जिन्हें आजाद से सहानुभूति है. कोई भी व्यक्ति फिलहाल उनके पक्ष में खड़ा नहीं दिख रहा है. पार्टी के भीतर कई लोगों को लगता है कि उसे आजाद के निलंबन के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए लेकिन कोई भी सामने से आकर बोलने को तैयार नहीं है.

आजाद के एक शुभचिंतक ने बताया, 'निलंबन के बाद कीर्ति ने चुप्पी साध रखी है. उन्होंने किसी पार्टी नेता के खिलाफ कुछ नहीं बोला है. तकनीकी तौर पर उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं किया है जो पार्टी के खिलाफ जाता हो. उन्होंने डीडीसीए में हुए घपले की आवाज उठाई जिसका बीजेपी से कोई लेना-देना नहीं है.'

लेकिन पार्टी और सरकार के कद्दावर नेताओं से लड़ना इतना भी आसान नहीं है जिन्हें उमा भारती ने एक बार त्रिमूर्ति (नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली और अमित शाह) कहा था. वास्तव में यह पार्टी और सरकार के सबसे शक्तिशाली लोग हैं. इनके खिलाफ बोला नहीं जा सकता. कीर्ति इसके बेहतरीन उदाहरण हैं.

अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोलकर पार्टी और सरकार में बने रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'अरुण जेटली एक शक्तिशाली नेता हैं और प्रधानमंत्री के करीबी हैं. वह प्रधानमंत्री के कानूनी सहयोगी भी हैं और उन्हें सरकार की अच्छाई, बुराई, ताकत और कमियों के बारे में पता है. वह सरकार के प्रबंधक हैं. उनके खिलाफ मोर्चा खोलकर बचे रहना संभव नहीं है.' उन्होंने कहा, 'यही वजह रही कि कोई भी आजाद के पक्ष में सामने नहीं आया. यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्रियों तक ने साथ नहीं दिया.'

पार्टी ने कीर्ति के मामले को मिसाल के तौर पर आगे बढ़ाया है और इसकी आड़ में उन्होंने पार्टी के खिलाफ बोलने वालों को कड़ा संदेश दिया है. आजाद को निलंबित किए जाने का फैसला निश्चित तौर पर पसंद नहीं किया गया लेकिन ऐसा करना इसलिए जरूरी था ताकि पार्टी को मनमाने तरीके से चलाया जा सके.

First published: 13 January 2016, 23:25 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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